साहित्य और स्त्री सशक्तिकरण : डॉ तुलिका मिश्र

नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो

हिमालिनी मार्च २०१८ अंक | फरवरी के आते ही प्रेम जैसे मौसम में छा जाता हो, ऐसा मात्र वैलेंटाइन्स डे के भारत में प्रचलन से नहीं, बहुत पहले से होता आया है. प्रायः मौसम का जायका ही प्रेम और प्रीत से भरा होता है वसंत में । जब शीत लहर से सिकुड़े अंग ऊनी परतों के भीतर से निकलने लगें ,जब बर्फ और शीत की चादर की तहों से रंग बिरंगे फूल लहराने लगें, जब दिन भर कुहासे से भीगा सूरज फिर जÞरा जÞरा दहकने लगे और ठंढ से किटकिटाते दांत गुनगुनाने लगें तो प्रेम भी उछाल कैसे न लेने लगे.बाह्य मौसम अंतर्मन को प्रभावित तो करता ही है न !

Tulika Misra

डॉ तुलिका मिश्र

प्रेम शब्द सुनते ही साहित्य की अनेकों रचनाएँ, चरित्र मन में कौंधने लगती हैं– आखिर प्रेम में भी मापदंड तो तय करती हैं ये चरित्र. कभी दिनकर की ‘उर्वशी’ जो प्रेम और सौंदर्य का काव्य है और प्रेम और सौंदर्य की मूल धारा में हमारे जीवन में प्रेम को एक प्रकार से परिभाषित करती है, तो कभी उपमा –अलंकारों से लैस कालिदास की प्रेम, सौंदर्य और अभिजात्य से परिपूर्ण “शकुंतला”. राधा –कृष्ण के पारलौकिक प्रेम की तो बात ही क्या ! अधिकांश प्रेम पर आधारित काव्यों में स्त्री की एक अहम् भूमिका रही है, और जब भी हम इन साहित्यों को पढ़ते हैं, इन चरित्रों को समीप से जानने की कोशिश करते हैं, हम देखते हैं कि यहाँ नैसर्गिक सौंदर्य की ही बात हो रही है, कृत्रिमता से कोसों दूर. इनमे एक और खÞास बात की उस युग में जब औरतों की स्वतन्त्रता पर कोई बहस नहीं थी, उनके अस्तित्व पर कोई खÞतरा नहीं था, स्त्री एक अत्यंत सुदृढ़ चरित्र बनकर ही सामने आयीं, वो बस एक नायिका नहीं, अपितु प्रेम के दो किरदारों में एक अधिक सशक्त चरित्र बन कर अनेक आयामो को लिए उभर कर आई इतनी सशक्त कि वो मात्र सौंदर्य की मूरत नहीं, तेरहों कला से परिपूर्ण, विद्या की धनी, स्वाभिमान से ओतप्रोत एक अत्यंत गरिमामयी चरित्र बनकर सामने आती हैं । प्रेम में लिप्त होकर भी इनके किरदारों में कभी स्वाभिमान की कमी या अपने अधिकारों के प्रति उदासीनता कतई नहीं दिखती, प्रेम में बिलकुल मर्दों के साथ बराबर की हिस्सेदार पाई गयीं, हमेशा अर्धांगिनी बनी ही पायी गयीं । ऐसे में नारी ,मैथिली शरण गुप्त की पंक्तियाँ,
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में….” के विपरीत एक हद तक ही “केवल श्रद्धा” और पीयूष का झरना हैं .. वो इन सब के साथ वो सब हैं जो उनके प्रेमी हैं, वैसी ही हैं जैसा उनके साथ उनके जीवन के सहचर हैं. तभी ऐसी स्त्रियों को बराबर का मान मिला, सम्मान मिला, साहित्य में, इतिहास में और हम सब के मानस पटल पर भी ।
