Mon. Nov 12th, 2018

खतरनाक राष्ट्रिय एकता से पीडितों को मुक्ति मिलनी चाहिए : कैलाश महतो


कैलाश महतो, पराशी | इंसान ही नहीं, सारे जीवजन्तु भी हलचल में आ जाते हैं, बौखला जाते हैं और कुछ प्राणी तो मानव से भी ज्यादा सचेत होकर खतरों का संकेत करने लगते हैं, जब पृथ्वी पर कोई प्राकृतिक अनहोनी होने बाली होती है । आखिर ऐसा क्यों होता है कि मानव से कम प्रतिष्ठा के आँके जाने बाले प्राणी भी पृथ्वी के प्राकृतिक या अप्राकृतिक व्यवधानों के इर्दगिर्द संदेशवाहक बन जाते है ? व्याकुल हो जाते हैं ? वास्तव में यह इसलिए होता है कि पृथ्वी को मानव से लेकर समस्त प्राणी अपना घरदेश मानते हैं । पृथ्वी किसी से कोई भेदभाव नहीं करती । अपने अपने योग्यता और प्राकृतिक क्षमताओं के अनुसार सारे जीवजन्तु प्रकृति को उपभोग करते हैं । प्रकृति के समानता के कारण ही प्रकृति एकता बन पाती है । प्रकृति में जितने भी अवयवें हैं, भूगोल हैं, वातावरण हैं, उन्हें प्रकृति अपना मानती है । इसिलिए प्राणियों के लिए यह पृथ्वी एक साझा राष्ट्र भी है । लोग इसे “हमारी पृथ्वी” कहते हैं ।
एक वृक्ष भी अपने किसी डाल से किसी प्रकार का विभेद नहीं करता । सारे डाल तथा टहनियों को समान रुप से शक्ति प्रदान करती है । इसिलिए अप्राकृतिक व्यवधानों के आलावा प्राकृतिक रुप से उसके सारे डाल, टहनियाँ और पत्ते समान रुप से फल, फूल तथा अन्य उपलब्धियाँ अनन्त कालों तक देते आ रहे होते हैं । राष्ट्र के जीवन में भी वही लागू होता है ।
शासकों को यह मान लेना चाहिए कि कोई भी शासक अनन्त काल के लिए विजयी नहीं हो सकता । उसकी भलाई इसी में है कि वे विजित लोगों को भी साथ में लेकर चलें । क्योंकि किसी राज्य या राष्ट्र पर विजय पाने से पहले वह राज्य या राष्ट्र भी उन विजित लोगों का रहा है, जिसका संस्कार, संस्कृति, उन्नति, भाषा, साहित्य आदि उनके हुआ करते थे । उसका वे संरक्षण चाहते हैं । विजित लोग यह चाहते हैं कि उसका अपना और दूसरों का भी अपना एक होकर एकाकार हो जाये । वही सामाजिक एकता, आर्थिक एकता, सास्स्कृतिक एकता तथा अवसरीय एकता का आधार बन सकता है । इन एकताओं के बिना कोई राष्ट्रिय एकता कायम नहीं हो सकता ।
नेपाल, जो अपने आप में राष्ट्र के रुप में प्रश्नित् है, में पूनः राष्ट्रिय एकता की बात छिड गयी है । जो किसी भी मायने में राष्ट्र होने का परिचय नहीं देता, वहाँ राष्ट्रिय एकता मनाने की बात कितना सार्थक हो सकता है ? राष्ट्र प्रेम से बनता है । धोखा, षडयन्त्र, दोहन और नश्लीय शासन सत्ता से नहीं । राष्ट्र अगर धोखा, दोहन और जातीय तथा साम्प्रदायिक विभेदों से ही बनता तो अंग्रेजों का राष्ट्रवाद आज भी जिन्दा होता । आज भी अंग्रेज को ही भारत, अमेरिका, फ्रान्स, फिजी, हंगकंग, अष्ट्रेलिया आदि अपना राष्ट्रपिता या राष्ट्र निर्माता मानते, क्योंकि अंग्रेजों ने उन तमाम आज के देशों में उस जमाने में रहे टुकडे टुकडे राज्य और भूमियों को जोडकर विशाल देश बनाये थे । लेकिन राष्ट्र बनाने का उनका एक ही मतलव था –सबको एक जगह लाकर लुटने और दोहन करने का । वैसे नेपाली इतिहासकारों के अनुसार ही नेपाल के डर जाने से उसके अनुरोध को स्वीकार कर अंग्रेजों ने नेपाल को बक्स दिया था । कभी किसी का गुलाम नहीं होने का दावा करने बाला नेपाल अपने आप में ढूंढे कि वह क्यों और किसके बदौलत वह दावा करने का हक रखता है ? उसको बकसने बाला क्या हो सकता है ? उत्तर वहीं से निकालना पडेगा ।
राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल को माने तो राज्य और नागरिक के बीच एक अनुवन्धित सम्झौता होता है । उस सम्झौते के अनुसार राज्यद्वारा निर्मित नियम कानुन को जनता द्वारा मानने, उसके नियम व आवश्यकता के अनुसार कर जमा करने तथा उसके निर्णयों को स्वीकार करने का काम होता है । बदले में राज्य को उसे संरक्षण देने, उसके जीवन और सम्पतियों को सुरक्षा देने, नागरिक सम्मान उपलब्ध कराने तथा समान अवसर और व्यवहार मुहैया कराने पडते हैं । इन्हीं अनुवन्धित सम्झौतों के आधार पर राज्य और नागरिक के बीच राष्ट्रियता कायम होती है जिसके बदौलत एक राष्ट्र का निर्माण होता है ।
