Tue. Sep 18th, 2018

सुनिताका राजनीतिक सफर और चुनौतियां


मेहतर समुदाय से प्रथम महिला सुनीता मेहतरनी हैं जो जनकपुर उपमहानगरपालिका के बोर्ड सदस्य में चुनी गयी हैं । राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल की सदस्य सुनीता जनकपुर ३ से सदस्य पद में विजयी हुई हैं, फिर बोर्ड मेम्बर में भी उनको चूना गया ।
नेपाल के संविधान ने दलित को कुछ हद तक अधिकार दिया है, परन्तु यह समाज अब भी वह अधिकार प्रयोग करने से रोक लगा रही है । सुनीता को स्थानीय निर्वाचन में स्थानीय लोगों ने जिताया तो जरुर है, किन्तु बहुत सारी चुनौती रख दी है । हिन्दु समाज में सबसे निचले दर्जा में मेस्तर समुदाय को माना जाता है । वह इतना पिछड़ा समुदाय है कि अब भी सड़क, नाला और शौचालय साफ कर अपना जीवन व्यतीत करता है । उच्च वर्गीय समाज तो अब भी मेस्तर समुदाय को अलग और नीच दृष्टि से देखते हैं । इस दौरान सुनीता ने जो हिम्मत की है वह निभाना इतना सहज नही है ।
मैट्रिक तक की शिक्षा हासिल सुनीता अपने समुदाय के लिए आगे बढ़ना चाहती है । वहीं पर कुछ अन्य समुदाय के लोग खुशी जताने की बजाय चरित्र चित्रण कर घरवालाें को भड़काने का काम कर रहे हैं ।
सुनीता का मानना है कि मनुष्य पैदल से अब हवाई मार्ग में उड़ने लगा है । परन्तु मेहतर समुदाय को अब भी देखने की दृष्टि में बदलाव नहीं हुआ है । सबसे पहले हम अपने समाज में शिक्षा और जनचेतना लाएँगे उसके बाद राजनीति में दखल देंगे ।
वह कहती है चुनावी प्रतिस्पर्धा में हमारी जीत तो अवश्य हुई है । किन्तु पुरुष समाज अधिकार विहीन बनाकर रखना चाहता है । स्थानीय वार्ड सदस्य में विजयी होना खास उपलब्धि नहीं है । फिर भी राजनीति और समाजिक छुआछूत तोड़ने का रास्ता कहा जा सकता है । घर के लोग खुश होते हुए भी पड़ोस के लोग उतने ही दुःखी और चिन्तित हंै ।
सुनीता का पति भी मैट्रिक पास है । किन्तु अब भी वह एक विद्यालय में शौचालय और प्राङ्गण साफ किया करता है । मासिक पाँच से सात हजार उनकी तनखाह है । वह मानती है कि अगर दूसरे समुदाय में कोई मैट्रिक तक शिक्षा हासिल किया होता तो शौचालय सफाई की नौकरी नही करता । यह विभेद राज्य और समाज ने भी किया है ।
सुनीता समाज के कुछ लोगों को धन्यवाद का पात्र मानती है, जिन्होंने दलित कोटा से राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया है । परन्तु आर्थिक चिन्ता सताई जा रही है । जिसकी छाया से मनुष्य तो क्या भगवान का मन्दिर भी छुआ जाता था । आज वही दलित महिला समाज में एक साथ उठने—बैठने और सभा सम्मेलन में सहभागी होने का जो सौभाग्य मिला है उससे वह खुश है । फिर भी जिस प्रकार की उपलब्धि होनी चाहिए उसकी तलाश में प्रतीक्षारत है ।
राजनीति में आने के बाद वह शिक्षा और संघर्ष ही अपना कर्म मानती है । वह सबसे पहले अपने समुदाय को शिक्षित होने के लिए प्रेरित करने का संकल्प करती है । आँख होते हुए भी अगर शिक्षित नही है तो अन्धा ही कहा जाएगा ऐसा मानना है ।
वह दलित के समाज के उत्थान, शिक्षा और रोजगारी के लिए राजनीति मञ्च को प्रयोग करने का विश्वास दिलाना चाहती है । साथ ही राजनीतिक यात्रा में सहभागी के लिए भी आग्रह करती है । वैसे सुनीता की पति का सहयोग बहुत ज्यादा रहा । अपने पति संतोष मेहतर के प्रेरणा से राजनीति में लगने की ठान ली । उनकी सास को बहु का राजनीति में लगना थोड़ा सा भी गँवारा नही है ।
समाज के लोगों की लाञ्छना सुनने की वजह से भी सास अपने बहु पर राजनीति में ना जाने के लिए दबाव बनाती रहती है । सुनीता कहती है– पति का साथ न होता तो आज मैं राजनीति शब्द से अन्जान ही रहती ।
राजनीति में आने के बाद सुनीता में अपने समुदाय के विकास के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा अभी से ही देखने को मिलता है । उसने बाल विवाह जैसी कुप्रथा को जैसे भी हो तोड़ने का संकल्प ले लिया है । शिक्षा की भी मेहतर समुदाय में कोई अच्छी प्रगति नहीं है । शिक्षा की क्रान्ति भी लाना उनकी सोच है ।
जिस मोहल्ले मे सुनीता रहती है उस मोहल्ले मे मेहतर समुदाय को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है । वो कहती है साफ सफाई जैसा पूण्य का काम क्या हो सकता है ? वो राजनीति के माध्यम से समाज में बदलाव लाना चाहती है ।
– कैलास दास

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janakpur kaa nich soch ble to borodh jarur karega