Tue. Sep 25th, 2018

गठबंधन की राजनीति के अर्थ अनर्थ : कुमार सच्चिदानन्द

कुमार सच्चिदानन्द
एक बार फिर फिजा में चुनावों का रंग घुलने लगा है और देश संसदीय तथा प्रादेशिक चुनाव की दहलीज पर खड़ा है । यह चुनाव अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण है क्योंकि जनान्दोलन–२ के बाद अब तक जो चुनाव हुए हैं, वे संविधानसभा के चुनाव थे और निकट अतीत में हमने स्थानीय चुनावों को देखा । नए संविधान के जारी होने के बाद पहली बार यह संसदीय चुनाव है और देश में प्रादेशिक चुनाव का भी यह पहला अवसर है । यह सच है कि राजनीति का केन्द्र सत्ता होती है और समस्त राजनैतिक क्रिया–कलाप इसी को केन्द्र में रखकर किए जाते हैं । इसलिए इससे पहले के चुनाव भी इन्हीं राजनैतिक मानदण्डों पर सम्पन्न हुए । लेकिन इस बार की राजनैतिक परिस्थितियाँ अलग हैं । यह चुनाव एक तरह से वाम शक्तियों के महागठबंधन के संत्रास की छाया में लड़ा जा रहा है तथा पारंपरिक लोकतांत्रिक शक्तियाँ जो नेपाल की राजनीति के नेतृत्व को अपनी विरासत मान बैठी थी वह एक तरह से इस चुनाव में रक्षात्मक मुद्रा में है और उसके द्वारा किया गया गठबंधन भी इसी का नतीजा है ।
यह सच है कि राजनीति का चरम लक्ष्य सत्ता होती है । लेकिन देश का राजनैतिक अतीत गवाह है कि अतीत की संसदीय व्यवस्था नेपाल को राजनैतिक स्थिरता नहीं दे सकी । ताश के पत्तों की तरह सरकारे यहाँ बनती और बिखरती रहीं । इसका खामियाजा यह निकला कि सामान्य रूप से सत्ता को पूर्णकाल तक भोगने का अवसर न तो किसी दल को मिला और न ही किसी नेता को । यही कारण रहा कि उनकी महत्वाकांक्षाएँ अतृप्त रहीं । इसी अतृप्ति को तृप्ति में बदलने के लिए कभी उन्होंने विपरीत विचारधारा और विपरीत धु्रवों से गठबंधन किया तो कभी समयबद्ध नेतृत्व का फर्मूला विकसित कर इसे भद्र सहमति कहा तथा कभी सर्वदलीय सरकार की अवधारणा को सामने लाया । इस परिस्थिति और परंपरा को आगे भी जाने की संभावना तो थी ही । क्योंकि नेपाल के वर्तमान संविधान ने जो व्यवस्था दी है और इसमें समानुपाती सांसदों के चयन की जो प्रक्रिया है उसे देखते हुए स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता था कि पहले की राजनैतिक परिस्थिति में आगामी चुनावों में भी किसी भी दल को बहुमत होने की संभावना नहीं । इसलिए महागठबंधन की अवधारणा को सामने लाया गया और इसे कार्यरूप भी दिया गया । इसलिए एक ओर इसे हताशा की मनःस्थिति से निकला हुआ महागठबंधन माना जा सकता है तथा दूसरी ओर स्थिरता की तलाश का प्रयास भी ।
एक बात तो सच है कि इस देश में लोकतंत्र की स्थापना और पुनस्र्थापना के बाद नेपाली काँग्रेस की नेतृत्वदायी भूमिका रही है । एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि अधिकांश समय सत्ता का नेतृत्व इसने ही किया है । इसलिए नेपाली राजनीति में अपनी सर्वोपरिता के भ्रमवोध से यह दल पीडि़त है । इसलिए नीतियों के स्तर पर ही लोककल्याण्कारी कार्यों से इसकी दूरी बढ़ती गयी और एक तरह से आम लोगों की भावनाओं को न समझने का गुनाह ये जाने–अनजाने करते रहे । परिणाम स्वाभाविक है कि ऐसा राजनैतिक चिंतन लोकतंत्र में बहुत