Fri. Mar 22nd, 2019

कुछ कर दिखाने का हौसला, प्रबल इच्छा शक्ति और अटूट दृढ़-संकल्प है तो आपकी जीत निश्चित है।

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सत्यम सिंह बघेल

कुछ कर दिखाने का हौसला, प्रबल इच्छा शक्ति और अटूट दृढ़-संकल्प है तो आपकी जीत निश्चित है। किसी ने कहा है कि-
मंजिले उनकों ही मिलती हैं, 
जिनके सपनों में जान होती है।
पंख से कुछ नहीं होता,
हौंसलों से उड़ान होती है।।
और इन पंक्तियों को अपने जीवन में शाश्वत करने वाली हैं – भारत से राष्ट्रीय स्तर की पूर्व वालीबाल खिलाड़ी तथा माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय विकलांग अरुणिमा सिन्हा जी।अरुणिमा सिन्हा लखनऊ से दिल्ली जा रही थी रात के लगभग एक बजे कुछ शातिर अपराधी ट्रैन के डिब्बो में दाखिल हुए और अरुणिमा सिन्हा को अकेला देखकर उनके गले की चैन छिनने का प्रयास करने लगे जिसका विरोध अरुणिमा सिन्हा ने किया तो उन शातिर चोरो ने अरुणिमा सिन्हा को चलती हुई ट्रैन से बरेली के पास बाहर फेक दिया जिसकी वजह से अरुणिमा सिन्हा का बाया पैर पटरियों के बीच में आ जाने से कट गया। पूरी रात अरुणिमा सिन्हा कटे हुए पैर के साथ दर्द से चीखती-चिल्लाती रहीं। लोगो को इस घटना का पता चलने के बाद उन्हें नई दिल्ली के AIIMS में भर्ती कराया गया। चार माह चले इलाज के बाद उनके बाये पैर को कृत्रिम पैर के सहारे जोड़ दिया गया।
अरुणिमा सिन्हा की ऐसी हालत देखकर डॉक्टर आराम करने की सलाह दे रहे थे तथा परिवार वाले व रिस्तेदारो के नजरों में वे कमजोर व विंकलांग हो चुकी थी लेकिन अरुणिमा सिन्हा किसी के आगे खुद को बेबस और लाचार घोषित नही करना चाहती थी उन्होंने अपने हौसलो में कोई कमी नही आने दी और उन्होंने अपने कृत्रिम पैर के सहारे ही चढ़कर दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा लहराया है। अरुणिमा यहीं नहीं रुकीं। युवाओं और जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव के चलते निराशापूर्ण जीवन जी रहे लोगों में प्रेरणा और उत्साह जगाने के लिए उन्होंने अब दुनिया के सभी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को लांघने का लक्ष्य तय किया है। इस क्रम में वे अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की एलब्रुस चोटी पर तिरंगा लहरा चुकी हैं।
अरुणिमा अगर हार मानकर और लाचार होकर घर पर बैठ जाती तो आज वह अपने घर-परिवार के लोगों पर बोझ होती।सम्पूर्ण जीवन उन्हें दूसरों के सहारे गुजारना पड़ता। लेकिन उनके बुलंद हौसले, दृढ़- संकल्प, प्रबल इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास ने उन्हें टूटने से बचा लिया। अरुणिमा का कहना है कि-” इंसान शरीर से विकलांग नहीं होता बल्कि मानसिकता से विकलांग होता है”।
मुश्किलें तो हर इंशान के जीवन में आतीं हैं, लेकिन विजयी वही होता है जो उन मुश्किलों से, बुलन्द हौसलों के साथ डटकर मुकाबला करता है। मुश्किलों की कमजोरी नही मजबूती बनाता है वही इतिहास रचता है। हां अंत में एक बात और कि- इतिहास रटिये नही बल्कि इतिहास रचिये।

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