Tue. Nov 13th, 2018

क्याें मनाया जाता है गाेवर्धन पूजा ?

२० अक्टूवर

 

हर साल कार्तिक माह की प्रतिपदा को मनाया जाने वाला गोर्वधन पूजा का उत्‍सव श्री कृष्‍ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों की रक्षा करने के महाकार्य की याद में मनाया जाता है। ये घटना द्वापर युग में घटित हुई थी। इसके साथ ही इसी पराक्रम के चलते श्री कृष्‍ण ने देवराज इंद्र के सर्वशक्‍तिमान और श्रेष्‍ठ होने के अहंकार को भी भंग किया था। इसलिए कहा जाता है कि गोवर्धन का उत्‍सव अंहकार से दूर रहने का संदेश देने वाला त्‍योहार भी है।

 

क्‍या है कथा

कहते हैं कि देवराज इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण ने एक लीला रची। जब उन्होंने देखा कि एक दिन सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे हैं तो उन्‍होंने यशोदा मां से पूछा कि आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं। इस पर माता यशोदा ने बताया कि सब देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। तो उन्‍होंने फिर पूजा कि इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं। माता ने बताया कि वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती और हमारी गायों को चारा मिलता है। तब श्री कृष्ण ने कहा ऐसा है तो सबको गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते। पूजा न करने पर इंद्र क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए। उनकी बात मान कर सभी ब्रजवासियों ने इंद्र के स्‍थान पर गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और प्रलय के समान मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब ब्रज के लोगों के कष्‍अ को देख कर कृष्‍ण ने विराट रूप धारण करके कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण दी। इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित और ज्‍यादा तेजी से जल बरसाने लगे। ऐसे में इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा वह पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा कि वे मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें। सात दिन तक लगातार वर्षा करने पर इंद्र को कृश्‍ण की शक्‍ति का अहसास हुआ और वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे जिन्‍होंने बताया कृष्‍ण भगवान विष्णु के साक्षात अंश और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं। यह सुनकर लज्जित इन्द्र ने मुरलीधर से क्षमा मांग कर उनकी पूजा कर उन्हें भोग लगाया। तब से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। साथ ही गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।

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