Sat. Nov 17th, 2018

उलझी हइ राजनीति

कुमार सच्चिदानन्द

राष्ट्र और राष्ट्रियता की बात करते-करते हमारी राजनीति ने राष्ट्र को इस अवस्था में पहुंचा दिया है, जहाँ से मार्ग निकलना कठिन सा लग रहा है और इस स्थिति को किसी भी रुप Baburam Bhattarai Leaving For Brazilमें राष्ट्रिहित में नहीं माना जा सकता। इस स्थिति के लिए यहाँ सक्रिय प्रायः सभी दल जिम्मेवार हैं और उनकी हर बात आमलोगों को एक प्रलाप सी लगती है। यद्यपि प्रलाप का भी एक मनोविज्ञान होता है। प्रलाप-प्रेमियों से दुनियां के किसी भी मुद्दे पर बात करें, उसे वह एक नए अन्दाज में प्रस्तुत करेगा। आप प्रकृति के सौर्न्दर्य की बात करें तो वह पतझडÞ की बात करेगा, आप गरीबी की बात करेंगे, वह अमीरी के सपने बाँटेगा, आप किसी महान आदमी की महानता की बात करेंगे तो वह अपने मुहल्ले के किसी अदने से आदमी की खासियतें गिनाएगा, आप शादी करना चाहेंगे तो आप को कुँवारा रहने की हिदायत देगा। आप कुँवारपन को अच्छा समझेंगे तो वह शादी की उपयोगिता पर बहस करके आपको शादी के लिए मजबूर करेगा। कमोवेश हमारी राजनीति फिलहाल ऐसी दहलीज पर खडÞी है और हमारे नेता प्रायः ऐसे ही तर्क राष्ट्रहित का हवाला देकर प्रस्तुत करते नजर आते हैं। आप कृषि प्रधान देश में खेती के मूल मौसम में उर्वरकों के चरम अभाव की बात करेंगे, वे सपने पूरे होने की बात करेंगे, आप दर्ुगम क्षेत्रों में खाद्यान्नों की कमी की बात करेंगे, वे आपर्ूर्ति सहज होने की बात करेंगे, आप संविधान की बात करेंगे, वो सहमति की बात करेंगे, आप पर्ूण्ा बजट की बात करेंगे, वो तृतीयांश का राग अलापंेगे, आप चुनाव की बात करेंगे, वे संविधानसभा की पुनर्स्थापना की बात करेंगे। र्सवत्र एक भ्रम की स्थिति।
आज नेपाल शायद विश्व का राजनैतिक रंगमंच पर ऐसा अनूठा उदाहरण बन चुका है, जो लोकतांत्रिक राष्ट्र तो है लेकिन जहाँ एक भी जनप्रतिनिधिमूलक संस्था नहीं है। राष्ट्र को उस अवस्था तक पहुँचाने का श्रेय किसी एक दल को नहीं जाता और उसके लिए प्रायः सभी जिम्मेवार हैं। जेठ १४ गते की मध्यरात्रि में मुख्य दल के परामर्श के बिना प्रधानमन्त्री ने जिस तरह निर्वाचन की तिथि घोषणा की, उसे पूरी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ऐतिहासिक संक्रमण दौर से गुजर रहे देश को निकास देने के लिए कम से कम मुख्य दलों की सहमति आवश्यक थी। लेकिन यहाँ सक्रिय दलों में पर्ूवाग्रह इतना प्रबल था कि यहाँ सहमति सहज रुप में तलाश लेना तत्काल सम्भव नहीं था। इसलिए चुनाव का जो विकल्प सरकार ने प्रस्तुत किया, उसे उतना अनुचित नहीं माना जा सकता लेकिन नियम-कानून के अभाव में राष्ट्र को एक अन्तहीन आचार संहित में फँसा दिया गया। उस का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि विगत चार वर्षों में संविधानसभा के क्रियाकलापों से ऊब चुकी जनता राष्ट्र के लिए उस अवसर को राहत के रुप में ले रही है।
