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अंतरास्ट्रीय जगत में हिंदी का बढ़ता आकाश : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)

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मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), बीरगंज, १० जनवरी,२०१८ | निस्सन्देह हिन्दी आज सारे विश्व में ‘अंतर्राष्ट्रीय भाषा’ के आसन पर विराजमान है। यही कारण है की चाहे वह चीन हो या जापान या फिर रूस हो या अमेरिका  हर देश में जब भाषाओं के ज्ञान की बात होती है तब हिन्दी को विशेष स्थान प्राप्त होता है। हिन्दी अनुवाद की नहीं बल्कि संवाद की भाषा है।

मॉरिशस, भूटान, बांग्लादेश, तिब्बत, म्यंमार, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, थायलैंड, बैंकॉक, इन्डोनेशिया तथा श्रीलंका में हिन्दी के ज्ञान को अति महत्ता प्रदान की गई है। वहाँ यदि रोजगार के अच्छे अवसर तलाशने है तब हिन्दी तथा ‘अच्छी हिन्दी का ज्ञान’ होने की कसौटी को पार करना ही होता है। ख़ास बात ये है कि जहाँ हिंदी की पढ़ाई हो रही है, वहाँ पढ़ाने के लिए स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिल रहें हैं। इस बदलती भूमिका को हम स्वीकार करें और इसका विस्तार करें।

हिन्दी को आज हर जगह पहचान मिली है इसलिए यह  आवश्यक है कि हिन्दी को उचित सम्मान कि दृष्टि से देखा जाए क्योंकि यह न सिर्फ भारत अपितु विश्व में उभरती एक नई पहचान है।

स्वतंत्र भारत में जब पहला लोकसभा निर्वाचन हुआ था उस समय हिन्दी भाषा विश्व में पाँचवे पायदान पर थी । आज उसे प्रथम स्थान का दावेदार माना जा रहा है ।

भाषा की वैश्विकता के दो प्रमुख आधार हैं । प्रथम यह कि कितने बड़े भूभाग में बोली जा रही है और उस पर कितना साहित्य रचा जा रहा है । दूसरी अहम् बात यह है कि वह भाषा कितने लोगों द्वारा व्यवहृत हो रही है ।

आंकड़ों के अनुसार विश्व के लगभग एक सौ पचास विश्व विद्यालयों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन हो रहा है। मारीशस विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ की संसद ने हिंदी के वैश्विक प्रचार के लिए  संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा के रूप में प्रतिष्टित करने के लिए विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना की है।

त्रिनिदाद एंव टोबैगो द्वीप समूहों  मे हिंदी भाषी चालीस प्रतिशत से अधिक है। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज़ में हिंदी पीठ की स्थापना हुई है। अमेरिका में दो करोड़ से अधिक हिंदी भाषी  लोग रहते हैं। अमेरिका में ही लगभग एक सौ पचास से ज्यादा शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी का पठन-पाठन हो रहा है।

इंग्लैंड में हिंदी का स्थान भी अमेरिका की तरह ही यशस्वी है। ब्रिटेन में तो धड़ल्ले से ‘हिंगलिश’ चल पड़ी है। इतना ही नहीं उपन्यासकार और शिक्षक बलजिंदर महल ने हिंगलिश जैसी मज़ेदार भाषा के संसार को व्यापक बनाने के लिए इसकी एक गाइड, शब्दकोष के रूप पेश की है जिसका नाम है-“द क्वीन्स हिंगलिश हाऊ टू स्पीक पक्का।”

1990 में जब सिंगापुर में हिंदी सोसायटी की स्थापना हुई तो सिंगापुर सरकार ने हिंदी को दूसरी ऐसी भाषा घोषित कर दिया जिसे विद्यार्थी सबसे ज्यादा सीखना चाहते हैं।

रशिया में प्रारंभ से ही लोग हिंदी में रुचि लेते रहे हैं। यहाँ प्राथमिक स्तर से लेकर विश्व विद्यालय स्तर तक हिंदी का पठन पाठन होता है।  दो दर्जन संस्थानों में विद्यार्थी हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं।फ्रांस के सौरबेन विश्व विद्यालय में हिंदी भाषा एंव साहित्य संबन्धी पाठ्यक्रम है।

