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ये जनता है, सब जानती है और मधेश भावुक हो सकता है पर मुर्ख नहीं : श्वेता दीप्ति

0 September 5, 2017

  पहाड़ का दर्द भी अलग नहीं है |(सम्पादकीय ) हिमालिनी, अगस्त अंक | प्रकृति की मार ने रुह को सर्द कर दिया है । कमजोरियों और खोखली व्यवस्थाओं के पोल खुल...

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दूसरे चरण का चुनाव सम्पन्न : माहोल कहीं खुशी और कहीं गम

0 July 24, 2017

श्वेता दीप्ति, कहीं खुशी, कहीं गम, सम्पादकीय (जुलाई अंक ) बारिश का मौसम इंतजार का मौसम होता है । कृषक इसका इंतजार करते हैं, अच्छी उपज के लिए और आम जन ...

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चुनौतियों से घिरी देउवा सरकार

0 July 2, 2017

अनुमानतः छः लाख नेपाली नागरिक कतार में हैं जिनका भविष्य फिलहाल अँधेरे में है । इस ओर सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है । श्वेता दीप्ति,(सम्पाद...

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चुनावी गठबन्धन,प्रजातंत्र का विकृत नमूना पेश किया जा रहा है : श्वेता दीप्ति

0 May 14, 2017

यह गहन प्रश्न कैसे समझाएँ ? दस बीस अधिक हों तो हम नाम गिनाएँ । पर, कदम कदम पर यहाँ खड़ा पातक है, हर तरफ लगाए घात खड़ा घातक है । – दिनकर श्वेता दीप्ति ...

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लोकतंत्रीय व्यवस्था महज दिखावा तो नहीं ? श्वेता दीप्ति

0 April 20, 2017

चुनावी चिन्ह पार्टियों को प्राप्त नहीं हुए हैं, मतदाताओं की नामावली सूची नदारद है, ऐसी ही कई तकनीकी समस्याएँ हैं, ऐसे में क्या एक निष्पक्ष और भयमुक्त ...

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बन्द करो यह खून की होली,जो रक्त बहा वह, एक इंसान का था… : श्वेता दीप्ति

0 March 23, 2017

सरकार का कहना है कि सप्तरी में जो हुआ उसका आदेश नहीं था, तो क्या प्रहरी अपनी मर्जी चला रहे हैं ? अगर ऐसा है तो क्या ऐसे निरंकुश प्रहरी प्रशासन के बल प...

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सीके राउत को गिरफ्तार करके देश बचाने की वकालत की जा रही है : श्वेता दीप्ति

0 February 22, 2017

जब भी देश किसी निर्णायक मोड़ पर होता है और जनता की आंखें किसी परिणाम की उम्मीद करती है, तो एक सोची समझी नीति के तहत सत्ता ऐसा कदम उठाती है कि, जनता का...

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हिन्दी प्रेम,मिलन और सौहार्द की भाषा है : श्वेता दीप्ति

0 January 9, 2017

हिन्दी भाषा प्रेम,मिलन और सौहार्द की भाषा है। यह मुख्यरूप से आर्यों और पारसियों की देन है। हिन्दी के ज्यादातर शब्द संस्कृत,अरबी और फारसी भाषा से लिए ग...

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“पाकिस्तान भूटान या नेपाल नहीं है” परवेज मुसर्रफ की उक्ति पर नेपाल चुप क्यों : श्वेता दीप्ति

1 October 19, 2016

खुश रहो, क्योंकि उनके जेब भरे हुए हैंश्वेता दीप्ति, १९-०१६,  (सम्पादकीय,अक्टूबर अंक), शारदीय नवरात्र की छटा हर ओर बिखरी है, बाजारों में, मंदिरों में औ...

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अटकलों का बाजार गर्म है-श्वेता दीप्ति

May 28, 2016

वर्ष-१९,अंक-१,मेई २०१६ (सम्पादकीय) वक्त की धार और मार दोनों ही बहुत तेज होती है । धार, जो बहा ले जाती है अपने साथ अमूल्य क्षणों को और मार, जो दे जाती ...

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अनुदान और सहयोग में सिमटी राजनीति-श्वेता दीप्ति

April 26, 2016

वर्ष-१९,अंक-१,अप्रिल  २०१६ (सम्पादकीय) आत्मनिर्भरता मनुष्य को सबल बनाता है और सबल मनुष्य समाज को और समाज राष्ट्र को सबल बनाता है । नेपाल की वस्तुस्थित...