दूर तक प्रभावी नहीं होता । आज मधेश की समस्या जिस रूप में है और पहाड़ में जिस ढंग से नेपाली काँग्रेस के समर्थकों की कमी देखी गई है, इसके आधार पर तो कहा ही जा सकता है कि न तो इसके प्रथम पंक्ति के नेता जनता की विश्वसनीयता प्राप्त कर सके हैं और न ही निकट अतीत में सत्ता में रहते हुए उन्होंने कोई ऐसा महान काम किया जिससे जनता उनका जयगान करे । एक तरह से नेतृत्व का जो करिश्माई गुण है उससे इसके नेता दूर होते गए और इसी खालीपन को भरने के लिए वामपंथी दलों ने महागठबंधन बनाकर सत्ता के इस घटक को निर्णायक चुनौती देने की कोशिश की हैै ।
एमाले के नेतृत्व में वाम दलों का जो महागठबंधन तैयार हुआ है, उसे काफी सशक्त माना जा रहा है । क्योंकि निश्चित रूप से इस महागठबंधन से वाममार्गी मतों का विभाजन रोका जा सकता है और इसकी संगठित शक्ति द्वारा पारंपरिक चुनावों के पारंपरिक परिणामों को उलट–पुलट करने का अनुमान लगाया जा रहा है । इस महागठबंधन से एक सकारात्मक बात तो यह हुई कि नेपाल की राजनीति, जो अब तक अस्थिरता के अभिशाप से त्रस्त थी, यह वाम गठबंधन और इसका प्रत्युत्तर देने के लिए बना दूसरा गठबंधन इसी का परिणाम है । इस गठबंधन का स्वरूप चुनाव के बाद भी कमोवेश अगर यही रहा तो नेपाल में बहुमत की पूर्णकालिक सरकार की अवधारणा साकार हो सकती है । लेकिन हमारा जो अब तक का राजनैतिक चरित्र रहा है उसमें सत्ता का बन्दरबाँट करने का इतिहास हमारे सामने रहा है । लेकिन किसी का लम्बे समय तक महत्व या स्वामित्व को स्वीकार कर रहना हमारी राजनैतिक परंपरा नहीं है । इस आरोप से किसी भी गठबंधन को बरी नहीं किया जा सकता । इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता है कि यह महागठबंधन टूट या बिखर ही जाएगा लेकिन इनके टूटने और बिखरने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता ।
अब सवाल उठता है कि इस महागठबंधन की जमीन क्या है ? निश्चित ही एमाले देश में दूसरा राजनैतिक दल बन कर उभर रहा है । यह अलग बात है कि कभी–कभी वह देश का पहला राजनैतिक दल भी बना । लेकिन सत्ता से उसकी दूरी बरकरार रही । यद्यपि कई बार उसे सरकार का नेतृत्व करने का अवसर भी मिला । लेकिन पूर्ण बहुमत के अभाव में कभी सरकार गिरी और कभी गिरा दी गई । अतीत के इन घटनाक्रमों से न केवल एमाले बल्कि नेपाल में सक्रिय समस्त वाममार्गी दलों में हीनता की एक ग्रंथि विकसित हुई कि वाम दलों के मत विभाजन के कारण पूर्ण बहुमत की स्थिति उनकी नहीं बन पाती और सहयोग जिन दलों से लिया जाता है या तो वे कभी दलगत हित से प्रभावित होकर तो कभी अन्तर्राष्ट्रीय शक्यिों का शिकार बन कर समर्थन वापस ले लेते हैं और उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ता है । इसी तथ्य की जमीन पर खड़ा होकर एमाले ने वाम दलों के गठबंधन की जमीन तैयार की और शेष दल इसकी ओर आकर्षित हुए । वस्तुतः इन सारे दलों ने इस बात को भी समझा कि नेपाल में अगर उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को सम्पोषित करना है तो इसके लिए सत्ता चाहिए और इसके बिना नारों के आधार पर वे बहुत दिनों तक अपने कार्यकर्ताओं को बाँधकर नहीं रख सकते । इन तथ्यों ने भी उन्हें महागठबंधन की ओर आकर्षित किया ।
