Thu. Sep 20th, 2018

कानूनी शासन का बंध्याकरण न करे

जिस तरह रेशम चौधरी हिरासत में आमरण अनशन पर थे और वर्तमान गृहमन्त्री रामबहादुर थापा ने उनको जूस पिला कर आमरण अनशन तुड़बाया था उसी तरह अब सरकार तत्काल निर्वाचित प्रतिनिधि को शपथ ग्रहण करबाए तो बेहतर, कानूनी राज स्थापित हो सकता है

बालकृष्ण ढुंगेल को राष्ट्रपति द्वारा आम माफी देने के बाद अभी पश्चिम मधेश में आम थारु के अन्दर राज्यप्रति के असंतुष्टि में वृद्धि हुई है । लेखक ने उनके भीतर बढ़ रही असंतुष्टि को करीब से अनुभव किया है, पश्चिम मधेश के यात्रा के दौरान । खासकर कैलाली जिला के थारुओं में चरम असंतुष्टि है । कारण है निर्वाचित जनप्रतिनिधि रेशम चौधरी से किया जा रहा राज्य का व्यवहार । उनलोगों की असंतुष्टि का कारण है हत्या के आरोप में सर्वोच्च अदालत से सजा पा कर जेल चलान किए गए बालकृष्ण को आममाफी और निर्वाचित रेशम को निर्वाचित नहीं होने का प्रमाणपत्र देना और ना ही शपथ ग्रहण करवाना ।
इसी विषय को केन्द्रबिन्दु बनाकर वर्तमान थारुवान संघर्ष समिति ने एक प्रेस विज्ञप्ति भी साझा किया है जिस में कहा गया है कि अगर थारु नेताओं पर लगाया गया भूmठा मुद्दा वापस नहीं लिया गया और रेशम चौधरी को निर्वाचित सांसद का प्रमाणपत्र एवं शपथ ग्रहण नहीं करवाया गया तो पश्चिम मधेश में आन्दोलन का बिस्फोटन अवश्यंभावी है ।

