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गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीयता की उत्तम परिभाषा निकालना जरूरी है : अजयकुमार झा

अजय कुमार झा, जलेश्वर | भारत वर्ष का वह दिव्य भूखण्ड जो ब्रिटिस साम्राज्य के आगे न झुका और न गुलामी को स्वीकारा।आज भी वह हिमालय की भाँती अपनी गौरव गाथा लिए विश्व मंच पर प्रतिष्ठित नेपाल के नाम से प्रसिद्ध है। नेपाल में विक्रम संवत २०४६ साल के आन्दोलन के पश्चात संवैधानिक राजतन्त्र की नीति तहत राजा के आधिकार को थोड़ा ही सही पर सिमित कर दिया गया। जो गणतंत्र का पहला कदम माना जाएगा। लेकिन इसके पश्चात भी राजसंस्था एक महत्त्वपूर्ण तथा अस्पष्ट परिधि एवं शक्ति सम्पन्न संस्था के रूप में प्रस्तुत होता रहा। इस व्यवस्था में पहले संसदीय अनिश्चितता तथा सन् १९९६ से ने.क.पा.(माओवादी) के जनयुद्ध के कारण से राष्ट्रिय अनिश्चितता दिखने लगा। नेताओं की राजनैतिक धारणा द्विविधाग्रस्त थी। कांग्रेस के बहुमत से बने प्रधान मंत्री ने व्यक्तिगत अहंकार और राजनैतिक अदुर्दार्शिता के अपने ही सरकार को नष्ट कर डाला। परिणाम में त्रिशंकु सरकार का बनना जारी रहा।नेता खुद को बेचने में गौरवान्वित महशुस करने लगे। विकास के नाम पर लुट तंत्र का महाजाल फैलने लगा। जनता निरास होने लगे।भीषण दरवार हत्या काण्ड हुआ।नेपाल के जनता और नेता एक भावी अदृश्य दुर्घटनाओं की आशंका से सशंकित होने लगे। सभी पार्टी और नेता अपनी चारित्रिक हैशियत और राजनीतिक प्रतिष्ठा खोने लगे थे। भ्रष्टाचारी और बाहुबली ही राजनीति के मौलिक परिभाषा हो गई।
इसी बीच माओवादिओं ने राजनीति के मूलाधार से हटकर भूमिगत रूप से राजतन्त्र तथा एमाले कांग्रेस राजनैतिक दलों के विरुद्ध में गुरिल्ला युद्ध संचालन कर दिया। उन्होंने नेपाल की सामन्ती व्यवस्था (उन के अनुसार इसमें राजतन्त्र भी शामिल है) को हटाकर एक माओवादी राष्ट्र स्थापना करने का प्रण किया। इसी कारण से नेपाल में गृहयुद्ध शुरु हो गया जिसके कारण १३,००० लोगों की जान गई। इसी विद्रोह को दमन करने की पृष्ठभूमि में राजा ज्ञानेन्द्र ने सन् २००२ में संसद को विघटन तथा निर्वाचित प्रधानमन्त्री शेर बहादुर देउवा को अपदस्थ कर सम्पूर्ण राजकीय कार्यभार अपने हाथों लेकर डा तुलसी गिरी और किर्तिनिधि विष्ट जो क्रमशः भारत और चीन के साथसाथ राज संस्था के हितैषी माने जाते थे उन्हें प्रधानमन्त्री मनोनित कर के शासन चलाने लगे। सन् २००६ के लोकतान्त्रिक आन्दोलन(जनाअन्दोलन-२) के पश्चात राजा ने देश की सार्वभौम सत्ता जनता को हस्तान्तरित की तथा २४ अप्रैल २००६ को संसद की पुनर्स्थापना हुई। १८ मई २००६ को अपनी पुनर्स्थापित सार्वभौमिकता का उपयोग करके नए प्रतिनिधि सभा ने राजा के अधिकार में कटौती कर दी तथा नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। नवनिर्वाचित संविधान निर्माण करने वाली संविधान सभा की पहली बैठक द्वारा २८ मई २००८ में नेपाल को आधिकारिक रूप में एक सन्घीय गणतन्त्रात्मक राष्ट्र घोषित किया गया।
