Tue. Sep 18th, 2018

हिमालिनी, अंक जून 2018 । आज से लगभग दस बर्ष पूर्व की बात है । बी.उ.बा.संघ के सभाकक्ष में नेपाल के अर्थ सचिव और विभिन्न उच्च पदस्थ सरकारी कर्मचारियाें के साथ स्थानीय उद्योगी व्यापारियाें की एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी । मैं बतौर संस्था के अध्यक्ष के रूप में मंच पर उपस्थित था । गरमागरम बहस छिडी हुई थी और मुझे सीने में हल्की सी चुभन एवं गले में कुछ अटका हुआ सा अनुभव हो रहा था ।

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उन दिनो पारिवारिक एवं व्यवसायिक कार्य के साथ साथ संस्था के अध्यक्षीय जिम्मेदारी निर्वाह करने के व्रmम में शारीरिक एवं मानसिक व्यस्तता अविश्वसनीय तौर पर बढी हुई थी । वो दिन मुझे बखुबी याद है, मुझे लगा, ‘कार्यव्रmम के सफल आयोजन के दबाव की वजह से मैं थक गया हुँ ।’ दूसरे दिन, मैनें डाक्टर से सलाह ली, डाक्टर ने सुझाव दिया, ‘काठमाण्डौ में गहन जाँच करवानी चाहिए ।’
हाथाेंहाथ, मंैने तीसरे दिन शाम की प्mलाईट की बीरगंज– काठमाण्डौ की टिकट बुक करवा ली । जल्दवाजी में, बी.उ.बा.संघ के कुछ अटके हुए कार्यो को आगे बढ़ाया, अन्य सहयोगी पदाधिकारियाें को मेरी यात्रा की जानकारी दी, कुछ निकट के दिनाें के कार्यो को सम्पादन करने का अनुरोध भी किया । मैने कुछ रुके हुवे व्यवसायिक कार्यों का निपटारा किया, सिद्धार्थ बैंक लि. के मैनेजर, श्री कमल बसनेत एवं कुछ ही दिनों पहले बीरगंज भंसार स्थानान्तर प्रमुख श्री केवल भण्डारी के साथ बैठकें हुई । उसी दिन, शाम ४ बजें नार्भिक अस्पताल, काठमाण्डौ में डा. भरत रावत – हृदय रोग बिशेषज्ञ ) के समक्ष प्रस्तुत हुआ, एन्जीओग्राफी हुई, दो आर्टरीज नब्बे प्रतिसत अवरुद्ध पाये गए, हाथोहाथ एन्जीओप्लाष्टी सर्जरी हुई ।
तीन दिन पूर्व तक खुद को शतप्रतिशत स्वस्थ्य समझने वाला, मैं हृदय रोगी में परिवर्तित हो चुका था । डाक्टर ने मेरे हृदय रोग का इकलौता कारण तनाव बताया । मेरा यह वृतान्त यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयोजन केवल एक ही है कि लोग यह जानें कि तनाव किस हद तक हमें नुकसान पहँुचा सकती हैं ।
तनाव किसे कहते हैं ? अगर अत्यधिक कार्यभार की वजह से अथवा अन्य विभिन्न परिस्थितियाें की वजह से हमारे अन्दर मानसिक दबाव स्वयम की वहन क्षमता से अत्यधिक हो तो उसे तनाव कहा जाएगा । निसंदेह यह मानसिक समस्या है, किन्तु इसका प्रभाव इन्सान के मनोस्थिति तक सीमित नहीं रहता, शरीर के रोम रोम तक पहँुच जाता है ।
आज से लगभग १६ बर्ष पूर्व मारवाड़ी युवा मंच के आयोजन में ‘ तनाव से मुक्ति कैसे ?’ बिषय पर आदरणीय समणी जी बडेÞ सरल तरीके से प्रवचन दिया था, बतौर सहभागी, मैनें उनकी सुझाई हुई कायोत्सर्ग एवं अन्य कई बातों को अपने जीवन चर्या का हिस्सा भी बनाया । भागमभाग की इस दुनिया में धीमें धीमें मैं एैसा खोया, सब कुछ भूल गया, केवल याद रहा काम काम काम । परिणाम सभी के सामने हैं । मेरे शुभचिन्तक आज भी कहते हंै, ‘ गणेश को हृदय रोग हो ही नहीं सकता, क्योंकि यह तो अपने शरीर का पूरा खयाल रखता था, नियमित रूप में योग और प्राणायाम करता था, तैलीय भोजन से दूर ही रहता था ।’ किन्तु मेरी आत्मा जानती है, ‘ मैंने अपने अन्दर तनावों की जमात जमा कर रखी थी । परिवार का तनाव, ब्यापार का तनाव, समाज का तनाव, आसपास हो रही घटना व्रmम का तनाव इत्यादि इत्यादि ।’
तनाव अच्छी बात नहीं है, यह बात तो समझ में आ गई थी । किन्तु तनाव की वजह से हृदय रोग कैसे हो सकता है, यह बात तकनीकी तौर पर समझ नहीं पाया था । कुछ बरस के पश्चात मेरे हाथ ‘मुल्य शिक्षा एवं अध्यात्म’ नाम की एक पुस्तक आई और मुझे तनाव के परिणाम तकनीकी तौर पर भी समझ में आ गए ।