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महिला अधिकार का चीरहरण-श्वेता दीप्ति

March 16, 2016

वर्ष-१९,अंक-१,मार्च  २०१६ (सम्पादकीय)मौसम अपनी करवटें बदल चुका है । बसन्ती बयार और फाल्गुनी फिजा ने अपना रूप दिखाना शुरु कर दिया है । परन्तु, देश का म...

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संशोधन का तोहफा: श्वेता दीप्ति

February 9, 2016

वर्ष-१९,अंक-१,फरवरी २०१६ (सम्पादकीय)अनिश्चितताओं का दौर जारी है, समाप्ति के आसार नजर नहीं आ रहे । इसी बीच जनता ने चार महीने पुराने संविधान में संशोधन ...

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ओली सरकार कुर्सी बचाने के लिए सांसदों को मंत्रालय का उपहार दे रही है : श्वेता दीप्ति

January 15, 2016

वर्ष-१९,अंक-१,जनवरी २०१६ (सम्पादकीय) बिना किसी विशेष उपलब्धि के बीता हुआ वर्ष नेपाल की जनता को कई दर्द दे गया । अभाव और पीड़ा को झेलता जनमानस, उम्मीदो...

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संविधान किसी वर्ग विशेष का नहीं हो सकता

December 15, 2015

सम्पादकीय राजधानी में जितनी तेज सर्द हवाएँ चल रही हैं, उतनी ही तेज सरगर्मी सत्ता की गलियारों में भी है । फर्क इतना है कि यह सरगर्मी देश को समस्याओं से...

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विकल्प नहीं समाधान

November 12, 2015

न तुम बदले न मौसम बदला, दिलों के जज्बात जरूर बदल गए । भाईचारा, सद्भाव, बंधुत्व ये सारे शब्दों के मायने और अर्थ आज के परिप्रेक्ष्य में बदलते नजर आ रहे ...

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संविधान निर्विवाद हो सकता था, अगर उसमें सम्पूर्ण देशवासियों का सम्बोधन होता : श्वेता दीप्ति

0 October 12, 2015

सम्पादकीय देश ने नए संविधान को पाया है । निःसन्देह यह एक अविस्मरणीय क्षण होता है, किसी भी देश के लिए जब उसका अपना संविधान होता है । गणतंत्र में जीने क...

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हर घड़ी दर्द में पैबन्द लग जाते हैं

0 September 18, 2015

सम्पादकीय सत्ता का खेल भी अजीब होता है । कभी तो जनता की उम्मीदों को जगाकर सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी नेता तैयार करते हैं और कभी उन्हीं उम्मीदों की कफन ...

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उलझनों का दौर जारी

0 August 20, 2015

बड़े ही तामझाम के साथ सुझाव संकलन की प्रक्रिया सम्पन्न हो गई । नेताओं का उनके ही चुनाव क्षेत्र में विरोध किया गया तो कही. नेतागण बन्द कमरे और प्रहरी स...

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वक्त अब भी है आत्मविश्लेषण करें

0 July 16, 2015

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत अर्थात् उठो, जागो और जब तक तुम अपने अंतिम ध्येय तक नहीं पहुँच जाते, तब तक चैन न लो । विवेकानन्द की यह घोषणा आज क...

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नेपाल के नवनिर्माण में सहयोग दें

0 June 15, 2015

पिछले महीने देश ने जो भोगा वह अप्रत्यासित था, उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी । किन्तु, अब जो देश के कर्णधार करेंगे, वह तयशुदा होगा । पराकम्पन धीरे–धीर...

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प्रकृति ने गलत नहीं किया, यह उसकी अपनी गति है : श्वेता दीप्ति

0 May 31, 2015

बाढ़ की सम्भावनाएँ  सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने  हैं । चीड़–वन में आँधियों की बात मत करो, इन दरख्Þतों के बहुत नाजुक तने हैं । – दुष्यन्त कुमा...

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इंतजार की एक और तारीख

0 April 13, 2015

सम्पादकीय वि.सं. २०७२ दस्तक दे रहा है और उसके साथ ही राजनेताओं के द्वारा तय की गई एक और तारीख भी । कुछ हो ना हो हमारे नेता समय निर्धारण में सबसे आगे र...

