Sat. Nov 17th, 2018

इसी तरह धीरे-धीरे ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं, इसी तरह धीरे-धीरे मरता है आदमी : अमरजीत कौंके

धीेर-धीरे

अमरजीत कौंके

इसी तरह धीरे-धीरे

ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं

इसी तरह धीरे-धीरे

मरता है आदमी

इसी तरह धीरे-धीरे

आँखों से सपने

सपनों से रंग ख़त्म होते

रंगों से ख़त्म होती है दुनिया

सफ़ेद कैनवस पर

काली चिड़ियाँ

मृत नज़र आती हैं

इसी तरह धीरे-धीरे

इबारतें कविताओं में

सिमटतीं कविताएँ

पंक्तियों में सिकुड़तीं

पंक्तियाँ शब्दों में लुप्त होतीं

और शब्द शून्य में खो जाते

इसी तरह धीरे-धीरे

इन्तज़ार करते आँखों में

इन्तज़ार ख़त्म होता

तड़पते-तड़पते होठों का

लरजना भूल जाता

छुअन को ललकते पोरों से

कम्पन गायब हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे

घर इन्सान को खा जाते

दीवारें उसकी मज़बूरी बन जातीं

रिश्ते जो उसके पाँव की बेडियाँ होते

आदमी उन्हें पाजेब बना कर

थिरकने लगता है

इसी तरह धीरे-धीरे

व्यवस्था के खिलाफ़

जूझता आदमी

व्यवस्था का अहम्

हिस्सा बन जाता

रंगों की दुनिया में

मटमैला-सा रंग बन जाता

और कैनवस से

एक दिन लुप्त हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे

सोचते-सोचते आदमी

जड़ हो जाता है एक दिन

पता ही नहीं चलता कब

कोई उसके हाथों से क़लम

कोई कागज़ छीन कर ले जाता

इसी तरह धीरे-धीरे

एक कवि

कवि से कोल्हू का बैल बन जाता

और आँखों पर पट्टी बांध कर

मुर्दा ज़िन्दगी की

परिक्रमा करने लगता। -अमरजीत कौंके

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