Wed. Feb 13th, 2019
radheshyam-money-transfer

अयोध्यानाथ चौधरी

ऐ जिन्दगी!
तुम कब तलक , यूँही
दहलीज के बाहर
ऐसे ही अंगूठे से
मिट्टी कुरेदती रहोगी
इतनी संवेदनहीनता !
मेरा सूनापन
अब मौत के समीप है
बर्षों बीत गए
एक पल के लिए ही सही
तुम आओ
मैं चाहता हूँ
तुम आओ
मैं चाहता हूँ
तेरी गोद मे सर रख
मर जाऊँ
और फिर
तुम चली जाना
कभी ना आने के लिए ।

 

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of