यह सच है कि आज देश राजनैतिक और संवैधानिक रुप से जिस अनिश्चितता में फँसा हुआ है, उससे निकलने के लिए सहमति के सिवा दूसरा विकल्प नहीं है। संविधान सभा भंग होने के सात-आठ सप्ताह गुजर चुके, लेकिन अभी भी राजनीतिक दलों के बीच न्यूनतम बिन्दुओं पर भी सहमति नहीं बन पाई है। सहमति का सारा प्रयास सरकार के मुद्दे पर आकर विफल हो जाता है। विपक्षियों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि वर्तमान सरकार अपना बहुमत खो चुकी है, इसलिए उसे इस्तीफा दे-देना चाहिए। सवाल है कि यह सरकार अल्पमत में है या जो सरकार आएगी वह बहुमत में है, इसे सिद्ध करने की जगह कौन सी है – खाली मैदान में खडÞा होकर र्समर्थन या विरोध में हाथ उठाना क्या संवैधिानक होगा – रही बात सहमति की, तो इतना कहा ही जा सकता है कि संविधान के नाम पर चार वर्षों में जो सहमति नहीं बन पाई, सरकार के नाम पर चार दिनों में क्या वह सम्भव है – सरकार की दृष्टि से सहमति के मार्ग का एक अवरोध यह भी है कि जिसे आप सत्ताच्युत करने के तुले हुए हैं, क्या आप के नाम पर वे सहमत हो सकते है – संक्षेप में कहा जा सकता है कि सहमति के नाम पर जिस लचीलेपन की जरुरत है, उस का अभाव यहाँ की राजनीति में देखा जा रहा है।
आज देश में चुनाव की चर्चा हो रही है। पहले हर दल चुनाव के यथार्थ का सामना करने से कतराने का मार्ग तलाशते हुए विघटित संविधान सभा की ही पुनर्स्थापना की बात कर रहे थे। देश में लोकतन्त्र-गणतन्त्र को संस्थागत बनाने के नाम पर असफल संविधानसभा को पुनः तिलक लगाकर संस्थागत करना चाहते है। अगर ऐसा होता तो लोकतन्त्र में जिस जनता की दुहाई देकर हम जनकल्याण की बात करते है, उनकी भावनाओं की उपेक्षा क्यों होती है – क्यों आमलोगों की नजर में यह संविधानसभा अपना विश्वास गुमा चुकी है – आज स्थिति थोडÞी बदली है। महत्वपर्ूण्ा दल चुनाव की बात करने लगे हैं। मगर सबसे महत्वपर्ूण्ा सवाल यह है कि चुनाव किसका – संसद का या संविधानसभा का – सच है कि विघटित संविधानसभा हर्ुइ है, इसलिए चुनाव इसका होना चाहिए। मगर सान्दर्भिक सवाल यह भी है कि जिस स्वरुप में विगत संविधानसभा थी, विगत में जैसा रंग इसने दिखलाया और जिस तरह यह परिणामविहीन रही, उसे देखते हुए इन्ही राजनीतिज्ञों के बीच, उसी स्वरुप के लिए चुनाव का औचित्य क्या है – अगर संसद के चुनाव की ओर हम बढÞते हैं तो और अधिक जटिलताएं हैं, जिन्हें सुलझाने के बाद ही इस दिशा में आगे बढÞा जा सकता है।
आषाढÞ मसान्त में आम लोग पर्ूण्ा बजट की आश कर रहे थे। सरकार भी अध्यादेश के द्वारा ही सही पर्ूण्ा बजट लाने की दिशा में कसरत कर रही थी। मगर पर्ूण्ा बजट के विरोध में विपक्षी दलों के ध्रुवीकरण के कारण राष्ट्र को पर्ूण्ा बजट नहीं मिला और एक तरह से आर्थिक यथास्थितिवाद की ओर राष्ट्र को धकेल दिया गया। अब यह भी तर्क दिया जा रहा है कि अध्यादेश के द्वारा तृतीयांश ही सही नया बजट तो आया, लेकिन यह समाधान नहीं, समस्या भी साथ साथ लेकर आया। गाँव के किसान, भूमिहीन, मजदूर, युवा, विद्यार्थी, स्वदेशी-विदेशी निवेशकर्ता किसी को भी नए बजट की अनुभूति नहीं हर्ुइ क्योंकि यह बजट दिशा निर्देश नहीं कर सका। सवाल है कि राष्ट्र की मन्द-विकास-गति के देखते हुए क्यों तथाकथित जिम्मेवार विपक्षी ने सरकार को पर्ूण्ा बजट लाने का मशबरा नहीं दिया, क्यों इसका विरोध किया और आज जब अधुरे बजट में सरकार चल रही है तो इस तरह की मर्सिया गाने का अर्थ क्या है –
