Thu. Oct 18th, 2018

ओली सरकार के विषय में आप क्या कहते है ?

करीब तीन महीने पहले एमाले अध्यक्ष केपी ओली प्रधानमन्त्री बने थे । उससे पहले से ही जारी मधेश आन्दोलन चार महीने होने लगे है । सर्वसाधारण जनता ने अपेक्षा की थी कि ओली सरकार गठन के बाद आन्दोलन को सम्बोधन किया जाएगा और जनजीवन सामान्य हो पाएगा । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । अब तो वर्तमान सरकार के विकल्प के बारे में भी बहस शुरु होने लगी है । ऐसी ही परिस्थिति में सर्वसाधारण जनता ओली सरकार और जारी मधेश आन्दोलन के सम्बन्ध में क्या कहती है ? हिमालिनी संवाददाता लिलानाथ गौतम द्वारा सर्वसाधारण से की गई बातचीत –

सरोज कुशवाह, सिम्रौनगढ, बारा
केपी ओली नेपाल के लिए अभिशाप बन चुके है । मैं तो कामना करता हूँ– अब ओली जैसे व्यक्तियों का नेपाल में जन्म ही न हो । मधेश आन्दोलन चार महीने से चल रहा है । अभी तक आन्दोलनकारियों की बातों को सुनने के लिए वह तैयार नहीं है । ओली मधेश विरोधी है । आन्दोलन से हम मधेशी ही नहीं, पहाड़ी जनता भी पीडि़त हैं । काठमांडू में रह कर अपना

सरोज कुशवाह, सिम्रौनगढ, बारा
सरोज कुशवाह, सिम्रौनगढ, बारा

व्यवसाय करनेवाले हम जैसे सर्वसाधारण को महीनों से गैस नहीं मिल रहा है । मंहगाई अत्याधिक बढ़ गयी है । हमारा गांव अर्थात् आन्दोलनरत क्षेत्र मधेश भी इसी समस्या को भुगत रहा है । ओली हमारे बात तो नहीं सुनना चाहते हैं, कम से कम पहाड़वासियों की समस्या तो समझ सके । लेकिन ओली वह भी नहीं कर रहे हैं । मेरे विचार में तो ओली में कोई भी राजनीतिक चरित्र नहीं है । नेता तो दूर की बात, वह तो कार्यकर्ता बनने के लायक भी नहीं । जनता की आवाज को न सुननेवाला कोई भी व्यक्ति नेता नहीं हो सकता । एमाले पार्टी के बारे में मेरा कुछ कहना नहीं है । उस पार्टी से दूसरा कोई भी नेता प्रधानमन्त्री बने, लेकिन ओली मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है । मन में जो आया, वही बोलने वाले नेता हम को नहीं चाहिए । ओली के बोली से ही आज सम्पूर्ण देश जल रहा है ।
मैं मधेश आन्दोलन का समर्थक हूँ । मधेशी मोर्चा की हर माँग जायज है । वह पूरी होनी चाहिए । पहला मधेश आन्दोलन ने ‘मधेश एक प्रदेश’ मांगा था । समझदारी के लिए अभी मधेशी मोर्चा दो प्रदेश के लिए राजी दिख रहे हैं । लेकिन इसको स्वीकारने के लिए ओली तैयार नहीं है । ओली हमारी बात सुनना ही नहीं चाहते हैं । कम से कम हमारी बात सुने, अगर हम गलत हैं तो हम को समझाइए कि हम कहाँ गलत हैं । लेकिन परिणाम विहीन वार्ता का यह नाटक बन्द होना चाहिए । क्योंकि ओली से यह सम्भव भी नहीं है । समाचार में हम पढ़ते हैं कि नाकाबन्दी के बावजूद भी गैस और इन्धन आ रहा है । लेकिन सर्वसाधारणों को नहीं मिल रहा है । क्या यह सब सिर्फ केपी ओली और उनके चमचों के लिए ही है ? इसीलिए जितना जल्द हो सके ओली सरकार को हटाना चाहिए । जब तक ओली प्रधानमन्त्री में रहेंगे, तब तक देश का हित होने वाला नहीं है ।

पुष्प कार्की, भोजपुर, हालः कौशलटार
वर्तमान सरकार अपने मिशन के अनुसार काम नहीं कर पा रही है ।

