Fri. Sep 21st, 2018

केन्द्र दो न.प्रदेश को कठपुतली बनाकर नचाना चाहती है : श्वेता दीप्ति

लालबाबू राउत गद्दी, प्रदेश न. २ के मुख्यमन्त्री

श्वेता दीप्ति, काठमांडू | विगत चुनाव के बाद जनता ने नए–नए संघीयता का स्वागत किया । परिवर्तन और राष्ट्रवाद की लहर ने देश को कथित तौर पर एक स्थिर और शक्तिशाली नेतृत्व प्रदान किया । परन्तु क्या सचमुच केन्द्र ने संघीयता के अस्तित्व को स्वीकार किया है ? पर पिछले दिनों दो नम्बर प्रदेश को लेकर सरकार की जो नीति दिख रही है उससे यह स्पष्ट होता है कि संघीयता का अस्तित्व एक कठपुतली से अधिक और कुछ नहीं है । जिसकी डोर केन्द्र अपने हाथों में रखना चाह रही है जिसे अपने हिसाब से वह नचाना चाहती है । अर्थात हर वह बात जो केन्द्रीय सत्ता चाहे मुख्यमंत्री को वही करना होगा वरना सत्ता छीन लेने की धमकी ।

वैसे भी अभी केन्द्रीय सत्ता के हाथों में सिर्फ दो नम्बर प्रदेश ही नहीं है इसलिए भी ऐनकेन प्रकारेण उसे हाथों में लेने की पूरी कोशिश उनकी जरुर होगी । और अब तो एकीकरण के पश्चात् दो नम्बर प्रदेश में भी केन्द्रीय सरकार की पकड़ मजबूत हो गई है । जिसकी वजह से “फूट डालो और राज करो” की नीति की प्रबल सम्भावना नजर आ रही है । पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की जनकपुर यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री लालबाबु राउत के दिए वक्तव्य को केँद्रीय सरकार पचा नहीं पा रही । पर ताज्जुब तो इस बात का है कि सरकार यह कैसे भूल गई कि मधेशी जनता अपनी माँगों को भूल गई है ? क्या चुनाव करा लेने को अपनी जीत समझ लेना और मधेश की जनता को हर बार की तरह हाशिए पर रखना केन्द्रीय सरकार की नादानी नहीं होगी ? मुख्यमंत्री राउत की जिम्मेदारी है कि वह दो नम्बर प्रदेश की जनता के हक में बात करें क्योंकि वो उनका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । जहाँ तक संविधान संशोधन की बातें हैं तो सत्ता यह क्यों भूल रही है कि इससे पूर्व के प्रधानमंत्रियों ने दिल्ली जाकर स्वीकार किया है कि संविधान त्रुटिपूर्ण है और इसमें सुधार की आवश्यकता है । इतना ही नहीं संसद इस बात की गवाह है कि वहाँ संसोधन संबन्धित विधेयक लाया गया और जो वर्तमान सरकार की वजह से पारित नहीं हो पाया । फिर अगर अपनी ही मिट्टी और अपनी ही जनता के समक्ष इस बात को मुख्यमंत्री ने रखा तो इसमें देश की बेइज्जती कैसे हो गई ? अगर मुख्यमंत्री वक्तव्य नहीं देते तो क्या विश्व के सामने यह बात आ जाती कि मधेश ने अपनी माँग छोड़ दी है और अब यहाँ कोई समस्या नहीं है ? वैसे जिस बात पर सरकार या मीडिया मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर रही है उस विषय पर हुए मधेश आन्दोलन से विश्व परिदृश्य अन्जान तो नहीं है । फिर इतनी बैचेनी क्यों ?

मधेश की खामोशी का यह मतलब तो नहीं है कि सब ठीक चल रहा है । बावजूद इसके आज के समय में सरकार को समर्थन शायद इसी उम्मीद पर मधेशी दलों ने दिया कि इनका रुख सकारात्मक होगा और मधेश की माँग को समबोधित किया जाएगा । लेकिन ज्यों ही वर्तमान सरकार ने एकीकरण किया त्यों हीं इनके तेवर बदल गए हैं और इसी बिला पर दो नम्बर प्रदेश की सरकार को हिला देने की चेतावनी दी जा रही है । जनरल कन्भेन्सन अफ मधेसी एशोसीएशन इन अमेरिका नामक कार्यक्रम में भाग लेने की अनुमति माँगने पर प्रधानमंत्री द्वारा जो प्रतिक्रिया आई है वह निःसन्देह क्षोभनीय है । अपने रोष को प्रदेश के लम्बित कामों का हवाला देकर मुख्यमंत्री के अमेरिका भ्रमण पर रोक इसी की एक कड़ी है जो उन्हें सजा के तौर पर दी गई है । यह निर्णय गलत ही नहीं हास्यास्पद भी है खास कर रोके जाने की जो वजह बताई जा रही है उसे सुनकर । पर इसके पीछे का खुन्नस क्या है यह भी स्पष्ट है । तो क्या यह माना जाय कि दो नम्बर प्रदेश में भी सरकार अन्य प्रदेशों की तरह अपना वर्चस्व देखना चाहती है ? और इसके लिए अगर यह कहा जाय कि उसका प्रयास शुरु हो चुका है तो गलत नहीं होगा । पर इन सबके बीच अफसोस मधेशवादी दलों को देख कर आश्चर्य होता है जो आज भी न जाने ये किस मुहुरत का इंतजार कर रहे हैं ? क्या अब तक इनका मोह भंग नहीं हुआ है या सरकार में शामिल होने की ललक इतनी तीव्र है कि मधेश के अस्तित्व को ही दाँव पर लगा देना चाहते हैं ? अगर दो विपरीत दिशा वाले दल विलय हो सकते हैं तो इन मधेशी दलों की तो राह एक है फिर ये अपनी जिद या अहं या फिर स्वार्थ को छोड़ क्यों नहीं पा रहे ? क्या ये भूल रहे हैं कि इनकी अगली अदालत फिर दो नम्बर प्रदेश ही होगी या फिर अपनी राजनीतिक यात्रा को चार वर्षों में ही समेट लेना चाहते हैं ? वक्त रहते फैसला लें वरना “का वर्षा जब कृषि सुखानी” ।

 

 

 

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