एक बात तो सच है कि जनता भावनाओं की नदी में बहुत दिनों तक नहीं बहती । नेकपा माओवादी के अध्यक्ष के रूप में प्रचण्ड ने आमलोगों को सपनों के जो सब्जबाग दिखाए उसका भ्रम भी टूट गया और उन्होंने एक तरह से देख लिया कि नेपाल की राजनीति में उनकी नेतृत्वदायी भूमिका समाप्त हो गई है । इसलिए सम्मानजनक राजनैतिक अवस्था में आने के लिए उन्हें किसी सहारा की जरूरत है । इसलिए एमाले ने गठबंधन की जो जमीन तैयार की, उस पर आना उनकी राजनैतिक मजबूरी सी बन गई थी । शेष वाम दलों का भी लगभग यही मनोविज्ञान था । दूसरी ओर नेकपा एमाले के अध्यक्ष के रूप में पूर्वप्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने राष्ट्रवाद का जो नारा दिया, उसकी सफलता का संकेत विगत स्थानीय चुनावों में देखने को मिला । लेकिन चतुर राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने समझा कि राष्ट्रवाद का यह फार्मूला भी आगामी चुनावों में उन्हें बहुमत के जादुई आँकड़े तक ले जाने में सक्षम नहीं है । फिर उन्हें यह भी भय था कि राष्ट्रवाद जैसा मुद्दा तो सिर्फ उनका है और यह मुद्दा तब तक जीवित है जब तक मधेश की माँगों का संबोधन नहीं हो जाता । उन्हें इस बात की पूरी आशंका थी कि पीछे की राजनैतिक अवस्था में अगर चुनाव होता तो ऐसी स्थिति बन सकती थी कि उन्हें छोड़कर दो तिहाई का आँकड़ा अगर आगामी संसद ले लेता है तो राष्ट्रवाद के इस बैलून से सारी हवा निकल जाएगी । इसलिए अपने मुद्दे को जिन्दा रखने के लिए भी इस गठबंधन की अवधारणा साकार हुई ।
इस महागठबंधन का आकलन भूराजनैतिक परिदृश्य के संदर्भ में भी किया जाता है । स्पष्ट है कि एशिया में दो शक्ति राष्ट्रों का वजूद माना जाता है । स्पष्ट है कि ये दो शक्ति राष्ट्र भारत और चीन हैं और दोनों नेपाल के निकटतम पड़ोसी हैं । भारत का प्रभाव नेपाल की आन्तरिक राजनीति पर अधिक गहरा रहा है और भारतीय कूटनीति पर नेपाल के द्वारा ‘ माइक्रो मेनेजमेण्ट’ का भी आरोप लगता रहा है । भारत और चीन की स्थिति यह है कि दोनों में युद्ध की अवस्था तो नहीं मगर शीतयुद्ध की अवस्था से इंकार भी नहीं किया जा सकता । नेपाल में दोनों के आर्थिक और कूटनैतिक हित भी टकराते हैं । स्पष्ट है कि यहाँ के राजनैतिक दलों पर भी इन देशों का प्रभाव है । कुछ दल भारत से अपनी वैचारिक निकटता मानते हैं तो कुछ चीन से । निश्चित रूप से नेपाल के वामपंथी राजनैतिक दल चीन के अधिक करीब स्वयं को मानते हैं । पिछले दिनों कभी प्रचण्ड ने तो कभी ओली ने राष्ट्रवाद के नाम पर भारत के विरुद्ध जहर उगला है । फिर प्रधानमंत्री के रूप में केपी शर्मा ओली ने भारत से पारगमन और व्यापार संधि के विकल्प के रूप में चीन से कई समझौते भी किये जिसे कार्यान्वित करना अभी शेष है । इसलिए गठबंधन के द्वारा समस्त वाम दलों को संगठित कर एक निर्णायक राजनीतिक जमीन की तलाश नेकपा एमाले द्वारा की गई और अपने वजूद की रक्षा के लिए माओवादी केन्द्र तथा अन्य वामदल इसकी छतरी के अन्दर आए ।
