Fri. Oct 19th, 2018

एसपी महोदय, पीछे से पत्थर मारने पर पीठ पर लगेगा या सीने पर ? करण सिंह हत्या प्रकरण

विनय दीक्षित:मधेशी मोर्चा के द्वारा करीब २ महीने से निरन्तर जारी आन्दोलन सरगर्मी पर था । नेपालगन्ज से लेकर गाँव गाँव तक पुतला दहन, बन्दी, सभा और जुलूस का कार्यक्रम आगे बढ़ रहा था । इसी क्रम में बाँके गनापुर गाबिस स्थित नेपालगन्ज कोहलपुर सड़कखण्ड अवरुद्ध करने के लिए मोर्चा के कार्यकर्ता स्थानीय पिप्रहवा चौक और राँझा चौक पर तैनात थे । घटना भाद्र १८ गते शुक्रवार शाम साढ़े ३ बजे का है ।
राँझा चौक से कोहलपुर की तरफ बन्दी की खबर होने के बावजूद भी कोहलपुर निवासी करण सिंह अपने २ साथियों के साथ मोटरसाइकल पर गनापुर चौक पहुँचे । आन्दोलनकारियों ने जब इन्हें रोकने का प्रयास किया तो सिंह ने मोटरसाइकल की गति और भी तेज की और भाग निकले, पीछे से आन्दोलनकारियों ने पत्थर चलाए लेकिन लगा नहीं, दुर्भाग्यवश मोटरसाइकल अनियन्त्रित हुई और कुछ दूरी पर ही दुर्घटना हो गई ।
दुर्घटना में घायल करण सिंह की तत्काल मौके पर ही मौत हो गयी । अन्य दो लोग कहाँ गए । उनका बयान पुलिस ने क्यो संलग्न नहीं किया या उन्हें क्यो सामने नहीं लाया गया यह अभी तक रहस्य है । जैसे तैसे पुलिस ने दुर्घटना को मधेशी मोर्चा के द्वारा हत्या का घटना बनाया और आन्दोलनकारियों को घर घर से गिरफ्तार करना शुरु किया ।
पुलिस ने घटना में ३०,३५ लोगों की संलग्नता दिखाई लेकिन मुद्दा सिर्फ एक युवा पर चलाया । जिस युवा पर हत्या मुद्दा चलाया गया वह २ घण्टे पहले ही राँझा चौक से गिरफ्तार हो चुका था । पुलिस सुत्रों ने बताया जब गनापुरका कोई गवाह और चश्मदीद नहीं मिला तो आन्दोलन कर रहे लोगों को गिरफ्तार कर फर्जी केश चलाने और कोहलपुर के व्यवसायियों को शान्त करने की योजना बनायी गयी ।
नेपालगन्ज के जिला पुलिस निरीक्षक एसपी बसन्त कुमार पन्त निरन्तर आन्दोलन को दबाने के पक्ष में दिखे । मधेशी मोर्चा के बाजार बन्द कराने के जुलूस में उन्होंने हस्तक्षेप करवाया लेकिन बजार खोलने वाले जुलूस को जाने दिया । दोनों पक्षों में तकरार का सिलसिला आगे बढ़ा और प्रशासन को कर्फ्यु लगाकर स्थिति को नियन्त्रण में लेना पड़ा ।
पुलिस ने आन्दोलनकारियों को गाँव गाँव से नियन्त्रण में लिया । किसी पर सार्वजनिक अपराध तो किसी पर हत्या का मुकद्मा चलाना शुरु किया । सीमा क्षेत्र में नाकाबन्दी की स्थिति में भी वही हुआ । शान्तिपूर्ण रूप से नेपाली क्षेत्र में टेन्ट लगाकर बैठे नेता और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने भारतीय क्षेत्र में खदेड़ दिया और प्रचार किया जाने लगा कि नेता भारतीय क्षेत्र से पथराव कर रहे हैं ।
करण सिंह हत्या मुद्दा में लम्बु उर्फ शिव शंकर भाट को मुख्य अभियुक्त करार दिया गया । पुलिस ने वारदात स्थल मुचुल्का में दिखाया कि ३०,३५ लोगों की समूह ने मोटरसाइकल चालक करण सिंह को पीछे से खदेडा, पीछे से ५६० ग्राम का पत्थर प्रहार किया, मोटरसाइकल पर ३ लोग सवार थे, पत्थर मोटरसाइकल चालक करण सिंह के सीने पर लगा और घटना स्थल पर ही उनकी मौत हो गयी । इस मुचुल्का में फर्जी लोगों के नाम साक्षी के रूप में लिखे गए जिन्होंने अदालत में उपस्थित होकर मुचुल्का सम्बन्ध में किसी प्रकार का जानकारी न होने का बयान दिया ।