पÞmरवरी के प्रेम से सराबोर मलयांचल बयारों के बाद आता है मार्च का महीना – महिलाओं का महीना, महिला सशक्तिकरण का सांकेतिक महीना । आज जब प्रेम और विवाह में पुरुष और स्त्रियों के ताल मेल का इतना अभाव है, जब प्रेम और विवाह की परिभाषा सहिष्णुता, सहजता से परे है, जहाँ भौतिकता नैसर्गिकता को धकेल सर्वोच्च स्थान पर बैठा है, स्त्री और पुरुष दोनों ही अपने मौलिक गुणों को अस्वीकार करते दिख रहे, जहाँ पुरुषों का पुरुषोचित सौन्दर्य तथा स्त्रियों के स्त्रियोचित सौन्दर्य क्षीण होते जा रहे हैं, वहां संसर्ग, रिश्ते, प्रेम और विवाह के परिभाषा भी स्वाभाविक है बदलते जा रहे । क्यों स्त्री का स्थान आज भारत और विश्व में बदल गया, क्यों आज नारी को जो शुरू से सर्वोपरि स्थान मिला था उसके लिए उन्हें गुहार लगानी पड़ रही है ? आज के आधुनिक युग में भी नारे लगाती औरतों के स्वतंत्रता की मांग, समाज में एक विशेष स्थान की मांग, तलाक और टूटते रिश्तों की दिनानुदिन बढती संख्या, एक बार फिर मुझे साहित्य की तरफ खींचती है क्योंकि आधुनिकता ने तो रिश्तों की मर्यादा ही समाप्त कर दी । जब विज्ञानं हार जाता है, साहित्य उसे संभालता है । बदलते हुए परिवेश में विचलित होना स्वाभाविक है ऐसे में पीछे मुड़कर अपने धर्म, अपने साहित्य, अपने लोक गीतों में ही संभावनाएं दिखाई देने लगती है । परिवर्तन भले ही परंपरा को समेट ले परन्तु परंपरा प्रत्येक युग में जीवित रहती है, रहनी भी चाहिए क्योंकि ये ही हमें आधार प्रदान करती हैं ।
इसलिए मुझे मार्च के महीने में यानि फाल्गुन में, शिवरात्रि के महीने में, खास औरतों के लिए समर्पित महीने में एक बार फिर साहित्य और लोक गीतों के जरिये शिव स्मरण होते हैं । शिव, जो प्रेम और सौन्दर्य की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति हैं और शिव–पार्वती की जोड़ी प्रेम, विश्वास, विवाह की एक अतुलनात्मक उदाहरण । महाकवि विद्यापति और उनका साहित्य अपनी कालातीत, सामाजिक रचनाओं के द्वारा छः शताब्दी गुजÞरने के बावजूद आज भी प्रसांगिक है । उनकी रचनाओं ने लोक जीवन के एक प्रमुख पक्ष “लोकगीत’ को आधार बनाकर अनेकों सामजिक संरचना तथा संचालन में इसके महत्व इत्यादि बिन्दुओं पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने एवं उसका विश्लेषण करने का प्रयास किया है । विद्यापति के गीतों में वर्णीत सामाजिक कुरीतियां एवं जनमानस के आम जीवन मे फैली कुरीतियों ने हमें सोचने पर विवश कर दिया है। “महेशवानी” के अंतर्गत विद्यापति के ऐसे कई लोक गीत हैं जो शिव और पार्वती के किस्से को आम लोगों में प्रचलित करता है, और सुनने वाले, अपने मनोभाव , मानसिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के अनुसार उसे ग्रहण करते हैं, उनका विश्लेषण करते हैं. ऐसा ही एक गीत जो मुझे व्यक्तिगत रूप से हमेशा से झकझोड़ता रहा है वो है—
“आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे ।
तोहे सिव धरु नट भेस कि डमरू बजाबह हे । ।
तोहे गौरी कहैछह नाचय हमें कोना नाचब हे ।।
चारि सोच मोहि होए कोन बिधि बाँचब हे ।।
अमिअ चुमिअ भूमि खसत बघम्बर जागत हे ।।
होएत बघम्बर बाघ बसहा धरि खायत हे ।।
सिरसँ ससरत साँप पुहुमि लोटायत हे ।।
कातिक पोसल मजूर सेहो धरि खायत हे ।।
जटासँ छिलकत गंगा भूमि भरि पाटत हे ।।
होएत सहस मुखी धार समेटलो नही जाएत हे ।।
मुंडमाल टुटि खसत, मसानी जागत हे ।।
तोहें गौरी जएबह पड़ाए नाच के देखत हे ।।
भनहि विद्यापति गाओल गाबि सुनाओल हे ।।
राखल गौरी केर मान चारु बचाओल हे ।।”
– कवि विद्यापति
