Wed. Sep 19th, 2018

सम्पादकीय,हिमालिनी अंक जून 2018 । आदिगुरु श्री शंकराचार्य जी का मत है कि “अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना योग और प्राप्त वस्तु का रक्षण करना क्षेम कहलाता है” ।  गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि –अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए जो भक्त जन मेरी  उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ । अर्थात उसकी रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं । मनुष्य हरपल प्राप्ति की दिशा में प्रयत्नशील रहता है ।  उसकी भागदौड़ अप्राप्त की प्राप्ति के लिए ही होती रहती है और वह चिंतित रहता है उस सबके रक्षण के लिए जो उसके पास है । और उसकी यही चिन्ता उसे दुविधाग्रस्त बनाए रखती है । जबकि हमारा कोई भी कार्य तभी फलित हो सकता है जब हम संकल्प के विषय में निरंतर सोचते रहें, हमारा चिन्तन पल भर को भी बाधित न हो,  अर्थात् एक निश्चित लक्ष्य के लिए हर संभव प्रयासरत रहना चाहिए  और यह तभी संभव है जब व्यक्ति में संकल्प, समर्पण और संयम हो । लेकिन आज सर्वत्र इन बातों की कमी नजर आ रही है ।
आज के व्यस्ततम समय में हमारी जिन्दगी भागदौड़ में इतनी उलझ गई है कि हम हमेशा तनावग्रस्त रहते हैं । तनाव की वजह से ही वक्त से पहले हम मौत का वरण कर रहे हैं । हार्ट अटैक, सायलेन्ट हार्टअटैक, डिप्रेशन, माइग्रेन ये सभी शब्द आम जीवन का हिस्सा बन गए हैं । धैर्य की इतनी कमी हो गई है कि छोटी–छोटी बातों पर इंसान अपना आपा खो बैठता है और सामने वाले को हानि पहुँचाने से नहीं हिचकता है । ऐसे में आज के इस आपाधापी के युग में प्राचीन समय से चली आ रही योग पद्धति हमारी अधिकतर समस्याओं का समाधान कर सकती है । २१ जून विश्व योग दिवस इसी संदेश को प्रसारित करने के लिए मनाया जाता है कि योग अपनाएँ और निरोग रहें । विश्व इस दिशा में कदम बढ़ा चुका है आइए हम सब इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लें ।
इसी बीच सरकार द्वारा पेश किए गए निराशाजनक बजट के साथ ही, राजनीतिक गलियारे में सत्ता के साथ ससफो के मिलन ने मधेश का दिल जरूर तोड़ा है । हालाँकि अध्यक्ष उपप्रधानमंत्री उपेन्द्र यादव का कहना है कि उन्होंने संविधान संशोधन के लिए ही सत्ता के साथ हाथ मिलाया है, पर मधेशी जनता के लिए यह दिलासा अपाच्य है ।  सत्तारोहण की सीढ़ी हमेशा से जनता बनती आ रही है । चुनाव जीतना हो तो जनता की भावनाओं को उकसाना और फिर उसी भावनाओं को गिरवी रखकर अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगना, इतना ही नहीं, मनोनुकूल पद हासिल जब तक न हो जाय जनता की उन्हीं भावनाओं को कुरेदते रहना, आज की राजनीति के मूल तत्व बन गए हैं । स्वाभाविक सी बात है कि हर राजनेता इन्हीं नीतियों को अपना कर आगे बढ़ने की कवायद में लगा हुआ है । बीस से दो बुँदों पर सिमटी सहमति अगर शून्य पर भी आ जाय तो भी कोई हैरतअँगेज बात नहीं होगी ।
नेपाली जनता को रमादान के इस पाक महीने में ईद की मुबारकवाद के साथ सुखद और समृद्ध भविष्य की अनन्त शुभकामनाएँ ।

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