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तमाशा बनता लोकतन्त्र

0 March 16, 2015

सम्पादकीय खुला मंच में तीस दलीय मोर्चा द्वारा हुए शक्ति–प्रदर्शन के पश्चात् एक बार पुनः सहमति के द्वारा संविधान निर्माण की छोटी सी उम्मीद की किरण दिखी...

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नेपथ्य का रहस्य

0 February 14, 2015

सम्पादकीय प्रयत्न करने से ही कार्य पर्ूण्ा होते हैं, किन्तु इसमें सम्बन्धित पक्ष की प्रतिबद्धता आवश्यक होती है र्।र् इमानदारी से अगर किसी कार्य के पीछ...

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र्सार्क, उपहार और ऊर्जा समझौता

0 December 18, 2014

सम्पादकीय र्सार्क आया और चला गया । उम्मीदों के कई पुलिन्दे थे जो खुले भी, किन्तु फिर उसी में सिमट कर रह गए । अन्य र्सार्क सम्मेलन की भाँति इस १८वें सम...

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आतिथ्य की तैयारी में व्यस्त राजधानी

0 November 15, 2014

सम्पादकीय उत्साह और उमंग का मौसम जा चुका है । त्योहारों का खुमार उतर चुका है । फिलहाल नजरें संघीयता और संविधान पर टिकी हर्ुइ हैं । जनता की मनोदशा बन च...

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सम्पादकीय

0 September 3, 2014

पीडा  अपनों की प्रकृति का प्रकोप हर वर्षहमें पीडा का वह दंश दे जाता है जिससे उबरने की कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है । प्रत्येक वर्षदेश को इन हालातों ...

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सम्पादकीय विचारणीय मुद्दे

0 May 14, 2014

संविधान प्राप्ति के दर्ीघकालीन सपने को साकार करने हेतु नेपाली जनता ने दूसरे संविधान सभा के निर्वाचन में बढÞ-चढÞ कर हिस्सा लिया । फलस्वरूप नेपाली कांग्...

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संपादकीय

0 February 2, 2012

लोकतन्त्र एक जीवंत और लगातार अपने अनुभवों से समृद्ध होनेवाली व्यावस्था है। पञ्चायती व्यावस्था ओर राजतन्त्र को खत्म कर ०६२/०६३ के वाद नेपाल को गणतन्त्र...

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संपादकीय

0 January 13, 2012

संवैधानिक संसद बनने के बाद नेपाली जनता ने लम्बी साँस ली थी। उसे लगने लगा था कि अब नेपाली राजनीतिज्ञ सांसद लोग संविधान निर्माण कर नेपाली जनता में व्याप...

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संपादकीय

0 November 22, 2011

नेपाल-भारत बीच स्थापित सम्बन्ध को कुछ परिधियों के तहत स्थापित है, ऐसा मानना हमारी अल्पज्ञानता होगी। नेपाल-भारत बीच स्थापित सम्बन्ध बहुआयामिक दृृष्टि स...

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या देवी र्सवभूतेष शक्ति रुपेण संस्थिता

0 September 29, 2011

या देवी र्सवभूतेष शक्ति रुपेण संस्थिता नमस्तस्यैं नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमों नमः २०६८ विजया दशमी की शुभकामना । माँ दर्गा हम सभी को नेपाली जनता की चिर प्...

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संपादकीय

0 September 10, 2011

०६२/६३ जनान्दोलन के बाद प्रत्येक जनता की अभिलाषा थी कि अब देश में अहिंसा से प्रेरित शान्तिपर्ूण्ा समाज की स्थापना होगी, प्रजातान्त्र भी मजबूती होगी तथ...

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सम्पादक की कलम से…

0 July 5, 2011

शान्ति एवं संविधान देश में चर्चा का विषय र्सवांधिक महत्वपर् रहा है। फिर भी सभी पार्टर्वं वरिष्ठ नेताओं के बीच आपसी अर्न्तर्संर्घष् सत्तालिप्सा तथा देश...

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सम्पादक की कलम से…

0 June 9, 2011

समीप आती जाती है, त्यों-त्यों नेपाल में राजनीतिक महाप्रलय आने की त्रास र्सवत्र छा जाती है। अन्तिम घडी में नेपाली जनता की चहल कदमी सोचने को बाध्य करती ...

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सम्पादक की कलम से …

0 May 16, 2011

“कालो  न जातः वयमे व जातः” समय नहीं खत्म हो ता हम लोंग कालकवलित हो ते  जा र हे  हो ते  हैं । इसी सत्याधार  पर  हर े क प्राणी के  जन्म के  ...