लेखक तथा राजनीतिक विश्लेषक युग पाठक के अनुसार पृथ्वी नारायण शाह ने कोई एकीकरण नहीं की है । व्यतिगत रुप में सम्पन्न होने तथा अपने इख का बदला लेने हेतु उन्होंने अपने राज्य को केवल बिस्तार की थी, राज्य और नागरिकों की सम्पति लूटी थी, सैकडों राष्ट्रभतmों की हत्यायें की, हजारों की नाक, कान तथा ओठें काटी थी । उन्होंने समुदायों के बीच विभेद, नफरत, दोहन तथा वितृष्णा फैलायी थी । नष्लीय शासन पद्धति की शुरुवात की थी । उनके अनुसार राष्ट्रिय एकता तब होती है जब कोई शासक सुशासन करता है । राज्य में व्याप्त असमझदारियों के बीच विश्वसनीय समझदारी पैदा कर राष्ट्रिय एकता कायम की जाती है । राष्ट्र में सबों के इतिहास, भाषा, साहित्य, संस्कृति, परम्परा, सोंच, जीवनशैली आदि का सम्मान तथा संरक्षण होता है ।
स्नेह सायमी ने तो पृथ्वीनारायण शाह के राष्ट्रिय एकता पर प्रश्न ही खडा कर दी है । नेपाली इतिहासकारों के अनुसार ही पृथ्वीनारायण शाह चन्द्रागिरी पहाड से नेपाल ‐कान्तिपुर) उपत्यका को पहली बार देख आकर्षित होकर नेपाल के राजा से मित्रता करते हैं । जिस मित्र के वहाँ रहकर शिक्षा हासिल करें, सभ्यता तथा विकास की ज्ञान सिखें, राजनीति की कला जानें, उसी मित्र से धोखाधडी करना, उनके नमक से ही छल करना और इन्द्र जात्रा के समय में छुपकर आक्रमण करना क्या कोई इमानदार और बलशाली योद्धा का कार्य हो सकता है ?
यूरोपियन इतिहासकारों को मानें तो काठमाण्डौ उपत्यका का दोहन और तवाही पृथ्वीनारायण शाह के पाले से ही शुरु हुआ जो आज पर्यन्त कायम है । काठमाण्डौ उपत्यका यूरोप के शहरों से भी सुन्दर व विकसित होने का जिक्र उनके इतिहासों में वर्णित है । सन् १७६८ से पहले जिस काठमाण्डौ का समस्त विकास अपने ही मेहनत, श्रम और लगानियों पर हुआ था, वह आज बाहरी श्रोतों से भी नहीं हो पा रहा है । वहाँ के नेवार, आदिवासी, जनजाति तथा अन्य समुदाय के लोग दिन प्रति दिन भूमिहीन, श्रमहीन, रोजगारविहीन होते जा रहे हैं, वहीं राज्य संचालक और उसके सहयोगी काठमाण्डौ को हडपते जा रहे हैं । वहाँ के मूल वासियों के पूराने घर खण्डहर होते जा रहे हैं, वहीं बाहर से काठमाण्डौ को लुटने पहुँचे शासको के गगनचुम्बी दरबारें खडे होते जा रहे हैं ।
नेपाल संवत कार्यक्रम के मंच पर राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल ने काठमाण्डौ, ललितपुर तथा भक्तपुर के मल्ल शासन के साथ ही नेवार, मधेशी तथा अन्य समुदायों के क्षयीकरण का विवरण इस प्रकार देते हैं ः
१. सन् १७६८–७० के बीच पृथ्वीनारायण शाह ने मल्लों का राजमुकुट तथा नेवारों की खड्ग हडप ली,
२. भीमसेन थापा ने जंगल कब्जा की,
३. राणाओं ने नेवार तथा मधेशियों की भूमि छिनी,
४. शाह ‐पंचायत) शासकों ने राज्य में रहे नेवारों की कुटनैतिक, प्रशासनिक, शिक्षा, संस्कृति तथा सरकारी नौकरियाँ छीन ली,
५. प्रजातान्त्रिक व्यवस्था ने नेवारों का व्यापार हडप ली, और
६. गणतान्त्रिक नेपाल ने नेवार लगायत समस्त संघर्षशिल समुदायों का संघर्ष करने के उत्साहों को कमजोर कर दी ।
जिस देश के शासकों को मधेश लगायत नेपाल के अन्य समुदाय नोट, भोट, गास, आवास तथा विश्वास उपलब्ध कराकर पालता रहा है, उन्हीं समुदायों से राज्य तथा राजकीय जीवन पद्धति अछुत सा व्यवहार करती आ रही है । जहाँ के शासन पद्धति में नश्लीयता हो, प्रशासन में विभेद हो, राज्य के चरित्र में छल हो, गिरफ्तारी नीति में फरकपना हो, श्रम की मूल्यांकन में दोहन हो, जहाँ की न्याय प्रणाली में संकुचपन हो, कुटनीतिक निकाय में दुर्भावना हो, किसी के भाषा, संस्कृति तथा परम्परा से राज्य का ऐंठनपूर्ण नफरत हो, वहाँ राष्ट्रिय एकता की बात एक छलपूर्ण अपराध ही हो सकता है, और ऐसे खतरनाक राष्ट्रिय एकता से पीडितों को मुक्ति हर हाल में मिलनी चाहिए ।

 

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