Tue. Nov 20th, 2018

कबिता

मदहोश मौसम
:-भीमनारायण श्रेष्ठ
श्वेत शुभ्र उत्तुङ्ग हिमशिखरों में
हरे-भरे पर्वतों की वादियों में
विविध विचित्रताओं से भरे
सुन्दर सुरम्य वन उपवन में
तर्राई के धनहर खेतों में
लहलहाते धान की बालियों में
गिरि कन्दराओं में
बागों में बगीचों में
शीतल मन्द समीरों मेंर्
र्सवत्र ऋतु वसंत छाया है !
लगता है, धरती पर
इन्द्र-कानन उतर आया है !
मगर सावधान,
इन मस्त बहारों में
झूमती इठलाती कली !
देखों, कल तुम जवान होगी
बाद में तुम्हारी पंखुडिÞयाँ
मुरझाकर गिर जायंगी !
लोगों के मानस में
तुम्हारी खूबसूरती धुंधली पडÞ जायगी
तब तुम्हे कौन पूछेगा –
ना … !
ज्यादा इतराना मत !
इठलाना मत !!
-कवि भीमनारायण श्रेष्ठ साहित्य-संगीत-कला समाज शोणितपुर के अध्यक्ष है)
-हिन्दी रुपान्तरणः मुकुन्द आचार्य

मर्ज बढता ही गया
:-उदय चन्द्र दास
लगा सैकडÞा राणाओं की, फिसल गयी जब गद्दी।
आए पंच लगा कर तीसा, बन कर गए फिसड्डी।।
माही, वीरु, ज्ञानूजी सब, दिखते रहे मदारी।
नाची जनता मर्कट जैसे, बन अबला बेचारी।।
देख दशा हमदर्द पडÞोसी, मन्त्र एक ले आया।
सोयी कुम्भकर्णर्ी जनता को, कानों में फूँक जगाया।।
जनता ने हुँकार भरी तब, गया ‘राज’ और ‘ताज’।
आया लोकतन्त्र पर मिट गए, जननी के जाँबाज।।
राजा, राणा, पंच, तिरोहित, नेता नवीन सब आए।
ठाट-बाट सब वही पुराना, जनता विस्मित भरमाए।।
बाँट के खाते राजनीति में, मिल कर मौज मनाते।
जिस रस्ते जनता को दुःख हो, नेता वह अपनाते।।
नेता होते छुट र्‍ भैये सम, होते सब दल-बदलू।
देखा जिधर खीर झट् से, बदला करते हैं पहलू।।
सहन शक्ति जनता की होती, सहती कष्ट अपार।
कर-मंहगाई बोझ तले, पिसती है बारम्बार।।
लगा जान की बाजी जनता, जाती टुँडीखेल।
चिल्लाती भूखी रह कर, नेता करते रंग-रेल।।
बहुत हुआ तो कर्ुर्सर्ीीदली, बदले ज्यों सिंहासन।
देने वाले सजा के बदले, देते हैं उच्चासन।।
इसीलिए तो रक्तबीज सम, पनप गए चहुँ ओर।
ये बडेÞ धर्मात्मा दिखते, पर होते सब चोर।।
पाँच सितारा होटल में जा, गप्पें खूब लडÞाते।
जनता के पैसों को, पानी समझ बहाते।।
धन सम्भले न घर में जब, वे ले परदेश हैं जाते।
जनता के हिस्से का इनकी, पुस्तों-पुस्त हैं खाते।।
‘फार्म-हाउस’ जैसा है उनका, संसद या कारागार।
मित्रों से मिलने जाते, और करते वहाँ विहार।।
लहू बहाती जनता अपनी, कल की आस सँजोए।
जनता की लाशों पर चलकर, नेता मद में खोए।।
फिक्र नहीं जनता या देश की, बने नहीं संविधान।
येन-तेन चिपके सत्ता से, करते अपना कल्याण।।

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