सन् २०१७ में प्रतिनिधिसभा के चुनाव में रेशम ३४,३४१ मत लाने में सफल हुआ था । चौधरी के प्रतिद्वन्दी तत्कालीन बाम गठबंधन के उम्मीदवार मदन कुमारी शाह द्वारा लाए गए मत का दुहरा है । यह क्या स्पस्ट करता है ? और कुछ नहीं हत्या के आरोप में कुछ प्रतिनिधि सत्ता का लुत्फ उठा रहे हैं वही रेशम चौधरी को तरसाया जा रहा है । क्या यह नेपाली राज्य का दोहरा चरित्र नहीं ?
थारु और राज्य
जब मधेशवादी दल संबिधान का विरोध करते हुए आन्दोलित थे उस वक्त विभिन्न प्रकार की हत्या, हिंसा मधेश में व्याप्त था, यह विदित सत्य है । संविधान संसोधन के बगैर ही वे लोग चुनाव में सिर्फ शामिल नहीं हुए अपितु आज सत्ता से जुड़ कर रोमांचित महसूस कर रहे हैं । बिषयवस्तु पर केन्द्रित हो कर कहा जाय तो मधेशवादी दल के नेता जिन पर भी हत्या का मुद्दा चलाया गया था उनमे से कई आज की तारीख में निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में है और निर्वाचित होने का सारा “प्रिविलेज” उठा रहे हैं । और कई सारे मधेशवादी नेता जिन पर कि मुद्दा लगा है वे खुलेआम घूम रहे हैं । बात करने पर वे लोग बताते हैं कि उन पर लगाया गया मुद्दा बेबुनियाद है । और उन लोगों का कहना है कि अगर राज्यपक्ष एक भी प्रमाण दिखा दे तो हम सजा पाने के लिए तैयार हैं ।
इस को अगर थारु के आन्दोलन से जोड़ कर देखा जाए तो सन् २०१५ में नेपाल के कैलाली जिलाें के टिकापुर में एक नरसंहार हुआ था । जिस में नेपाल प्रहरी के एसएसपी लगायत के प्रहरी जवानाें का कत्लेआम हुआ था आन्दोलनकारियों के द्वारा । और सुरक्षनिकाय के द्वारा दर्जनो थारुओं पर मुद्दा चलाया गया । सैकड़ों की संख्या में थारु विस्थापित हो पड़ोसी देश भारत शरण लेने पर मजबूर हो गए । टिकापुर घटना के तुरन्त बाद गैरथारुओं के द्वारा आम थारुआें की संपत्ति लूटी गयी, दर्जनो थारु के साथ गलत तरीके से पेश आया गया । कई मानव अधिकार संस्था के प्रतिवेदन के अनुसार तो कई थारु महिलाओं के इज्जत के साथ भी खेला गया । और ये सब वहाँ की सुरक्षनिकाय की उपस्थिति में संभव हुआ था । फिर भी उन अपराधियो के ऊपर न कोई मुद्दा चलाया गया नहीं तो किसी की गिरफतारी हुई थी । क्या ये सामाजिक न्याय के खिलाफ नहीं है ? और ना ही तो टिकापुर घटना का सही अनुसन्धान हो पाया है अबतक और ना ही तो वास्तविक अपराधियों को कानून हथकड़ी लगा पायी है ।
गौरतलब है अगर सरकार खुद न्यायालय है और रेशम चौधरी को अपराधी घोषित कर दिया था तो फिर सन् २०१७ के आम चुनाव में उनको मनोनयन ही क्यों दर्ता करवाने दिया था ? शायद इस लिए कि उनको लगा था की रेशम चुनाव जीत ही नहीं सकता । परंतु वे यह भूल गए कि उन्होंने खुद प्रमाणित कर दिया कि रेशम का वाकई में टिकापुर घटना में सलग्नता का कोई प्रमाण नहीं है उनके पास । जो की रेशम की भी चुनौती है । हलाँकी घटना का प्रोपर अनुसंधान होना बाकी है ।
सन् २०१७ में प्रतिनिधिसभा के चुनाव में रेशम ३४,३४१ मत लाने में सफल हुआ था । चौधरी के प्रतिद्वन्दी तत्कालीन बाम गठबंधन के उम्मीदवार मदन कुमारी शाह द्वारा लाए गए मत का दुहरा है । यह क्या स्पस्ट करता है ? और कुछ नहीं हत्या के आरोप में कुछ प्रतिनिधि सत्ता का लुत्फ उठा रहे हैं वही रेशम चौधरी को तरसाया जा रहा है । क्या यह नेपाली राज्य का दोहरा चरित्र नहीं ?
राज्य की नीति बहुत भ्रमित है, रेशम के मुद्दा पर । पिछली बार जब तत्कालीन प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दहाल भारत दौरा के दौरान भारत के दिल्ली में रेशम से मुलाकात की थी जबकि नेपाली सत्ता के नजर में रेशम फरार अभियुक्त भी था । सिर्फ भेटघाट ही नहीं रेशम को एक करोड़ चौहत्तर लाख रकम क्षतिपूर्ति स्वरुप प्रदान किया था । यह क्यों किया गया होगा ?
कानूनी राज
