Mon. Dec 17th, 2018

क्याें जाते हैं हम, मंदिर क्या हैं इसके लाभ ?

 

 

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हमारा देश अपनी समृद्ध परंपरा और संस्कृति के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां आज भी कई प्राचीन काल के मंदिर मौजूद हैं। जहां अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित इन मंदिरों में प्रायः लोग परिवार या अकेले भी अपने इष्टदेव की आराधना के लिए पहुंचते हैं। मगर क्या आपके मन में भी कभी यह सवाल आया है मंदिर जाकर दर्शन करने का विधान क्यों बनाया गया है। इसके पीछे भले ही आध्यात्मिक विचारधारा काम करती हो पर इसके कई वैज्ञानिक कारण भी हैं।

मंदिर की संरचना

हमारे शास्त्र और विज्ञान इस विषय पर एक राय रखते हैं। दरअसल मंदिर जाने से आपके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जिससे हमारी पांचों इंद्रियां जागृत होती हैं। ऐसा इस वजह से होता है क्योंकि कोई भी मंदिर हमेशा उत्तरी छोर पर बनाया जाता है, जहां से चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह सबसे अधिक होता है। इससे लोगों के शरीर में अधिकतम सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

 

भगवान की मूर्ति

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अक्सर आपने ध्यान दिया होगा कि मंदिर में अराध्य देव की मूर्ति गर्भगृह या मध्य स्थान पर स्थापित की जाती है। शास्त्र में इस स्थान को सबसे अधिक ऊर्जावान बताया गया है। जिसके समीप जाने भर से आपके आस-पास से नकारात्मक शक्तियों का दुष्प्रभाव कम होता है। इसी कारण हमेशा पहले मूर्ति स्थापित की जाती है, उसके बाद ही मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है।

जूते खोलकर इसलिए जाते

दुनिया के हर मंदिर में प्रवेश करने के पहले जूते-चप्पल इसलिए खोलकर रखवा लिए जाते हैं क्योंकि ऐसे फर्श पर चलने से भी आपके अंदर चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह होता है। दरअसल मंदिर का निर्माण ही इस तरह से होता है कि यह इन तरंगों के सबसे बड़े स्रोत बन जाते हैं। इस कारण से नंगे पैर चलने से पैरों के माध्यम से हमारे शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है।

मंदिर में घंटा इसलिए टांगते

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हमेशा मंदिर में प्रवेश के पहले घंटा बजाकर घुसने के लिए कहा जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि ऐसा करने से पैदा होने वाली ध्वनि जो कुछ सेकंड के लिए गूंजती रहती है, उससे हमारे शरीर के हीलिंग सेंटर्स जागृत हो जाते हैं। जिससे हमें सकारात्मक महसूस होता है।

तो इसलिए लेते हैं आरती

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हमेशा आपने देखा होगा कि मंदिर में सुबह और शाम की आरती के बाद सभी मौजूद लोग जलते दिए या कपूर पर हाथ फेरते हुए उसे सिर से होते हुए पूरे चेहरे पर लगाते हैं। ऐसे हल्के गर्म हाथों से हमारी दृष्टि इंद्री सक्रिय होती है और हमें अच्छा महसूस होता है।

 

इसलिए करते हैं पुष्प अर्पित

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आप किसी भी मंदिर में जाएं वहां देवी-देवताओं का ताजे फूलों, धूप व अगरबत्ती आदि से श्रृंगार व पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा करने से मंदिर परिसर में सभी ओर फूलों व धूपबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू फैली रहती है। ऐसे वातावरण में श्वास लेने से हमारी इंद्रियों को आराम मिलता है और हम अच्छा महसूस करते हैं।

चरणामृत का होता अपना महत्व

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ईश्वर को भोग लगाए जाते चरणामृत को पांच चीजों से मिलाकर बनाया जाता है। इसमें दूध, घी, दही, गंगाजल और तुलसी के पत्ते होते हैं। जिसे भगवान को भोग लगाने के बाद श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है। शास्त्रों में इसे तांबे के पात्र में चांदी के चम्मच के साथ रखने की विधि बताई गई है। जिसके पीने से जीह्वा की इंद्रियां जागृत होती हैं।

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