पुष्प कार्की, भोजपुर, हालः कौशलटार
पुष्प कार्की, भोजपुर, हालः कौशलटार

‘कहीं हम लोग राज्यविहीन अवस्था में तो नहीं हैं ?’ यह प्रश्न हर किसी के मन में हैं । इस अर्थ में जनता को अपना अभिभावकत्व प्रदान करने में ओली पूर्णरूप में असफल हो चुके हैं । अभी हम जो समस्या भुगत रहे हंै, इसे देखकर लगता है कि मानवीय सम्वेदना भी ओली सरकार में नहीं है । अभी देश संकट में है, यह हम सब जानते हैं । लेकिन जो काम सरकार के द्वारा सम्भव था, वह भी नहीं हो पा रहा है । आधारभूत आवश्यकता से भी जनता वञ्चित हो रही है । विद्यार्थी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, बीमार व्यक्ति अस्पताल नहीं जा पा रहे हंै, गम्भीर रूप से बीमार व्यक्ति और ऑप्रेसन के लिए अत्यावश्यक दवाइयाँ उपलब्ध नहीं हो रही हैं । कालाबाजारियों का व्यापार फलफूल रहा है । जिसके चलते प्राइभेट सवारी के कारण सड़क जाम है । लेकिन सार्वजनिक यातायात की सुविधा से सर्वसाधारण वञ्चित हो रहे हैं । गरीब और कमजोर लोगों के लिए अभी कोई सरकार नहीं है ।
ओली सरकार से पहले ही मधेश आन्दोलन शुरु हुआ था । सरकार की पहला प्राथमिकता आन्दोलन की ‘सेफल्याण्डिङ’ होनी चाहिए थी । लेकिन अभी तक आन्दोलन जारी है । ओली सरकार की सबसे बड़ी असफलता यही है । आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा के साथ वार्ता तो हो रही है, लेकिन परिणाम कुछ नहीं दिख रहा है । सरकार तथा मोर्चा दोनों को समझना चाहिए कि किसी भी प्रकार का राजनीतिक आन्दोलन और मुद्दा सम्बोधन के लिए अन्तिम विकल्प वार्ता ही है । लेकिन वार्ता में बैठे लोग इमानदार नहीं होने के कारण अभी जनता समस्या में हैं । वर्तमान संकट के लिए सबसे दोषी तो सरकार ही है और मधेशी मोर्चा भी इसमें कम जिम्मेदार नहीं है । मोर्चा की जो भी माँगें हैं उनमें भी जायज या नाजायज माँगें हैं जिन्हें गम्भीरता के साथ समझकर सत्ता और मोर्चा को बीच का रास्ता निकालकर समाधान ढूँढना चाहिए ।

रामलाल राय, काठमांडू
कोई भी व्यक्ति केपी ओली को पसन्द नहीं करते । बोलते वक्त ओली जो शब्द

रामलाल राय, काठमांडू
रामलाल राय, काठमांडू

चयन करते हैं, उसी शब्द से सम्पूर्ण नेपाली का मन दुखता है । उनके शब्द के कारण आज हम लोग दुःख भोग रहे है । ओली में थोड़ी भी मानवीय सम्वेदना रहती तो चार महीने तक मधेश आन्दोलन नहीं चलता । हाँ, मधेशी समुदाय के कुछ व्यक्ति पहाड़ी समुदाय और ओली का विरोध करना, अपना फैशन समझ चुके हैं । लेकिन मैं इस तरह का विरोधी नहीं हूँ । मेरा पुख्र्यौली घर महोत्तरी है और मधेशी समुदाय से हूँ । अभी मेरा घर काठमांडू में है । बहुत पहाड़ी मित्रों से सुमधुर सम्बन्ध है । मैं उन लोगों का सम्मान करता हूँ, वे भी मुझे सम्मान करते हैं । मुझे लगता है– ओली सिर्फ मधेश विरोधी ही नहीं है । वह तो पहाड़ के जनता की पीड़ा भी नहीं समझ रहे है । इसीलिए ओली में एक नेता में होने वाला कोई भी गुण नहीं है । सर्वसाधारण के घरों में खाना बनाने के लिए गैस नहीं है, कहीं जाना चाहे तो सार्वजनिक सवारी नहीं मिलती । बीमार व्यक्ति के लिए औषधि नहीं है । दुनिया में ऐसी भी सरकार होती है क्या ? ओली की नीयत क्या है, वह मै नहीं जनता । मुझे लगता है कि ओली से कोई भी समस्या का समाधान होने वाला नहीं है । अगर वह चाहे तो भी नहीं होता । क्योंकि उनकी बोली ही ठीक नहीं है । अच्छी बात भी वह गलत शब्द चयन करके बोलते हैं । ओली के बोली के कारण ही आज तीन करोड़ नेपाली समस्या में हैं । मधेश में देश की ५० प्रतिशत जनता रहती हैं, लेकिन उन लोगों की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते । अपनी सत्ता टिकाने के लिए वह मन्त्रालय विभाजन करते हैं । दर्जनों उप–प्रधानमन्त्री बनाने के लिए भी तैयार दिखते हैं । लेकिन हम जैसे व्यवसायियों का व्यवसाय महीनों से ठप्प है । बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं । इस अवस्था में देश को किस तरह आगे ले जाएगी ओली सरकार ?