वामपंथी दलों के इस ध्रुवीकरण को देखते हुए नेपाली काँग्रेस भी विचारधारा के आधार पर निकटवर्ती दलों से गठबंधन कर चुनावी मैदान में है । निश्चित है कि ध्रुवीकरण का लाभ तो इसे मिलेगा । लेकिन इन चुनावों में द्विदलीय महागठबंधन का राजनैतिक स्वरूप सामने आया हे उसे देखते हए सत्ता के कितना करीब यह दल पहुँचता है, यह कहना निश्चित रूप से कठिन होगा । लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि सारे अभ्यासों का अर्थ यही है । तीसरी स्थिति यह है कि दो नंबर प्रदेश में मधेशी दलों ने भी एक चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया । इसके साथ ही इन्होंने नेपाली काँग्रेस जैसे दलों से भी कुछ सीटों पर तालमेल किया है । इसका लाभ इन्हें भी मिलेगा लेकिन सत्ता के गठबंधन में इनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी यह तो समय ही बतलाएगा । इसके बावजूद यह कयास लगाया जा रहा है कि काँग्रेसी गठबंधन के लिए स्थिति अत्यन्त चुनौतीपूर्ण है और इससे भी बड़ी चुनौती है कि इन चुनावों के परिणामों के बाद विजय या पराजय दोनों ही स्थितियों में इस गठबंधन को बचाकर रखना क्योंकि गठबंधन चाहे किसी भी राजनैतिक दलों का क्यों न हो मगर इसे छुटभैयों का समूह कहा ही जा सकता है । क्योंकि इनका जो राजनैतिक चरित्र रहा है उसे देखते हुए इनके कभी भी और कहीं भी जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता ।
यद्यपि चुनावों का यह मनोविज्ञान होता है कि हर दल अपनी पूरी ताकत से लड़ता है और अन्तिम परिणाम नहीं आ जाने तक वह जीत का दावा करता है । इसलिए महागठबंधन की राजनैतिक पार्टियाँ अगर ऐसा करती है तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता है । यह समय का तकाजा भी है लेकिन यह चुनाव एक तरह के भय और अतिउत्साह के साथ लड़ा जा रहा है । वामगठबंधन जहाँ अत्यधिक उत्साह के साथ चुनाव मैदान में है और नेपाली काँग्रेस के खेमे में थोड़ी निराशा का आलम है । क्योंकि अब तक नेपाल की राजनीति का पारंपरिक नेतृत्वकर्ता सत्ता को अपनी विरासत मानता था । यह अलग बात है कि इस दौड़ से गुजरते हुए उसे कभी–कभी पराजय भी मिली । लेकिन वाम शक्तियों के ध्रवीकरण के बाद उनका निराशा–भाव अधिक गहराने लगा है । आज विजय या पराजय से भी गहरा सवाल यह है कि ऐसी अवस्था आयी क्यों ? क्यों उसका आधार इतना कमजोर हुआ जहाँ से चुनावों से पूर्व ही उनका निराशा भाव गहराने लगा है ?
एक बात तो निश्चित है कि सत्ता में अधिक दिनों तक रहने और सशक्त विपक्ष नहीं होने पर दलों में स्वेच्छाचारिता का भाव गहराता है और जनाकांक्षा उपेक्षित होती जाती है । आज नेपाली काँग्रेस का यही त्रास है, दूसरी ओर वाम दलों में अधूरी आकांक्षाओं को कार्यान्वित करने की जज्बात है । लेकिन यह जज्बात इतना गहरा है कि इसे अधिनायकवाद के खतरे के रूप में भी प्रचारित किया जाता है । इसके बावजूद इसे एक चुनावी स्टंट ही माना जाना चाहिए । यह बात तो स्वीकार करनी ही चाहिए कि नेपाल के वाम दलों ने लोकतंत्र की चासनी पी ली है, इसलिए इसकी मिठास से दूर जाने का खतरा वे मोल नहीं लेंगे । हाँ अगर उन्हें चुनौती देना है तो नीतियों और कार्यक्रमों की बदौलत ही दी जानी चाहिए ।

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