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एक और कलम खामोश हो गई : विदा कविवर ! – डा.श्वेता दीप्ति

हिन्दी साहित्य के एक– एक रत्न साथ छोड़ रहे हैं और दे जा रहे हैं एक समृद्ध इतिहास और कभी ना भरने वाला खालीपन ।

( दिनांक १५ अगस्त २०१५, अन्नपूर्ण होटल में आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रखर और प्रबुद्ध कवि केदारनाथ सिंह जी का सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया । मुख्य आयोजक श्री लूनकरणदास, गंगादेवी चौधरी साहित्य कला मंदिर के साथ केन्द्रीय हिन्दी विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय कीर्तिपुर, अंतर्राष्ट्रीय नेपाल साहित्य समाज, नारी साहित्य प्रतिष्ठान, नेपाली कला साहित्य डट कम प्रतिष्ठान तथा हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका ने मिलकर कविवर केदारनाथ जीका अभिनन्दन किया ।)

स्मृतिशेष : कविवर केदारनाथ सिंह,
डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू २० मार्च, २०१८ | जीवन का एक कटु सत्य और हमारी खामोशी । एक दिन जब हमारे हाथों से सब छूट जाता है और रह जाती है सिर्फ टीस देती हुई यादें । तीन चार दिनों पहले सामाजिक संजाल के द्वारा पता चला कि हिन्दी नई कविता के पुरोधा, हिन्दी साहित्य–प्रेमियों के चहेते कविवर केदारनाथ सिंह अस्पताल में कोमा में हैं । मन घबराया और अहसास हो गया था कि एक और शख्शियत याद बन जाने वाली है, एक और कलम खामोश होने वाली है । जेहन में एक चिरपरिचित पंक्ति कौंध गई बिछड़े सभी बारी–बारी । एक पूरी पीढ़ी खत्म हो रही है । हिन्दी साहित्य के एक– एक रत्न साथ छोड़ रहे हैं और दे जा रहे हैं एक समृद्ध इतिहास और कभी ना भरने वाला खालीपन ।
आज एक और सितारा टूटा और विलीन हो गया । टूट गई सम्भवतः तारसप्तक की अंतिम कड़ी । यादों मे आपसे हुई मुलाकात कौंध रही है । तीन वर्ष पहले आपका नेपाल आगमन हआ था, उस वक्त आपसे मिलने का और आपका आशीर्वाद पाने का सुअवसर प्राप्त हुआ था । चेहरे पर सौम्य सी मुस्कान और अभिभावकत्व से भरा हुआ सरल व्यक्तित्व मेरे समक्ष था । कभी पाठ्यक्रम में जिन्हें पढ़ने का अवसर मिला था, उनसे प्रत्यक्ष मिलना मन को प्रफुल्लित कर रहा था । सुयोग मिला आपके सत्कार का जब मैंने उनके लिए अपने चंद शब्द व्यक्त किए थे और प्रतिक्रिया में जब आपने कहा था कि “तुम्हारी हिन्दी बहुत सुलझी हुई और स्पष्ट है क्या तुम भारत से हाे ?” जब मैंने हामी भरी तो अपनेपन से भरी एक मुस्कान चेहरे पर फैल गई थी । स्नेह के साथ उन्होंने कहा “जब भी दिल्ली आओ मिलना ।” आप चले गए पर मैं फिर कभी मिल नहीं पाई । अपनी उस अभिव्यक्ति का अंश जो मैंने उनके समक्ष रखे थे आज उनकी यादों के साथ —
“आज का हर क्षण महत्त्वपूर्ण है, अहम है । महत्त्वपूर्ण इस मायने में कि आज हम एक व्यक्ति नहीं एक युग के सम्मान समारोह में उपस्थित हैं । मुझे उस युग के परिचय की जिम्मेदारी दी गई है जो खुद में एक समृद्ध इतिहास समेटे हुए है । एक दुरूह कार्य है मेरे लिए क्योंकि कुछ बातें, कुछ अनुभूतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें शब्दों के दायरे में कैद करना मुश्किल होता है । ……नई कविता के स्रष्टा के रूप में हिन्दी साहित्य जगत ने एक नाम पाया श्रद्धेय केदारनाथ सिंह जी के रूप में । दौर संघर्ष का था, पूर्वाग्रह से मुक्त होना हर समय कठिन है और नवीन प्रयोगों को सहजता के साथ स्वीकार करना उससे भी कठिन । नई कविता धरातल तलाश रही थी । आपने उस संघर्ष को झेला और शायद इसलिए कहा कि ‘हर लम्बे दिन के बाद जब लौट कर आता हूँ, तो कुछ देर तक कमरे के दानव से लड़ना पड़ता है । पराजित कोई नहीं होता पर समझौता भी कोई नहीं करता । शायद हम दोनों को यह विश्वास है कि हमारे बीच एक तीसरा भी है जो अजन्मा है । कौन जाने यह संघर्ष उसी के लिए हो ?’
आपने लिखा, बहुत लिखा । आपकी कविताएँ भाषा की सहजता और बिम्ब की सादगी के लिए ख्यात हैं । जनपदीय शब्दावली और ठेठ ग्रामीण विषय आपकी कविताओं चित्रित होती रहीं —
धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे
उगेंगे हमारे खेत में
आना जी बादल जरुर ।
चन्दा को बाँधेंगे कच्ची कलगियाँ
सूरज की सूखी रेत में आना जी बादल जरुर
आगे पुकारेंगी सूनी डगरिया, पीछे झुके बन खेत
संझा पुकारेगी गीली अँखडि़याँ, भोर हुए धन खेत ।
कविता का क्षेत्र असीम है । दृश्य और अदृश्य सब उसकी परिधि में खींचकर कर चले आते हैं —
सुबह उठा तो लगा शरद आ गया
आँखों को नीला आकाश भा गया,
धूप गिरी ऐसे गवाक्ष से
जैसे काँप गया हो शीशा
मेरे रोम रोम ने तुमको
पता नहीं क्यों बहुत असीसा ?”
आपका आशीष साहित्य जगत को मिलता रहा और यह हमेशा आपका ऋणी रहेगा । अश्रुपूरित नयनों से विदा शब्दों के जादुगर, पर आप विदा नहीं हो सकते हमारी यादों से, हमारे दिल से ।
उनकी सभी कविताएँ मुझे पसंद है जिनमें एक यह भी है—
रुको, आँचल में तुम्हारे
यह समीरण बाँध दूँ, यह टूटता प्रन बाँध दूँ
एक जो इन ऊँगलियों में
कहीं उलझा रह गया है
फूल सा वह काँपता क्षण बाँध दूँ ।
फेन सा इस तीर पर
हमको लहर बिखरा गई है
पर रुको तो
पीत पल्ले में तुम्हारे
फसल पकती बाँध दूँ
यह उठा फागुन बाँध दूँ
प्यार— यह आवाज
पेड़ों घाटियों में खो गई हैं ।
हाथ पर, मन पर, अधर पर, पुकारों पर
एक गहर पर्त
झरती पत्तियों की सो गई है ।
पर रहो तो, रुँधे गीतों में तुम्हारे
लपट हिल्ती बाँध दूँ ।
धूप तकिए पर पिघल कर
शब्द कोई लिख गई है
एक तिनका, एक पत्ती, एक गाना
साँझ मेरे झरोखे की
तीलियों पर रख गई है
पर सुनो तो—
खुले जुड़े में तुम्हारे
बौर पहला बाँध दूँ ।
हाँ, यह निमंत्रण बाँध दूँ ।
विदा कविवर ।

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