इन पदों में पार्वती के माध्यम से कवि विद्यापति कहते हैं कि हे शिव ! आज एक महान व्रत का मुहूर्त है और मुझे अथाह सुख की अनुभूति हो रही है । आप नटराज का भेष धारण कर डमरू बजाएं और मुझे नृत्य दिखाएँ । गौरी के इस आग्रह को सुन शिव जी कहते हैंहे गौरी आप हमें नाचने के लिए कह रही हैं पर मैं विवश हूँ, कैसे नाचूं ? क्योंकि नृत्य के फलस्वरूप संभावित चार खतरों से मैं चिंतित हूँ जिससे सृष्टि का बचना मुश्किल हो जायेगा । पहला— नृत्य के क्रम में चाँद से अमृत की बूँदें टपकेंगी जिससे मेरा यह बाघम्बर जीवित हो जायेगा और मेरे बैल, नंदी को खा जायेगा । दूसरा — नृत्य के क्रम में ही मेरे जटा में लिपटे हुए सांप नीचे भूमि पर लोटने लगेंगे, जिसके फलस्वरूप कार्तिक के पाले हुए मयूर उन्हें मार डालेंगे । तीसरा— जटा से निकलकर गंगा भी बाहर आ जाएँगी और उसके सहस्त्र धार बहने लगेंगी, जिसे संभालना बहुत मुश्किल होगा । चौथा — मुंड का माला भी टूट कर बिखर जाएगा और वे सारे प्रेत जीवित हो उठेंगे और आप यहाँ से डर कर भाग जाएँगी और फिर नृत्य भला देखेगा कौन ? इस गीत को गाकर विद्यापति कहते हैं नटराज फिर भी और अपनी ,पत्नी पार्वती के मान की रक्षा करते हुए नृत्य भी करते हैं और सारे संभावित खतरों को भी संभाल लेते हैं ।
विद्यापति के शिव इस गीत में देवों के देव नहीं हैं, वे मनुष्य रूप में हैं, एक साधारण पति हैं जो अपनी, पत्नी के अनुरोध पर विवशताओं को सँभालते हैं, उनकी मान की रक्षा करते हुए उनकी इच्छा पूरी करते हैं । पार्वती के मान की रक्षा करते हुए नट रूप धारण कर, नृत्य दिखाते हैं, ,पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हैं । इस लोक गीत में शिव एक आम पति हैं, गौरा एक ,पत्नी और इस रूप में अगर हम इस गीत का विश्लेषण करते हैं तो जो सामने आता है वो है स्त्रियों का पति के समकक्ष स्थान, पति के ह्रदय में उनके लिए सम्मान, ,पत्नी की इच्छा की पूर्ति पति के लिए एक कर्तव्य बन जाना और सर्वप्रमुख ये की यदि पति–पत्नी के बीच तारतम्य रहे, तो संसार की सारी विवशता धूमिल पड़ सकती है, सारी वीभत्सता एक अभूतपूर्व रम्यता में बदल सकती है ।
जैसे हरेक संस्कृति के केंद्र में एक जीवन दर्शन होता है, वैसे ही प्रत्येक साहित्य के मूल में ही एक जीवन दर्शन होता है । जैसे–जैसे साहित्य आगे बढ़ता है, हमारा जीवन दर्शन परिवर्तित होता जाता है, और दर्शन के परिवर्तन के साथ मानव संवेदनाएं परिवर्तित होती जाती है । युग परिवर्तन के साथ महिलाएं कला कौशल में निपुण होती जा रही हैं, मर्दों के साथ ज्ञान–विज्ञान में मुकाबला कर रही हैं पर आज भी उन पर मर्दों के अत्याचारों की सीमा नहीं और इसलिए मार्च का महीना महिला सशक्तिकरण का सांकेतिक महीना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा । ऐसे में हमारा प्राचीन साहित्य, हमारे लोक गीत मानव संवेदनाओं को, मूल्यों को एक बार फिर से स्थापित करने में, जागृत करने में सक्षम हैं । साहित्य सार्थक जीवन स्थापित करने का प्रमुख स्रोत रहा है, स्त्रियों को उनका सही स्थान दिलाने में आज भी भी प्रायः साहित्य ही सुलभ और सहज माध्यम बन सकता है ।

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