खिमानन्द बन्जाडे, अर्घाखाँची, हालः काठमांडू
यह सच है कि ओली सरकार ने जनता की अपेक्षा अनुसार काम नहीं किया है । भूकम्प पीडि़तों और नाकाबन्दी से पीडि़त जनता को राज्य की तरफ से

खिमानन्द बन्जाडे, अर्घाखाँची, हालः काठमांडू
खिमानन्द बन्जाडे, अर्घाखाँची, हालः काठमांडू

जो राहत होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पा रही है । इसी तरह पीछे पडेÞ वर्ग और समुदाय को अधिकार देने में भी उन्हें उदार होना चाहिए । इतना होते हुए भी राष्ट्रीयता के सम्बन्ध मे उन्होंने जो अडान रखा है, वह जायज है । हिमाल, पहाड़ और तराई अलग–अलग करके संघीय राज्य निर्माण करना ठीक नहीं है । उनकी यह मान्यता सही है । लेकिन अभी तो कुछ इसी तरह का संघीय राज्य बन चुका है । केपी ओली की असफलता में बहुत हद तक मधेशी मोर्चा भी जिम्मेदार है । क्योंकि मधेशी मोर्चा की सब मांग जायज नहीं है ।
हाँ, तराई में बहुत सारे पीडि़त समुदाय हैं । आर्थिक रूप में कमजोर और अल्पसंख्यकों की संख्या पहाड़ से ज्यादा तराई में हो सकती है । मधेशी मोर्चा के द्वारा प्रस्तुत मांगों में इस मुद्दा को सम्बोधन करने के लिए कोई भी मुद्दा नहीं समेटा गया है । आर्थिक रूप में सम्पन्न वर्ग और मधेश के नाम में राजनीति करनेवालों के झूठे आश्वासन के कारण आज तराई अशान्त हो रहा है । मधेशी जनता को अधिकार मिलना चाहिए, इस में दो मत नहीं है । लेकिन मोर्चा द्वारा प्रस्तुत मांग पूरा करने के बाद भी वहाँ की जनता अधिकार से वञ्चित ही रह जाएगी । क्योंकि मधेशवादी दल जनता को अधिकार दिलाने से ज्यादा वहाँ अपनी हुकुमी शासन स्थापित करना चाहते हैं ।
पेशा से मैं कानून व्यवसायी हूँ । इसीलिए दावे के साथ कह सकता हूँ– अभी जो संविधान बना है, यह विश्व के उत्कृष्ट कई संविधान की तुलना में ज्यादा ही प्रगतिशील संविधान है । कोई भी वर्ग, समुदाय और जातजाति के लिए यह संविधान विभेदकारी नहीं है । कल इसी संविधान के अनुसार कानून बननेवाला है, विभिन्न आयोग बननेवाला है । इतिहास में पीछे पड़े वर्ग और समुदाय को आगे लाने के उद्देश्य से ही ही आयोग की अवधारणा आगे लायी गयी है । इसलिए उन लोगों का अधिकार और भी सुरक्षित होने वाला है ।
लेकिन मधेशी मोर्चा ने सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा को आगे लाकर चार महीना से देश को जिस तरह बन्धक बनाया है, यह निन्दाजनक है । सीमांकन मुख्य मुद्दा है ही नहीं, सम्मानजनक अधिकार मुख्य मुद्दा है । वीरगन्ज और जनकपुरवासी क्यों सिर्फ झापा, मोरङ और सुनसरी मांग रहे है ? ‘सगरमाथा भी मेरा ही है, उसका उपयोग भी मेरा अधिकार है’ क्यों नहीं कहते ? पहाड़ के लोग ‘मधेश मेरा भी है’ कहते हैं । लेकिन वीरगन्जबासी ‘हिमाल मेरा भी है’ क्यों नहीं कहते ? ‘मेची से लेकर कञ्चनपुर तक, हिमाल से लेकर तराई तक, सब मेरा ही है’ ऐसी भावना मधेशी जनता में क्यों नहीं है ? क्योंकि मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले लोग वहाँ की सर्वसाधारणों के बीच झूठ की खेती कर रहे है । जब तक इस तरह के भ्रम का अन्त नहीं होगा, तब तक समस्याओं का दीर्घकालीन समाधान भी नहीं हो सकता ।
भाई–भाई झगड़ कर जिस तरह अंशबण्डा हो जाता है, उसी तरह संघीय राज्य का सीमांकन नहीं किया जाएगा । कल तक मधेशी और पहाड़ी समुदाय मिल कर रहे थे । मधेश में पहाड़ी थे और पहाड़ में मधेशी । कोई भी एक–दूसरे के जानी–दुश्मन नहीं बने थे । लेकिन आज कुछ राजनीतिक दल, उस भाईचारा के विरुद्ध साम्प्रदायिक भावना विकास कर रहे हैं । कुछ राजनीतिक दलों की राजनीति सफल हो सकती है । लेकिन सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा को लेकर किया गया यह साम्प्रदायिक राजनीति जनता को अधिकार देने वाला नहीं है । मधेशी जनता में फैले इस भ्रम को ओली सरकार को हटाना चाहिए ।

