Tue. Nov 13th, 2018

उर्जा नीति, आखिर नेपाल क्या चाहता है ? दूतावास का ध्यानाकर्षण

PTDC0096 (2)श्वेता दीप्ति , काठमाण्डू ,२१ जुलाई । नेपाल की नियति सम्भवतः आन्दोलन और विरोधों में ही कैद होकर रह जाएगी । किसी भी पक्ष पर विरोध जता देना काफी सहज होता है । या फिर चर्चा में रहना है तो भी किसी अहम मुद्दे का विरोध करो और समाचार में छा जाओ । कभी तो जनता के प्रतिनिधियों को देशहित और जनहित की बात सोचनी चाहिए । यह आवश्यक है कि कोई भी समझौता या योजना में पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि इससे देश के अस्तित्व और सम्मान का सवाल जुडा होता है ।
देश बिजली कटौती की मार से पीडित है । अर्थ व्यवस्था पर इसका सीधा असर दिख रहा है । जलस्रोत से सम्पन्न देश लगातार इस समस्या से जूझ रहा है । सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि तीन वर्षों के अन्दर बिजली की स्थिति में सुधार होगी किन्तु कैसे ? यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है । एक तो हमारी ओर से कोई पहल नहीं होती और जब कोई सुधार की सम्भावना दिखाई देती है तो सत्ता के ठेकेदार उस सम्भावना को क्षीण कर देते हैं । नेपाल भारत उर्जा समझौता का हर ओर से विरोध किया जा रहा है बिना किसी गहन अध्ययन के । वैद्य समूह की ओर से इसका तीव्र विरोध जारी है । यह तो ऐसा ही है हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे । न कुछ करने की स्थिति उनके समक्ष है और न ही कुछ सही वो होने देना चाहते हैं । क्या देशहित से ज्यादा व्यक्ति विशेष  का बिना सोचे समझे का विरोध मायने रखता है ? यह तो जाहिर है कि किसी भी अन्य देश से किए जाने वाले समझौते को कई कसौटियों से होकर गुजरना पडता है । तो समय रहते उस पर बहस होनी चाहिए, विचार विमर्श होने चाहिए अन्य पक्षों से परामर्श की नीति होनी चाहिए । पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आता है । पर जब कार्यान्वयन का समय आता है तो विरोध की राजनीति शुरु हो जाती है । अगर देश की राजनीति ऐसी ही रही तो एक बीमार प्रतिनिधि के प्रतिनिधित्व में चलने वाले देश का पूरा तंत्र बीमार हो जाएगा । चर्चा है कि नेताओं का पूरा ध्यान संविधान निर्माण में लगा हुआ है तो क्या देश के अन्य विषयों को तब तक के लिए विराम दे दिया जाय जब तक संविधान नहीं बन जाता और जिसके शीघ्र बनने की कहीं कोई सम्भावना नहीं दिख रही ? भारत के प्रधान मंत्री और विदेश मंत्री के आगमन पर निगाहें टिकी हैं, उनसे बहुत उम्मीदें की जा रही हैं किन्तु फिलहाल विरोध की जो राजनीति सामने आ रही है और दूतावास को जो स्पष्टीकरण देना पड रहा है तो कोई नई बात नही होगी कि इनके आने पर भी इसका असर दिख जाए । सवाल यह उठता है कि आखिर नेपाल क्या चाहता है ? अगर देश का विकास चाहिए तो कार्यों में जो तीव्रता होनी चाहिए जो नीति होनी चाहिए, जो गृहकार्य होना चाहिए वह कहीं नजर नहीं आ रहा । क्या हमारी यह अस्पष्ट नीति हमें विकास मार्ग पर ले जाएगी ? आत्ममंथन और आत्मविश्लेषण का समय है कि हमें हमारे प्रतिनिधियों से क्या चाहिए । भारत की जनता ने सर्वसम्मत से विकास के नाम पर एक मोदी एक विकल्प को चुना और हम क्या चुन रहे हैं, विरोध और व्यक्तिगत मोह से ग्रस्त राजनीति ?

उर्जा क्षेत्र में सहयोग सम्बन्धी मसौदे के प्रति उठे प्रश्नों पर भारतीय दूतावास का ध्यानाकर्षण

भारत और नेपाल के बीच उर्जा क्षेत्र में सहयोग सम्बन्धी भारत के मसौदा प्रस्ताव के बारे में संचार माध्यम में आए अनेक समाचार के प्रति भारतीय दूतावास का ध्यान आकर्षित हुआ है ।
इस सम्बन्ध में दूतावास निम्न अवस्था स्पष्ट करना चाहता है ।
क ः मसौदा ढाँचागत समझौता प्रकृति का है और इससे उर्जा क्षेत्र में समग्र सहयोग हेतु व्यापार, प्रसारण लाइन निर्माण, ग्रीड जोड़ने और विद्युत परियोजनाओं के निर्माण सहित बृहत सिद्धान्तों और मापदण्ड की रूपरेखा निर्धारण होगी ।
ख ः निर्माण होने वाले प्रत्येक विद्युत परियोजना के लिए एक अलग परियोजना कार्यान्वयन समझौते की आवश्यकता हे । साथ ही इसके लिए विद्युत खरीद समझौता और आवश्यक नियम और शर्तों में सहमति आवश्यक होगी ।
ग ः मसौदा नेपाल के लिए अपने जलविद्युत सम्भावना के विकास हेतु उसके सार्वभौम अधिकार को कुण्ठित नहीं होने देगा ।
घ ः भारत में विद्युत व्यापार ओपेन जनरल लाइसेन्स सूची के अन्तर्गत है । विद्युत उर्जा समझौता सन् १९९७ में हस्ताक्षर हुआ था । भारत और नेपाल के बीच उर्जा आदान प्रदान व्यवस्था के पुनरावलोकन करने हेतु समय समय पर अलग द्विपक्षीय उर्जा आदान प्रदान समिति की बैठक आयोजित होती आई है ।
ङ ः भारत द्वारा भेजे गए प्रस्ताव बातचीत के लिए तैयार किया गया मसौदा है और इसे अन्तिम रूप देने से पहले द्विपक्षीय वार्ता आवश्यक है । मसौदे में संशोधन तथा परिवत्र्तन करने के लिए दोनों पक्ष स्वतन्त्र हैं ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of