पुलिस की मनःस्थिति को मुचुल्का ने पुष्टि कर दिया । पुलिस का अनुसन्धान कितना कोरा है यह जानने के लिए किसी प्रकार की डिग्री करने की जरुरत नहीं रही । आम जनता भी यही सवाल खड़ी कर रही है कि जब ३ लोग मोटरसाइकल पर थे, आन्दोलनकारियों ने पीछे से पत्थर मारा, तो पत्थर पीछे बैठे व्यक्ति के पीठ पर लगना चहिए था, मोटरसाइकल चलाने वाले के सीने पर कैसे लगा एसपी महोदय ?
पुलिस ने शिव शंकर भाट को राँझा चौक से २ बजे गिरफ्तार किया था । घटना ३ः३० हुई । यानि डेढ घण्टे पहले जो आन्दोलनकारी गिरफ्तार हुआ, पुलिस ने उसी को मुद्दा का शिकार बना दिया । अदालत में केश पर बहस करते हुए वकीलों ने भी यही सवाल खडेÞ किए और कहा कि पीछे वाले व्यक्ति पर पत्थर न लगकर आगेवाले व्यक्ति के सीने पर कैसे लगा ? सरकारी वकील और पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था ।
पुलिस ने भाट को फँसाने का पूरा प्रयास किया लेकिन, चूक गई सच्चाई के कदमों से । चिकित्सक को भी पुलिस ने अपने पक्ष में लिया और पोष्टमार्टम रिपोर्ट में पत्थर से चोट लगने के कारण मौत दिखाया गया । चोट लगने या न लगने को तो चिकित्सा शास्त्र परिभाषित कर सकता है लेकिन जहाँ कोई घाव न हो, सिर्फ अन्दरुनी चोट हो वहाँ किस से चोट लगी यह कैसे कहा जा सकता है ? प्रतिवादी शिवसंकर के तरफ से २२ वकीलो नें बाँके जिला अदालत में बहस किया और पुलिस की करतुतों का पोल खोल दिया ।
वकीलों ने पुलिस को मानसिक रूपसे अस्वस्थ बताया । इतने सबूत और प्रमाण के खिलाफ भी न्यायाधीश दल बहादुर केसी के इजलास ने भाट को तत्काल हिरासत में रखकर कारवाही आगे बढ़ाने का आदेश दिया । न्यायाधीश के इस फैसले से एकबार फिर न्याय का गला घोट दिया गया । दुर्घटना को जबरन हत्या बताने वाली पुलिस तथा उसकी जाँच पर अब वकीलों ने सवाल खड़े किए हैं ।
अधिवक्ता विजय कुमार शर्मा ने हिमालिनी से बातचीत में बताया कि जो व्यक्ति(करण सिंह) मोटरसाइकल चला रहा था उसका चालक अनुमति पत्र मिसिल में नहीं है, वारदात स्थल पर हेलमेट नहीं मिला यानि विना हेलमेट गाड़ी चलाया जा रहा था । पुलिस ने ३०,३५ लोगों का समूह दिखाकर शंकर भाट का पहचान कैसे किया यह भी पुष्टि नहीं हो पा रहा है और पोष्टमार्टम में पत्थर की चोट कैसे पुष्टि हुई यह सब जाँच का विषय बन रहा है ।
आन्दोलनकारियों ने जब कई दिन पहले से बन्द जारी रखा था तो उसमें सवारी साधन चलाना अपने आप में ही जोखिम भरा कार्य है इसपर सवाल क्यों नहीं उठाया गया ? अधिवक्ता शर्मा ने कहा यहाँ मुद्दा पूरी तरह से राजनीतिक दिख रहा है । यह पुलिस ने जबरदस्ती चलाया है । दुर्घटना को हत्या बताकर सरकारी कोष खाली करने का अभियान है यह ।
हत्या घटना के मुचुल्का में समय भी सही नहीं है । कहीं २ बजे, कहीं ३ तो कहीं साढे ३ दिखाया गया है । मृतक करण सिंह की पत्नी वसन्ती सिंह के जाहेरी के आधार पर पुलिस ने कारवाही को आगे बढ़ाया । करीब २२ दिन के अनुसन्धान के बाद पुलिस ने भाट को अदालत में उपस्थित किया । २ दिन तक चले बहस के बाद अदालत ने शिव शंकर भाट को हिरासत में रखने का आदेश दे दिया ।
जिला एसपी बसन्त पन्त का दाबी अभी भी वही है । उन्होंने कहा घटना के बारे में अभी भी जाँच चल रही है । सब कुछ साफ सामने आएगा । घटना हत्या का है जिस पर सबूत प्रमाण में कहीं कमी कमजोरी होगी तो उसे पूरा किया जाएगा । एक महीने बाद किस सबूत की बात कर रहें हैं एसपी ।
भाट के परिवार के लोग अदालत से अभी भी न्याय प्राप्त होने पर विश्वस्त हैं । हलाँकि हिरासत में रखने का आदेश उन्हें भी खल रहा है । लेकिन विकल्प सिर्फ अदालत के पास होेने के नाते न्याय पर भरोसा रखना परिवार की बाध्यता भी है ।

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