संविधान में बहुत अनूठी और अद्भुत व्याख्या है हमारे इस गौरवशाली गणतंत्र की। यूरोप के कई देश जैसे इंग्लैंड, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड उधर सुदूर पूर्व में मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड,जापान आदि प्रजातान्त्रिक (डेमोक्रेटिक) देश तो हैं परन्तु गणतांत्रिक (रिपब्लिकन) नहीं। इधर रूस, चीन, क्यूबा, उत्तरी कोरिया जैसे कई देश हैं जो गणतांत्रिक तो हैं पर प्रजातान्त्रिक नहीं हैं। कितने गौरव की बात है कि हम उस देश के नागरिक हैं जो गणतांत्रिक भी है और प्रजातांत्रिक भी। राजतन्त्र या राजशाही में सम्राट देश का शासक और शासन व्यवस्था का अधिनायक होता है। साधारणतः सम्राट का पुत्र या शाही परिवार का कोई सदस्य ही अगला सम्राट होता है। खाड़ी के अधिकांश देशों में यही व्यवस्था लागू है। परन्तु कई राष्ट्रों में ऐसी राजशाही भी है जो केवल प्रतीकात्मक है और एक परम्परा को बनाये रखने का भाग हैं। इन देशों के सम्राट या साम्राज्ञी राष्ट्र के सर्वोच्च पद को केवल अलंकृत करते हैं परन्तु इनके अधिकार बहुत सीमित होते हैं। ऐसी ही राजशाही यूरोप एवं सुदूर पूर्व के उक्त वर्णित देशों में हैं इसलिए वे गणतांत्रिक देशों की श्रेणी में नहीं गिने जाते क्योंकि राजशाही को गणतंत्र नहीं माना जाता। गणतंत्र में सर्वोच्च पद उत्तराधिकार से नहीं अपितु जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होता है। उदाहरणार्थ भारत और अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित किये जाते हैं।

गणतंत्र में संविधान सर्वोच्च होता है और प्रजातंत्र में जनता। गणतंत्र में विधि का विधान यानि कानून का राज्य होता है तो प्रजातंत्र में बहुमत का। जिसके पास बहुमत वही शासक। रूस और चीन जैसे देशों में संविधान सर्वोपरि है किन्तु वे एकल पार्टी द्वारा शासित राज्य हैं अतः वे गणतंत्र तो हैं किन्तु प्रजातंत्र नहीं। गणतंत्र में निर्वाचित सरकार के अधिकार संविधान की सीमाओं में बंधे हैं। नागरिकों की स्वीकृति से संविधान को अपनाया जाता है और इसे केवल जनता के प्रतिनिधियों द्वारा विभिन्न नियमों के तहत संशोधित किया जा सकता है। संविधान के तीन प्रमुख अंग हैं कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका और इन तीनो ही अंगों को शक्ति संविधान देता है। ये तीनों विभाग एक दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं तथा एक दूसरे के कार्यों या शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं करते।बल्कि सहयोग कर राष्ट्र को गति प्रदान करते हैं। यह तो रहा सैद्धांतिक पक्ष। अब ज़रा व्यवहारिक पक्ष की ओर ध्यान दें। सर्व प्रथम यह जानना आवश्यक है की यह गणतंत्र आखिर है किस के लिए। क्या माओवादी के संरक्षण के लिए है ? या की खस आर्य के शासन सुरक्षा और भौतिक संवर्धन के लिए है ? हिन्दू सनातन धर्म का दोहन और पाश्चात्य क्रिस्चियन का पोषण के लिए है ? बहुमत मधेसी जनजाति का शोषण और अल्पमत खस आर्य के पोषण के लिए है ? क्या माओवादी के द्वारा नेपाली नाग्रिकों को न्याय मिला ? जिसके परिवार को मौत के घाट उतार दिया गया था ; क्या उसे न्याय और सम्मान मिला?