मनिता श्रेष्ठ, काठमांडू
मैंने अभी तक जितने भी सरकार को झेला है, कोई भी सरकार प्रशंसा योग्य नहीं रहा है । लेकिन जब मैंने केपी ओली प्रधानमन्त्री बनने की बात सुनी,

मनिता श्रेष्ठ, काठमांडू
मनिता श्रेष्ठ, काठमांडू

कुछ आशाएं जगी । क्योंकि मै मानती थी कि राजनीति में वह एक अलग पहचान के व्यक्तित्व हैं । छल–कपट और झूठी बात उन से नहीं होगी । उनके द्वारा निकले गए ‘सत्य वचन’ के कारण कुछ लोगों को नींद हराम हो जाती थी । जायज विषयों में वह अडिग रहते थे । उन की यही खूबी के कारण मैं आशावादी था । ओली उस समय प्रधानमन्त्री हुए, जिस समय देश अत्यन्त संकटपूर्ण अवस्था में था और है । मुल्क के राजनेता बनने के लिए यह संकट उनके लिए अवसर हो सकता है । इस वक्त वह एक नायक की भूमिका निर्वाह कर सकते थे । लेकिन नहीं कर पा रह हंै । इसीलिए बहुतों की आशा, अब निराशा में परिणत हो रही है ।
तराई आन्दोलन चार महीनों से चल रहा है । प्रधानमन्त्री होने के कुछ दिन बाद ही यह समस्या समाधान करना चाहिए था, लेकिन नहीं हुआ । जनता महंगाई की मार में पड़ गइ है । सरकारी संरक्षण में ही कालाबाजारियों का दिन फलफूल रहा है । भूकम्प पीडित खुले आकाश के नीचे जीवनमरण में हैं । ऐसी अवस्था में ओली छः–छः उपप्रधानमन्त्री बनाते हैं । मन्त्रालय को विभाजन करके मन्त्रियों की संख्या बढ़ाते हंै, यह सब किस लिए ? मैं सर्वसाधारण हूँ, सत्ता की आन्तरिक बातें नहीं जानती । सब कह रहे हंै– उनकी सरकार गिरने वाली है, इसीलिए यह सब कर रहे हैं । उनकी यह कार्यशैली ठीक नहीं है । सत्ता के लिए नहीं, जनता के लिए काम करना चाहिए था । तराई आन्दोलन के प्रति भी वह सम्वेदनशील नहीं हो रहे है । आन्दोलनकारियों की जायज मागों को सम्बोधन करना राज्य का धर्म है । अगर नाजायज मांग है तो स्पष्ट रूप में उसे इन्कार करना चाहिए । ओली यह दोनों नहीं कर रहे हैं । जिसके चलते आज पूरे देश पीड़ा में है । इसके लिए मधेशी मोर्चा भी कम जिम्मेदार नहीं है । नेपाल जैसे छोटे देश में संघीय राज्य नहीं, विकेन्द्रीकरण का सही सदुपयोग होना चाहिए था । लेकिन अब तो हम संघीय राज्य में प्रवेश कर चुके हैं । जितना जल्द हो सके सर्वस्वीकार्य कम से कम संघीय राज्य बनाना चाहिए । जाति और समुदाय विशेष को लक्षित कर संघीय राज्य बनाना ठीक नहीं है । नेपाल जैसे छोटे देश में कोई भी जाति, भाषा और समुदाय विशेष का राज्य नहीं बन सकता । नेपाल में सिर्फ मधेशी ही नहीं, पहाड़ी समुदाय भी राज्य से प्रदत अधिकार से वञ्चित हंै । यह बात मधेशी मोर्चा को समझना चाहिए ।

