Mon. Dec 10th, 2018

आन्दोलन की आग में कब तक जलेगा मधेश ?

फिलहाल देखा जाए तो नेपाल एक देश होते हुए भी दो समुदायों में बँट चुकी है ।

कैलास दास :मधेश का ऐसा एक भी जिला नही है जहाँ पर आन्दोलन की आग नही लगी है । जनता में आक्रोश की आग है, आन्दोलन नेतृत्वकर्ताओं में आन्दोलन को उँचाई पर ले जाने की आग है, तो कहीं सड़काें पर धू..धू..कर जलती टायर की आग है । जिधर देखो आग ही आग लगी है । सवाल यह भी है कि पाँच महीनों के बावजूद भी यह आग बुझी क्यों नहीं ? इसकी चिन्ता सरकार को क्यों नही हो रही है । आन्दोलनरूपी आग में जलने और जलानेवालो की राष्ट्रीयता कहाँ गुम है ?
मुल्क का अधिकांश भाग साँस्कृतिक एवं धार्मिक क्षेत्र होते हुए भी फिलहाल आन्दोलनमय भूमि बनी हुइृ है । जहाँ पर दैनिक सैकड़ों लोग दर्शन के लिए आते थे, जय माता दी की पुकार होती थी, वहाँ पर जय मधेश का नारा और पत्थरो का ढेर लगा है । धार्मिक गीतनाद की जगह, आन्दोलन का गीत सुनाया जाता है । सर पर माँ की चुनर बाँधने की जगह, काला पट्टी में जय मधेश लिखा जाता है । शहर धुआँ–धुआँ है । आखिर आन्दोलन की आग में कब तक जलेगा मधेश ?
जबकि सभी को मालूम है मधेश आन्दोलन से शिक्षण संस्था बन्द, कलकारखाना बन्द, यातायात बन्द, रोजगार बन्द, सरकारी कार्यालय बन्द, भन्सार बन्द यहाँ तक की न्यायालय भी बन्द है । केवल बढ़ती जा रही है तो काला बाजारी, घुसपैठिया, राष्ट्र के जिम्मेदार व्यक्तियों के बीच वाकयुद्ध, चौक चौराहे पर आम नागरिक द्वारा देश की चिन्ता, भुखमरी, आक्रोश, महँगाई और विद्युत लोडसेडिङ्ग के कारण अन्धेरे में रहने की आदत । क्या यह सच्चे राष्ट्रीयता की पहचान है ? इससे मुल्क आत्मनिर्भर बन सकता है ? आनेवाला कल अच्छा हो सकता है ? कदापि नही ।
नेपाल में राणा शाही और राजतन्त्र के अन्त्य के बाद लोकतन्त्र आया । जिस पर जनता ने आशा और विश्वास किया — देश विकास का, आत्म निर्भर बनने का, समान अधिकार पाने का । लेकिन आज गम्भीरता से देखा जाए तो यह लोकतन्त्र और लोकतान्त्रिक संविधान नेपाली जनता को पच्चीस वर्ष पीछे की जिन्दगी जीने के लिए विवश कर दिया है । यहाँ तक कि बिजली की जगह ‘डिबीया’ जलाने तक की नौवत आ गई है । नेपाली जनता ने लोकतन्त्र का सपना इसलिए नही देखा था कि हमें आन्दोलन ही आन्दोलन करने के लिए बाध्य होना पड़े । राजतन्त्र का इसलिए अन्त नही किया था कि लोकतान्त्रिक सरकार द्वारा बन्दूक की गोलियाँ खानी पड़े । वर्षो वर्ष से पड़ोसी मुल्क भारत के साथ वैवाहिक, साँस्कृतिक, भाषिक सम्बन्ध से विच्छेद होना पड़े और विभेद की आग में जलना पड़े ।
राज्य की बदनीयत और स्वच्छ राजनीति के अभाव में मुल्क दिनानुदिन अपंग बनती जा रही है । अर्थतन्त्र खत्म हो चुका है, अराजकता बढ़ती जा रही है और राज्य सत्ता में रहे एमाले, काँग्रेस और एमाओवादी जनता की चिन्ता की जगह वेपरवाह बनी है । फिलहाल देखा जाए तो नेपाल एक देश होते हुए भी दो समुदायों में बँट चुकी है ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक मधेश में आन्दोलन चलता रहेगा ? कब राज्य का दमन और आन्दोलन नेतृत्वकर्ताओं की मनमानी खत्म होगी ? लोकतन्त्र में जो वाक युद्ध की परम्परा आयी है वह कब समाप्त होगा ? सरकार और आन्दोलनकारी बीच वार्ता की परम्परा और हठीपन कहाँ जा कर विश्राम लेगा ? यह राजनीतिक दलों के लिए भी असमंजस का विषय है कि वो समाधान नही खोजना चाह रहे या समकाधान मिल नहीं रहा है । आन्दोलनरत दल और सरकार बार—बार वार्ता के लिए बैठते है और १० मिनट में बिना बहस के वार्ता निष्कर्ष विहीन खत्म हो जाती है । इससे स्पष्ट होता है कि राज्य पक्ष समाधान नही, आन्दोलनकारी थककर आन्दोलन छोड़ दे यह सोच बना चुकी है ।
‘नेपाल के संविधान २०७२’ में सबसे बड़ी समस्या राज्य का सीमांकन है । कानून विज्ञों का मानना है कि संविधान त्रुटिपूर्ण है इसमें कोई दो मत नही । इस संविधान में मधेशी जनता को दिए गए अधिकार से भी वञ्चित कर दिया गया है । लेकिन समानुपातिक, जनसंख्या के आधार में निर्वाचन क्षेत्र का समाधान सम्भव होते हुए भी राज्य का सीमाकन बहुत ही गम्भीर है । मधेश नेतृत्वकर्ता दल की जो अडान है वह भी गलत है । नेपाल एक साझा फुलवारी होने के वास्ते प्रत्येक राज्य में प्रत्येक समुदाय को रहने का अधिकार है । इसलिए मधेश का जिला पहाड़ में जाए, चाहे पहाड़ का जिला मधेश में बहस का विषय नही होना चाहिए थी । राज्य ने २ नम्वर प्रदेश जिस प्रकार निर्माण किया है, वह भी ठीक नही है । इस प्रदेश में एक भी पहाड़ का जिला समावेश नहीं किया गया है । दूसरी बात अगर मधेश नेतृत्वकर्ता केवल मधेश भूमि का एक या दो प्रदेश बनना चाहता हैं तो कभी भी मधेश में रहने वाले पहाड़ी समुदाय और पहाड़ में रहने वाले मधेशी समुदाय का राजनीतिक पहुँच बनना तत्काल सम्भव नही दिखता है ।
मधेश में सीमांकन को लेकर पाँच महीनों से आन्दोलन चल रहा है । इस दरमियान पहाड़ी समुदाय को मधेश आन्दोलन में बहुत ही कम अर्थात नहीं के बराबर देखा गया है । इससे दो प्रश्न खड़ होते हैं— एक की तराई मे पहाड़ी समुदाय अल्प संख्यक हैं और मधेश आन्दोलन से राजनीतिक पहुँच होने की सम्भावना भी बहुत ही कम दिख रही है । दूसरा, कि पहाड़ी समुदाय का भी मधेश आन्दोलन में नेतृत्व करने की पहल मधेशी नेताओं ने नहीं किया है । इससे स्पष्ट है कि सीमांकन में मधेश पहाड़ के जिला को समावेश किया होता तो आज का दिन देखने को नहीं मिलता ।