पुस्तक में लिखी हुई बातों को माने तो इंसान का शरीर केवल चमड़ी, रक्त, हड्डी और मांसपेशिया मात्र नहीं होती । वरण इसके अन्दर इन्द्रीय, स्नायु तन्त्र, ग्रन्थि और नर्वस प्रणाली इत्यादि का समूहगत सहकार्य र स्वायत्त कार्यविभाजन के द्वारा सञ्चालित अति सुन्दर कार्य प्रणाली भी होती है । इंसानी शरिर के कार्यसम्पादन को दुरुस्त रख्ने के लिए इन नर्वस प्रणाली के तहत सिम्पेथेटिक और पारासिम्पेथेटिक प्रणाली की मुख्य भूमिका होती है । सिम्पेथेटिक नर्वस प्रणाली छाती तथा कमर के क्षेत्र में उत्पन्न होता है । पारासिम्पेथेटिक नर्वस प्रणालीे मष्तिष्क के क्षेत्र में उत्पन्न होता है । एक गति बढ़ाने का कार्य करता है तो गति में अवरोध बनाता । दोनों के बीच उचित सहकार्य एवं समझदारी ना हो तो, शरीर के अन्य अंग प्रभावित होने लगते हैं । तनाव की वजह से सर्वप्रथम इन्हीं दो नर्वस प्रणाली के बीच तालमेल बिगड़ता है । परिणामस्वरूप इंसान विभिन्न रोगाें से ग्रस्त होता है, जिसमें एक हृदय रोग भी है ।
वरिष्ठ हृदय रोग बिशेषज्ञ एवं साईन्स एण्ड आर्ट आँफ लिभिंग के संस्थापक डा. प्रवीण छाजेड ने भी अपनी एक पुस्तक में तनाव को हृदय रोग का प्रमुख कारक तत्व के रूप में बखुबी दर्शाया है । बिद्वानों के कथनानुसार ,तनाव को मुलतः तीन भागों मे विभाजित किया जा सकता है
१) अपने नियन्त्रण से बिलकुल परे, विभिन्न राजनैतिक, गैर राजनैतिक , राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय नकारात्मक घटनाव्रmम की वजह से उत्पन्न हुआ तनाव ।
२) अपने नियन्त्रण से बिलकुल परे, स्वयम पर अथवा अपने परिवार, व्यवसाय, नातेदार, ईष्टमित्र पर आई आपदा की वजह से उत्पन्न हुआ तनाव ।
३) अपनी छोटी बडी भूल, अनदेखी या लापरवाही से उत्पन्न हुई समस्या की वजह से अथवा किसी के मान अपमान द्वारा उत्पन्न हुआ तनाव ।
विभिन्न विद्वानों ने सुझाया है कि एक एवं दो नम्बर की समस्या आपके स्वयम के काबु की नहीं है । अतः काबु से बाहर की बातों में तनाव रखना व्यर्थ ही होगा । हाँ, आप विपदा में फसे लोगो को अपनी सामथ्र्यानुसार सहयोग अवश्य प्रदान करें, अपने लोगो के बीच उचित सहयोगी रूप में प्रस्तुत होवें, मन को शान्ति मिलेगी । तीन नम्बर की समस्या का समाधान भी आप तभी खोज पाओगे जब आप तनाव से मुक्त रहोगे । अर्थात तनावग्रस्त लोग सही निर्णय नहीं ले पाते हैं ।
इस अवस्था में तनाव मुक्त रहने का सही उपाय है, ध्यान का अभ्यास, योग, प्राणायाम, अच्छी पुस्तकों का अध्ययन, उचित विचार, उचित संगत एवं उचित खानपान । परिवार एवं ईष्टमित्रों के बीच हल्के फुल्के माहौल में कुछ समय बिताना भी हमें तनाव से दूर ले जाता है । घर की समस्या को घर में छोड़ कर आँफिस के लिए प्रस्थान होना एवं आफिस की समस्या आफिस में ही छोड़ कर घर के लिए रवाना होना भी बहुत ही पुराना किन्तु शत प्रतिशत अजमाया हुआ अचूक उपाय है ।
स्वर्गीय आचार्य सत्यनारायण गोयनका जी का कथन है, तनाव का मुल जड़ ही राग एवं द्वेष हैं । इंसान अपना जीवन समता में जीना सीख ले तो तनाव ही क्यों समस्त मानसिक विकारो से मुक्त हो जाये । तनाव से निजाद पाने का एक सशक्त एवं सहज उपाय विपश्यना ध्यान है ।
किसी भी अर्थ में, तनाव को अपने से दूर ही रखना श्रेयस्कर रहता हैं । मेरे इस मनोभाव को लिपीबद्ध करने का एक ही उदेश्य है, ‘ मेरे साथ जो दुर्घटना घटित हुई है, उस से सभी कोई एक सबक लें, अपनें एवं अपनों को तनाव से दूर ही रखें ।’

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