चीन भी पेइचिंग विश्व विद्यालय तथा नानचिंग विश्व विद्यालय मे हिंदी के पठन पाठन होती है। भारतीय विद्या विभाग के संस्थापक प्रो चिशमेन ने वाल्मीकि रामायण, गोदान, राग दरबारी का गंडारिन भाषा मे अनुवाद किया है।

आज वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दी भाषा अपनी लिपि और ध्वन्यात्मकता (उच्चारण) के लिहाज से सबसे शुद्ध और विज्ञान सम्मत भाषा है। हमारे यहां एक अक्षर से एक ही ध्वनि निकलती है और एक बिंदु (अनुस्वार) का भी अपना महत्व है। दूसरी भाषाओं में यह वैज्ञानिकता नहीं पाई जाती।

डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन में  लिखा है कि, विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या एक अरब से ज्यादा है जबकि चीनी बोलने वालों की संख्या केवल नब्बे करोड है।

हिंदी जिस गति तथा आंतरिक ऊर्जा के साथ अग्रसर है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि सन 2030 तक वह दुनिया की सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा बन जाएगी। आज विश्व का हर पांचवां व्यक्ति हिंदी बोलने अथवा समझने में सक्षम है तो 2030तक विश्व का हर छठा व्यक्ति हिंदी बोलने अथवा समझने में सक्षम होगा।

यहां तक कि स्वयं गूगल का सर्वेक्षण सिद्ध कर रहा है कि विगत दो वर्षों में सोशल मीडिया पर हिंदी में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में 94प्रतिशत की बढोतरी हुई है जबकि अंग्रेजी में मात्र 19 प्रतिशत की।

जहाँ तक संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को अधिकृत भाषा बनाने का संबंध है, तो उसमें एक तिहाई यानी 129 देशों का समर्थन चाहिए, अगर योग दिवस के लिए 177 देशों का समर्थन मिल सकता है, हिंदी के लिए उससे ज्यादा देशों का समर्थन मिल सकता है।

नेपाल के अधिकांश लोग हिन्दी भाषा को बोल और समझ सकते हैं। इसका एक मुख्य कारण भारतीय टेलिविज़न और सिनेमा की नेपाल में लोकप्रियता है । नेपाल के हिन्दी के व्यवहार का प्राचीनतम रूप शिलालेखों एवं उपलब्ध हस्तलिखित सामग्रियों से अनुमान किया जा सकता है। पश्चिम नेपाल की दांग  में प्राप्त आज से अलगभग ६५० वर्ष पूर्व के शिलालेख में दांग का तत्कालीन राजा रत्नसेन, जो बाद में योगी बन गए, उनकी एक दंगीशरण कथा नामक रचना भी मिलती है। यह कृति नेपाल में हिन्दी के व्यापक प्रयोग और गहरी जड़ को पुष्ट करती है। यह रचना साहित्यिक दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण है ही हिन्दी की भाषिक विकास प्रक्रिया को समझने की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

पाल्पा के सेन वंशीय नरेशों तथा पूरब में मोरंग और अन्य कई राज्यों के तत्कालीन नरेशों ने तो हिन्दी को अपनी राजभाषा ही बनाया था। कुष्णशाह, मुकंदसेन आदि नरेशों के सभी पत्र और हुक्मनामें हिन्दी में ही मिलते हैं, जिससे हिन्दी की तत्कालीन स्थिति का आसानी से अनुमान हो जाता है। काठमांडू उपत्यका के मल्ल राजाओं में से अनेक ने हिन्दी में रचनाएं कीं। उनके हिन्दी प्रेम का कारण भी वहां हिन्दी का व्यापक प्रयोग और प्रचार ही कहा जा सकता है। इस प्रकार हिन्दी वहाँ कम से कम सात सौ वर्षों पूर्व से ही बहुसंख्यक लोगों की प्रथम और द्वितीय भाषा के रूप में चलती आई है। आज हिंदी नेपाल के सम्पर्क भाषा के रूप में स्थापित है जिसमे “हिमालिनी” पिछले 22 वर्षों से पत्रिका के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रही है।

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