मिसेज सिंह का स्मार्टफोन : दिलीप कुमार

हिमालिनी, अंक जून 2018 । आजकलए रौनक ए बजम हैं,उनके चेहरे का नूर गजब का है उनकी बढ़ती उम मानो थम सी गई है । लोगबाग उनकी बढ़ती उम और चढ़ते जादू का सीक्रेट पूछते है तो वो मुस्कराकर रह जाती है । उनके वय की महिलाएं जहां बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी हांफ रही है ंवे सब शुगर और बीपी जैसी बीमारियों से पीडि़त हैं वही ंमिसेज सिंह अपनी बहू की साडि़यां पहनकर उल्टे पल्ले का फैशन किये घूमती हैं बहू की सारी साडि़यों का उद्घाटन मिसेज सिंह ही करती हैं मोटापा काबू में नही ंहै इसलिये मिसेज सिंह बहू का सलवार सूट नहीं पहन पाती इसका उनको बहुत मलाल रहता है  ।
बहू के फैशनेबुल कपड़े वो पहन सकें इसलिए वो नींबू पानी और ग्रीनटी पीती हैं, उन्होंने अन्न खाना लगभग छोड़ दिया है अपने घर में उपवास और पार्टियों में वो सिर्फ फ्रूट जूस पीती हैं । अब वो सिर्फ उबला हुआ खाना ही खाती हैं ताकि वो अपनी बहू के सभी सलवारसूट और बाकी नए फैशन के कपड़े पहन सके वैसे मोटापे से मुक्ति के लिये गई अपनी कसम को वो अन्नदोष और अन्नविकार से जोड़कर लोगो ंको बताती हैं ये और बात है किटी पार्टी में उनके फ्रूट जूस देने में लोगो को काफी दिक्कत होती है ।
अब वो चूल्हा चौका, गृहस्थी की नही बल्कि धर्म, अध्यात्म और साहित्य की बातें करती है  राजनीतिक विचारधारा से वो परहेज रखती हैं क्योंकि उनको सबको लेकर चलना है, धंधा बनाये रखना है तो सब को जोड़े रखना है ये परिवर्तन उनके जीवन में कुछ बरस पहले ही आया था, इधर मोदी जी देश बदलने निकले उधर माणिकलाल की बीवी ने अपनी और उनकी दुनिया बदलकर रख दी, ये चमत्कार यूँ हुआ कि मोहल्ले की पोलिंग एजेंट और चुनाव में वोट की गणित के बीच एक दिन माणिकलाल की बीवी का बटनवाला मोबाइल पÞmोन कहीं खो गया, चुनाव प्रभावित ना हो इसलिए नेताजी ने अपना पुराना मोबाइल पÞmोन उनको दे दिया,और नेताजी चुनाव जीत गए सो उन्होंने अपना स्मार्ट फोन वापस भी नहीं मांगा, बस इसी स्मार्ट फोन से माणिकलाल की बीवी को पंख लग गए उसके पहले वो मोहल्ले की औरतो ंके बीच बैठकर चूल्हा, चौका, बहू की चुगली, भजन कीर्तन, सिलाई कढ़ाई और Þउनके फंदे पर चर्चा किया करती थीं तब वो माणिकलाल की बीवी के तौर पर जानी जाती थी जो कटपीस के कपड़े बेचा करती थी और ब्लाउज पेटी कोट सिलने के आर्डर लिया करती थीं । उन्ही दिनो ंएक रिटायर अधिकारी से उनका परिचय हुआ जो रिटायरमेंट के बाद जीवनबीमा की पालिसी बेचा करते थे ।
उस धंधे मे प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो उन्होंने साहित्य बेचना शुरू कर दिया उन्होंने खाये अघाये लोगो को फांसा और साझे संकलन में रचना प्रकाशन का झांसा दिया । गंदा था, मंदा था मगर बहुत दिलफरेब धंधा था । सबसे पहले रचना लो फिर उन्ही से शुल्क लो, उन्ही के खर्चे पर छपवाओ फिर उन्हीं के खर्चे पर लोकार्पण करके उन्हें साहित्यभूषण, साहित्यरत्न जैसी कोई छुट भैया टाइप की उपाधि दे दो । उपाधि पाया हुआ लेख कर लेखिका अपने यशोगान हेतु अधिक प्रतियां खरीदता है और फिर अमरत्व प्राप्ति की चाह में उनको चारों ओर बांट देता है अधिकारी महोदय पुरुष थे इसलिए उनकी पहुंच और पैठ घरो ंमे नहीं हो पा रही थी सो उन्हें एक महिला साझीदार की तलाश थी इत्तेपÞmाकÞ से उन्हें माणिकलाल की बीवी मिल गयी  । वो भी व्यापार कर रही थीं कटपीस के कपड़ो का जो रेडीमेड की वजह से ठंडा पड़ता जा रहा था । सो उन्होंने साहित्य का व्यापार अपनाया और वो चल निकला ।