वास्तव में कहा जाय तो टिकापुर घटना नेपाल के प्रजातान्त्रिक आन्दोलन में एक काला धब्बा है, इसमें कोई दो राय नहीं । और यह घटना आने वाली पीढ़ी को डराती रहेगी । और टिकापुर घटना के दोषी को सजा न देना नेपाल के सुरक्षा व्यवस्था और कानूनी राज के के कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है । सिर्फ इतना ही नहीं । टिकापुर घटना के पश्चात सैकड़ों थारु युवा विस्थापित हुए । दर्जनों थारुओं पर मुद्दा चलाया गया है । एमनेष्टी इन्टरनेशनल के प्रतिवेदन को आधार माना जाय तो एमनेष्टी के द्वारा हिरासत में लिए गए के साथ अन्तर्वार्ता में २२ बन्दी का कहना था कि उन्हें थाने में चरम यातना दी गयी ।
घटना के कुछ वक्त के बाद ही ५८ थारुआें पर मुद्दा लगाया गया । जिन में से २२ थारुओं को कस्टडी में रखा गया है, जो अभी भी हिरासत में हैं । सन् २०१७ में तत्कालीन सरकार ने उनलोगों पर लगाया गया मुद्दा फिर्ता करने का निर्णय भी लिया था । परंतु नेपाली मीडिया के आलोचना के कारण सरकार ने अपना कदम पीछे ले लिया था । परंतु यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि सरकार वैसा निर्णय लेने की हिम्मत कैसे दिखा पाई ? कम से कम किसी न किसी प्रकार का अनुसंधान अवश्य किया होगा । यद्यपि लेखक का यह कहना नहीं है कि किसी भी दोषी को सजा न मिले ।
ऐसी अवस्था में यह प्रतीत होता है कि सरकार नेपाल प्रहरी से भी उच्च समझती है अपने आप को । वर्तमान सरकार को इस मुद्दे को गंभीरता के साथ लेना चाहिए । सबसे पहले इस घटना का सूक्ष्म और निष्पक्ष अनुसंधान होना चाहिए । दूसरा, थाने में रहे आरोपित थारु जिनका मुद्दा विचाराधीन है और अगर वे लोग निर्दोष साबित हुए तो क्या उन्हे क्षतिपूर्ती प्राप्त हो सकती है ? बिल्कुल नहीं । क्योंकि नेपाली कानून में ऐसी व्यवस्था ही नहीं है । इसी तरह टिकापुर हत्याकाण्ड में बिना अनुसन्धान किए हुए मुद्दा चलाना और थारुओें पर जिनके द्वार उन सबको खुली छूट देना नेपाल के फौजदारी प्रक्रिया में “सेलेक्टिव प्रोसिक्यूसन” को स्थान देना है । जो की बिल्कुल अमान्य है, कानुनी शासन का वकालत करने बाले देश के लिए ।
लेखक से एक संवाद के क्रम में राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल के उपाध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य बृखेषचन्द्र लाल ने कहा था कि “हम सरकार को चुनौती देना चाहते है । संबिधान की कौन सी धारा है जो रेशम चौधरी को शपथ ग्रहण और निर्वाचित होने का प्रमाणपत्र लेने से रोक रहा है ? बताए हमें । अगर रेशम को न्याय नहीं मिला तो हम सड़क पर उतर कर संघर्ष करेंगे ।
अब आगे ?
जिस तरह रेशम चौधरी हिरासत में आमरण अनशन पर थे और वर्तमान गृहमन्त्री रामबहादुर थापा ने उनको जूस पिला कर आमरण अनशन तुड़बाया था उसी तरह अब सरकार तत्काल निर्वाचित प्रतिनिधि को शपथ ग्रहण करबाए तो बेहतर, कानूनी राज स्थापित हो सकता है । रेशम का मुद्दा विचाराधीन है । और सरकार को अदालत से ऊपर नहीं जाना चाहिए, लोकतन्त्र की मान्यताआें के मुताबिक । सरकार यह लोकतान्त्रिक कदम उठाकर थारुआें में उत्पन्न अलगथलग की भावनाओं का सम्बोधन कर सकती है । और रेशम निर्वाचित होने के बावजूद भी जिस तरह से उनके क्षेत्र के लोग जनप्रतिनिधि विहीन अवस्था में है उसका भी सम्मान होगा ।
सिर्फ इतना ही नहीं । टिकापुर घटना और तत्पश्चात थारुआें के उपर किए गए अनुसन्धान और अगुवाई में भी विभेद दिख रहा है उसका विरोध करना हरेक मानव अधिकारवादी, नागरिक समाज को अपना कर्तव्य मान कर वकालत करना चाहिए । सरकार को यथासम्भव टिकापुर काण्ड की गुत्थी सुलझा कर घटना में संलग्न दोषियाें को सजा देनी चाहिए और पश्चिम मधेश में सुलग रहे ‘साइलेन्ट रिवोलिउसन’ को देश हित के खातिर व्यवस्थापन करना चाहिए । नहीं तो अभी की सरकार “प्रजातान्त्रिक तानाशाह” की सरकार है यह बात लोगों को कहने में देर नहीं लगेगी ।

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