‘राष्ट्रपति भण्डारी का जनकपुर भ्रमण’
नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी जनकपुर दर्शन करने उस वक्त आई जब उनका चारो ओर से विरोध किया जा रहा था । पुलिस और आन्दोलनकारी बीच दो दिन पहले से झड़प चल रही थी । स्थानीय प्रशासन और जानकी मन्दिर के महन्थ सहित निकायों ने वातावरण असहज होने की जानकारी दे पहले ही दे दी थी । राष्ट्रपति भण्डारी स्वयं जानती थी कि इस वक्त जनकपुर जाना उचित नहीं है । अगर अभी गए तो विश्व प्रसिद्ध राम—जानकी विवाहपञ्चमी महोत्सव प्रभावित ही नही नेपाल—भारत से आए हजारों श्रद्धालुओं में भगदड़ मच सकती है । कुछ मर भी सकते हंै और कुछ घायल भी हो सकते हैं ? तत्पश्चात भी वह राष्ट्रीय चिन्तन छोड़कर आखिर किसके दवाव जनकपुर में आर्इं ? यहाँ पर दो प्रश्न स्पष्ट होता है । एक —जिस पार्टी से वह चुनाव जीतकर सांसद बनी हंै । जिस पार्टी के निर्देशन में नेपाल का संविधान २०७२ में उन्हाेंने हस्ताक्षर किया है जिन्हे मधेश नेतृत्वकर्ता दल अस्वीकार करने का उद्घोष कर चुके हंै । उसी पार्टी के निर्देशन में राष्ट्रपति भण्डारी का जनकपुर आना निश्चित । दूसरा—मधेश आन्दोलन जो करीबन पाँच महीनों से चल रहा है उसे डाइभर्ड करने की साजिश । अगर ऐसा नहीं होता तो उनके आने से पहले मधेश नेतृत्वकर्ताओं ने जमकर विरोध किया था और उसी क्रम में पुलिस और आन्दोलनकारी बीच झड़प भी हुई । वातावरण पूर्णरूप से असहज होने के वावजूद भी आकाश मार्ग में हेलिकप्टर द्वारा सेना की गस्ती और जानकी मन्दिर के नजदीक रहे घर के ऊपर और मुख्य सड़क पर सेना, सशस्त्र, नेपाल पुलिस परिचालन कर जानकी मन्दिर में उन्होंने पूजापाठ किया था ।
एमाले सरकार की चाल
राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी को एमाले की सरकार ने शक्ति प्रदर्शन के वास्ते जनकपुर भेजने की साजिस स्पष्ट हुआ है । संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा सहित आन्दोलन में आबद्ध नेता तथा कार्यकर्ताओं का मनान है कि एमाले, काँग्रेस और एमाओवादी खसवादी चिन्तन के पार्टी और उसमे लगे व्यक्ति भी है । वो चाहे पहाड का हो, चाहे मधेश का । नेपाल का संविधान २०७२ उन्ही खसवादी पार्टी ने अपना बलबुते लाया है, जिसमें मधेशी जनता को मिला हुआ अधिकार से भी वञ्चित कर दी है । उन्ही को लेकर मधेश में आन्दोलन चल रही है । आन्दोलन के क्रम में इन तीनो दल का सांसद को मधेश का जिला प्रवेश निषेध किया गया है । मधेश नेतृत्वकर्ता का कहना है कि हम लोग राष्ट्रपति भण्डारी को विरोध नही किया है । राष्ट्रपति भण्डारी में रही एमाले पार्टी का सिद्धान्त और विचार को विरोध की है । राष्ट्रपति राष्ट्र के लिए होता है किसी पार्टी और व्यक्ति के लिए नही । पाँच महीना के आन्दोलन के दरमियान मधेश आन्दोलन के सम्बन्ध एक शब्द भी नही बोलनेवाली भण्डारी एमाले का विचारधारा से जनकपुर आयी थी । वह मधेश आन्दोलन में घी का कार्य करने आई थी । एमाले का साजिश था कि राष्ट्रपति भण्डारी मधेश में जाने से सफल हो गयी तो एमाले, काँग्रेस और एमाओवादी का सांसद को सुरक्षा के बल पर असानी से सांसद को भजा जा सकता है, मधेश आन्दोलन को विथोला जा सकता है, जिन्हे हमने असफल करने में सफल रहा ।
राष्ट्रपति भण्डारी के आने के बाद क्या हुआ ?
२०७२ पुस १ गते विवाह पञ्चमी के दिन राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी नेपाली सेना के हेलिकप्टर से जनकपुर आई । उस वक्त आन्दोलनकारी विरोध में काला झण्डा और नारेबाजी कर रहे थे । नेपाल पुलिस और सशस्त्र आन्दोलनकारी को घेराबन्द में ले लिया गया था । जब आन्दोलनकारी ने पत्थरवाजी किया तो उसका जवाब प्रशासन ने अश्रु गैस से और लाठी प्रहार कर किया । उतना ही नहीं भारत—नेपाल से आए करीबन ६५ लोग घायल हो गए । उनमें संघीय समाजवादी फोरम नेपाल की केन्द्रीय सदस्य चमेली देवी दास सख्त घायल हुयी थी । जब राष्ट्रपति भण्डारी पूजा कर रही थी तो उस वक्त भी जानकी मन्दिर के प्राङ्गण में आन्दोलनकारी पत्थर फेक रहे थे । वातावरण पूर्णरूप मे तनाव ग्रस्त था । राष्ट्रपति भण्डारी १५ मिनट के भीतर पूजापाठ और अपना मन्तव्य भी देकर चली गयी । राष्ट्रपति भण्डारी के जाने के बाद आन्दोलनकारी और पुलिस बीच जमकर झड़प हुई । राष्ट्रपति के ऊपर पेट्रोल बम भी फेकने का प्रयास किया गया ।
मोर्चा के छानबीन में दोषी कौन ?