देखते ही देखते माणिकलाल की बीवी मिसेजसिंह हो गई और माणिकलाल एम लाल हो गए । पिलपिलाये से माणिकलाल को उनकी बीवी पहले ऐजी,ओजी कहती थी अब वो उनको हनी और हब्बी कहकर बुलाती हैं । अधिकारी महोदय को मिसेजसिंह को साहित्य का धंधा सिखाना बहुत महंगा पड़ा । वो उन्ही से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्ही के लिए भस्टमासुर बन गयीं । उनके सारे क्लाइंट उन्होंने काट लिए । फिर शिव दक्ष संवाद की भांति उनका और अधिकारी महोदय का वो झगड़ा हुआ कि फेसबुक बिल्कुल सती के अग्निकुंड की तरह जल उठा । मिसेजसिंह ने ना सिर्फ खूब महिला क्लाइंट बनाये बल्कि अपने साथ पुरुष अनुयायियों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी ।
महिलाओं का बहनापा और पुरुषों की आसक्ति मिसेजसिंह के धंधे के लिए बहुत काम आयी । मगर जाते जाते अधिकारी महोदय ये पोल खोल गए फेसबुक पर की मिसेजसिंह दरअसल मिसेजसिंह नहीं किसी और जाति की हैँ । मिसेजसिंह उनका नाम नहीं बल्कि धारण की गई उपाधि है । सिंह भी बड़ा दिलचस्प सरनेम है, हिन्दुओं की तमाम जातियों के लोग अपनी सुविधानुसार इस टाइटल का प्रयोग करते हैं । कभी ठाकुरों के एकाधिकार वाला ये सरनेम अब सर्वसुलभ है । शायद गुरुदेव को भी अंदाजा लग गया था तभी वो ठाकुर लिखते थे खुद को वरना अगर सिंह लिखते तो लोग नोबल कमेटी आरटीआई डालकर पूछते कि गुरुदेव की जाति क्या है क्योंकि भारत में जाति कभी नहीं जाती । सिंह सरनेम की माया इतनी है कि साहित्य के एक और मठाधीश एकबार मिसेजसिंह से मिल गए ।  अपनी जाति का समझ कर उन्होंने मिसेजसिंह को खूब प्रमोट किया मगर उन्हें जब मिसेजसिंह की असली जाति पता लगी तो वो कन्नी काटकर निकल गए । उनको उनकी जाति की एक असली मिसेज सिंह मिल गयी अब वो उनको प्रमोट कर रहे हैं । मिसेजसिंह साहित्य की इस जातिवादी राजनीति से बहुत आहत हुईं और फिर फेसबुक पर कई दिनो ंतक करुण विलाप किया जिससे लोग भी बहुत दुखी हुए । उन्ही दिनों मिसेजसिंह ने अपनी जाति के लोगों को एक साहित्यिक गैंग खड़ा किया जिसमें साहित्यिक मुखबिर से लेकर साहित्यिक शार्पशूटर तक हैं ।
मिसेज सिंह की गैंग स्क्रीनशाट लेने में माहिर है और फिर फेसबुक पर उसके सदुपयोग में उनको महारत हासिल है । मिसेजसिंह को लोग स्क्रीनशाट क्वीन की उपाधि से भी लोग विभूषित करते हैं । मिसेजसिंह अपने पति को अबकुछ खास भाव नही देती । वैसे भी तेलमिल के मुनीम और बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े माणिकलाल अपनी बीवी की व्यस्तता से खासे हलकान रहते हैं । तेलमिल की मुनीमी करके जब वो घर लौटते हैं तब मिसेजसिंह बजाय उनकी सेवा टहल के विश्व शांति के जटिल मुददो ंपर फेसबुक पर कटपेस्ट वाली पोस्ट डाल रही होती हैं ।
रातबिरात जब मुनीम जी दर्द से कराहते कलपते रहते हैं, तब मिसेज सिंह मेसेंजर पर अपने प्रशंसकों के प्रश्नों का जवाब दे रही होती हैं । रातभर पÞmोन चलता है तो सुबह काफी देर से सोकर उठती हैं मिसे जसिंह, तब तक मुनीमजी दफ्तर जा चुके होते हैं । मगर क्या मजाल है कि बेटा या बहू उनको जगा दे । उनका निठल्ला बेटा भी अब काफी व्यस्त रहता है इधर उधर दिनभर उसे मिसेज सिंह भेजती रहती है । उनका बेटा पहले उनको अम्मा कहता था अब माँम कहकर बुलाता है । वैसे मिसेजसिंह आजकल बहुत परेशान भी रहती हैं, क्योंकि दादा नाना की उम्र के लोग सुबह शाम उनको इतना मैसेज भेजते हैं कि उनका मोबाइल हैंग हो जाता है और उनका मोबाईल रुक जाता है तो उनकी दुनिया सूनी सूनी हो जाती है । दिक्कत ये है कि इन बुड्ढे शौकीनों से वो पिंड भी नहीं छुड़ा सकती क्योंकि इन्ही के साथ साझा संकलन निकालने हैं और इन्ही से अपने कार्यक्रम स्पान्सर कराने हैं ।