पर्ूण्ा बजेट के लिए अनिवार्य शर्त रखी गई ‘सहमति’। इससे प्रायः सभी पक्ष अवगत है कि ‘सहमति’ जैसा शब्द तो नेपाली राजनीति के लिए दिवास्वप्न की तरह है। जिस सहमति के अभाव में विगत चार वर्षो में चार सरकारे बनी और बिखरी, जिस सहमति के अभाव में चार वर्षो की यात्रा के बावजूद देश को संविधान नहीं मिला, जिस सहमति के अभाव से देश की एक मात्र जनप्रतिनिधिमूलक संस्था परिणामविहीन दिवंगत हो गई और राष्ट्र संवैधानिक रुप से अंधकार की ओर अग्रसर हो चुका, ऐसी परिस्थिति में सहमति के आधार पर पर्ूण्ा बजट लाने की सलाह देनेवाले हर पक्ष ने किसी न किसी रुप में आर्थिक दृष्टि से राष्ट्र के अहित में काम किया है। हमारी राजनीति की समस्या यह है कि न्यून विकास दर का रोना तो रोते हैं, मगर उसी की ओर राष्ट्र को धकेलते हैं।
विगत आर्थिक वर्षके आर्थिक र्सर्वेक्षण इस बात का संकेत करता है कि ठोस आर्थिक आधार के लिए आवश्यक पर्ूवाधार और औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार इस वर्षभी निराशाजनक रहा। विगत आर्थिक वर्षके आठ महीने में मात्र ८ मेगावाट बिजली का उत्पादन और १५ किलोमीटर पक्की सडÞक का निर्माण किया गया। आर्थिक वृद्धि दर ४ दशमलव ६ प्रतिशत तो रहा लेकिन रोजगार सृजित करनेवाले उत्पादनमूलक क्षेत्र का वृद्धि दर १ दशमलव तीन प्रतिशत में सीमित रहा। दूसरी ओर आर्थिक र्सर्वेक्षण अनुसार -२०६८-६९) मूल्यवृद्धि मात्र ८ प्रतिशत है। लेकिन दैनिक उपभोग्य सामाग्रियों की कीमतें इस आँकडÞे से अधिक बढÞी हैं और निम्न मध्यम वर्ग का जीवनयापन कठिन हो गया है। मगर पर्ूण्ा बजेट के अभाव में मौजूदा आर्थिक यथास्थितिवाद इन सारी बातों के प्रति मौन है। आम लोग हताश और निराश है और इसके लिए राजनीतिक और संवैधानिक सभी निकाय जिम्मेवार हैं।
आज संसद या संविधानसभा के अस्तित्व में न होने के कारण अध्यादेश के माध्यम से शासन चलाने की बात पर लोकतन्त्र कमजोर होने का तर्क दिया जा रहा है। राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर नेपाल में लोकतन्त्र का मजाक जिस तरह से उडÞाया जा रहा है, उस का उदाहरण अन्यन्त्र शायद दर्ुलभ हो। आज चुनाव की बात की जा रही है। लेकिन चुनाव के लिए उचित नियम कानून का अभाव चुनाव-आयोग बतला रहा है और राजनीतिक दलों से इस अभाव की पर्ूर्ति का आग्रह भी कर रहा है। निश्चित है कि इस अभाव को पूरा करने के लिए जो भी नियम-कानून बनेंगे, उन्हें भी राजनीतिक सहमति की शर्त पर ही सही, अध्यादेश के रुप में ही कानून का जामा पहनाया जा सकता है। ऐसे में यह सवाल तो उठाया ही जा सकता है कि अध्यादेश के द्वारा ही सही, पर्ूण्ा बजट को रोका गया – अब प्रायः निश्चित है कि ७ गते चुनाव संभव नहीं तो आखिर कब तक पर्ूण्ा बजट का इन्तजार किया जाए। अगर संसद या संविधानसभा का चुनाव समय पर नहीं हो पाता तो राष्ट्र के संचालन के लिए आवश्यक होने पर सरकार अध्यादेश जारी कर राष्ट्र को सही दिशा में ले जाएगी या अराजकता को बेलगाम छोडÞ गुमसुम होकर बैठेगी – ऐसे अनेक सवाल हैं, जो अनुत्तरित हैं।
यह सच है कि आज नेपाल के राजनीतिक वृत्त में असहमति का जो गाढÞा वातावरण देखा जा रहा है, उसे दूर करने के लिए जिस लचीलेपन की आवश्यकता है, उसका राजनीतिक दलों में प्रायः अभाव देखा जा रहा है। आशंका यह भी जतलायी जा सकती है कि साम्राज्यवाद, विस्तारवाद, सामन्तवाद आदि कहकर हम जिन शक्तियों को आलोचना करते आ रहे हैं, उन्ही के साए में राजनीतिक गाँठ खुलने के लिए सम्झौते हों। अगर ऐसा होता है तो यह भी हमारी राजनीति की एक असफलता होगी।

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