विवाहपञ्चमी महोत्सव में आई राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी प्रकरण में दोषी कौन–कौन हैं यह प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया है । घटना के कुछ ही दिन बाद मोर्चा आबद्ध ने ‘नागरिक छानबिन समिति’ गठन किया था । जिनमे संयोजक शेषनारायण यादव और सदस्यगण में धीरेन्द्र बहादुर सिंह, संजय कुमार सिंह, रूपनारायण मण्डल, मो. इजराईल रिजवी, धर्मेन्द्र साह, सरोज मिश्र, राजेश कुमार कर्ण, लव कुमार झा थे । उन्हाेंने प्रेस कन्फ्रेन्स कर प्रतिवेदन पेश करते हुए कहा कि राष्ट्रपति भण्डारी जब जनकपुर आई तो उस वक्त मन्दिर में जुत्ता चप्पल निषेध किया गए क्षेत्र में सुरक्षाकर्मी ने जूता सहित प्रवेश किया था । राष्ट्रपति भण्डारी साँस्कृतिक मर्यादा विपरित भगवान के स्वरूप जैसी झांकी की पूजापाठ करने की जगह ग्रहण की । जानकी मन्दिर के महन्थ ने अप्रत्यक्ष रूप में विद्यादेवी भण्डारी को निमन्त्रण पत्र भेजा था । कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने मन्दिर के गर्भगृह और चाँदी का गेट तोड़फोड़ किया था । इसलिए इसमे नेपाल सरकार, भूमिसुधार मन्त्रालय, जानकी मन्दिर के महन्थ, स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप में दोषी हैं ।

 

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