मायामहा ठगिनी हम जानी, अब ये माया अगर मिसेजसिंह को धन के रूप में चाहिए थी तो उन शौकीन बुड्ढो को कीर्ति के रूप मे ंपानी थी । माया के दोनो ंरूप दोनो तरफ से एक दूसरे को ठग रहे थे । मिसेजसिंह यात्रायें खूब करती हैं । वो कहती हैं कि यात्रा करने से उनके आसपास नकारात्मक ऊर्जा नही रहती । ये और बात है कि जिस शहर में वो जाती हैं उस शहर में किसी साझा संकलन वाली महिला के घर वो जा धमकती है फिर तो खाना पीना चाय नाश्ता सब कुछ मुफ्त । उन्ही के किराये पर शहर घूमना । मौका पाकर किसी टूरिस्ट स्पाट पर वो अपनी खूब पÞmोटो  खिंचवाले ती है ंफिर उसे मेजबान का पता दे आती है ं।
झख मार कर वो मेजबान उनकी पÞmोटो उनके पते पर भेज ही देता है । मिसेजसिंह पहुंची हुई कलाकार है ं। वो अक्सर नए शहर में अपने एटीएम का कोड भूल जाती हैं तो उनकी छोटी( मोटी खरीदारी मेजबान महिला ही करती है । मिसेजसिंह अपने पास दो हजार का एक नकली नोट भी रखती है ंजिसे वो अपने मेजबान के साथ होने पर होटल या टैक्सी का बिल चुकाने के लिये तत्काल निकाल लेती है ं। वो जानती हैं कि उनका नोट पकड़ा जाएगा सो वो नोट के पकड़े जानेपर दुखी और ठगे जाने का अभिनय भी करती हैं फिर अपने वरिष्ठ होने का हवाला देकर वो मेजबान महिला के सामने अपना एटीएमकार्ड हाजिÞर कर के बिल भुगतान करने की जिÞद करती है मगर हमेशा की तरह वो एटीएम का कोड भी भूल जाती हैं, मजबूरन उसमे जबान महिला को उनके समस्त भुगतान करने पड़ते हैं ।
वैसे उनका दो हजार का नकली नोट और उनका एटीएम का कोड भूलना अब काफी चर्चित हो चला है । इसलिये वो नए नए पैंतरे आजमाती हैं । हाल ही में एक दूसरी महत्वाकांक्षी महिला से उन्होंने मेलजोल बढ़ाया है । दूसरी वाली देवी जी पहले एक टूरिस्ट एजेंसी चलाती थीं उनका रोजगार फेल हो गया और उधारी बढ़ गई तो उन्होंने मिसेजसिंह के साथ नया रोजगार शुरू किया । अब वो विदेशों मे हिंदी का व्यापार बढ़ा रही हैं । अगर आप धनवान हैं और देश के हिंदी परिदृश्य मे आपको महत्व नहीं मिल रहा है तो चिंता मत कीजए मिसेजसिंह और उनकी व्यापारिक साझीदार विदेश में हिंदी का कोई ना कोई बड़ा पुरस्कार  सम्मान आपको गारंटी से दिलवा देंगे ।
सम्मान पाने वाला फूलकर कुप्पा हो जाता है और हमारे देश में तो विदेशी कूड़ा भी सर माथे पर फिर सम्मान तो इंटरनेशनल हो जाता है । इसकाम मे मिसेजसिंह का कमीशन तीस प्रतिशत का है । मिसेजसिंह योजना बना रही हैं कि वो जल्द ही शिव( भस्मासुर का प्रसंग दोहराएँगी और दूसरी महिला को साहित्यिक टूरिज्म के इस धंधे से बाहर कर देंगी । लेकिन उनके सामने एक बखेड़ा खड़ा हो गया उनकी बहू नाराज हो कर मायके चली गयी है वो कहती है कि मिसेजसिंह ने उनकी जितनी भी साडि़यो ंको पहनकर उद्घाटन किया है उतनी ही साडि़यां जबतक वो नई खरीदकर नहीं दे देती तबतक वो वापस लौटकर ससुराल नही आएगी ।
मिसेजसिंह अभी इस समस्या से निपट पाती तब तक माणिकलाल बीमार पड़ गए । तेलमिल की मुनीमी मे ंउनका दमा रोग असहनीय हो चला है । डाक्टर ने उन्हें हवापानी बदलने के लिए किसी पहाड़ी शहर में कुछ महीने रहने की ताकीद की है । माणिकलाल एक ऐसा सस्ता शहर खोज रहे हैं जहां पांच कोस के दायरे में कोई लेखक लेखिका ना रहती हो ।अब मिसेजसिंह वाकई बहुत परेशान है ंकि दो महीने बाद उनको विदेश जाना है, कई साझा संकलन निकालने है अगर वो दूरदराज रहने चली गई ंऔर उनके स्मार्ट फोन मे ंनेटवर्क नहीं मिला तो???

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