शुभाकर सिंह, भुइँचक्रपुर, धनुषा
मधेश आन्दोलन का चार महीना और प्रधानमन्त्री ओली का सत्तारोहण हुए तीन महीना हो रहे हैं । लेकिन अभी तक समस्या समाधान क्यों नहीं हो रही है ? इसका एक ही कारण ओली सरकार है । तराई आन्दोलन से सिर्फ मधेशी ही पीडि़त नहीं है, पहाड़ और हिमाल की जनता भी पीडि़त है । लेकिन ओली सरकार अपनी सत्ता स्वार्थ के प्रति ही केन्द्रित हैं । मन्त्रालय विभाजन करना और आवश्यकता से ज्यादा उप–प्रधानमन्त्री बनाना इसका

शुभाकर सिंह, भुइँचक्रपुर, धनुषा
शुभाकर सिंह, भुइँचक्रपुर, धनुषा

उदाहरण है ।
मैं जनकपुरवासी हूँ, आन्दोलन को करीब से देख रहा हूँ । आन्दोलनकारियों की हर मांग जायज है । हाँ, सहमति और सम्झौते की राजनीति में कुछ मांगें पूरी नहीं भी हो सकती हैं । लेकिन मधेश की आधारभूत मांगों का सम्बोधन होना चाहिए । कुछ व्यक्ति सवाल कर रहे हैं– जनकपुर और वीरगन्ज में आन्दोलन करने वाले लोग झापा, मोरङ और सुनसरी क्यों मांग रहा है । हम भी प्रश्न करते हैं– क्या झापा, मोरङ और सुनसरी तराई के जिले नहीं है ? हिमाल, पहाड़ और तराई कह कर वर्षों पहले जो भौगोलिक विभाजन किया था, उस वक्त इन जिलों को क्या तराई नहीं कहा गया था ? अभी हम लोग उक्त जिला को तराई प्रदेश में चाहते हैं तो क्यों आपत्ति हो रही है ? उसी तरह जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र मांगना और नागरिकता के विषय में स्पष्ट होना भी कोई नाजायज मांग नहीं है । लेकिन ओली सरकार हमारी बात सुनने से इन्कार कर रहे हैं । वह तो दमन में उतर आए हंै । जिसके चलते आन्दोलन के क्रम में मानवअधिकार हनन हो रहा है ।
पुलिस हो या आन्दोलनकारी, जो भी मरा हो, यह तो हिंसा ही है । हम मधेश में रहते हंै, लेकिन हमारा देश नेपाल है, हम नेपाली हैं । लेकिन राज्य की तरफ से भी हमारे ऊपर नेपाली नागरिकों की तरह व्यवहार होना चाहिए, विभेद का नहीं । अभी तक नेपाल में जो सरकार बनी है, उससे यह नहीं हो रहा है । ओली सरकार तो अन्य सरकार से भी ज्यादा विभेदकारी निकली ।

 

 

 

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