टूटे फूटे वर्तन भी जिन्हें खाने के लिए नसीव नहीं था उन नेताओं को स्वर्ण पात्र अवश्य मिला है। नंगे पाँव चलने बाले आज पजेरो और हावाई जहाज पे चलते हैं। जंगली गुफाओं में सोने वाले आज दरावारों में शयन करते हैं। पैसा कमाने हेतु नेपाली बेटियों को विदेस में भेज कर अपने को गौरवान्वित महसूस करने वालों को राष्ट्र के इज्जत का कितना ख्याल होगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है। भूचाल के कारण घरवार बिहीन हुए लोग आज भी खुले आकास निचे जीवन बिताने को बाध्य हैं। क्या यही गणतंत्र की गरिमा है ? आधारभूत और नितान्त मानवीय अधिकार के लिए सैकड़ो मधेसी को सीधे माथे पे गोली मार हत्या करना क्या गणतंत्र की परिभाषा में पड़ता है। शासक वर्ग खुद अपने को आरक्षण में रखना और दलित पीड़ित शोषित गरीव असहायों को भ्रम में रखना क्या यही नेपाली राष्ट्रीयता का प्रतिक है ?
वहस गणतंत्र पे करनी है तो इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ख़ासकर नेपाल और मधेसी मुद्दा के सन्दर्भ में। प्रत्येक नियम का अपव्याख्या कर मधेसियों को विकास और अधिकार दोनों से वंचित रखकर कोई भी शाषक और शाषण पद्धति दीर्घजीबी नहीं हो सकता। जब राणाओ को भगाया जा सकता है ! राजाओं को मिटाया जा सकता है! माओवादियो को गलाया जा सकता है ! तो मुठ्ठीभर क्रूर खस शाषक को भी सदा के लिए निर्वासित किया जा सकता है।
याद रहे ! नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र है। यहाँ जनता और संविधान दोनों एक दुसरे के परिपूरक है। पार्टी और नेता अधिकार संवाहक से जादा नहीं है। अतः अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक ; संविधान में दोनों का हक़ बराबर है। फिर मधेसियों और जनजातियों के साथ भेदभाव करने का अधिकार नेता को किसने दिया ? यदि बन्दुक के पर्याय के रूप में गणतंत्र को लिया गया है। तब तो सर्वनास सुनिश्चित है। मोदी के जनकपुर में बृहद नागरिक सम्मान से पहाडियों में उठे क्षोभ कुछ संकेत भी करता है। षडयंत्र, सेना तथा मुठ्ठीभर पार्टी कायकर्ता के बलपर जबरदस्ती संविधान घोषणा करना गणतंत्र का द्योतक नहीं gun tantra का द्योतक है। क्या दुर्भाग्य है की गणतांत्रिक संविधान लागू होने से पहले ही बाध्य होकर दो दो बार संशोधन करना पड़ा। तीसरी बार के लिए बचनबद्धता हो चूका है। नेपाल के सभी विद्वान् एक श्वर में चिल्ला रहे थे कि विश्व में एसा संविधान नहीं है। तो फिर संशोधन क्यों हुआ ? यह प्रमाणित करता है की नेपाल बौद्धिक रुपमे मरुभूमि है। वैसे भी बिरबहादुर का अर्थ भैसा ही होता है। जो बुद्धि के अभाव में सरीर से लड़ता है। अशिक्षित जनता को गणतंत्र का वोध होना भी कठिन है। पार्टी के ह्विप के आगे जब मधेस के शिक्षित नेता कार्यकर्ता नतमस्तक हो जाते हैं। तो आम नागरिक का हैशियत ही क्या हो सकता है ? अतः नेपाल में गणतंत्र को सम्मानित और सर्जनहिताय बनाने के लिए सभी पार्टी के कार्यकर्ता को जातीयता, क्षेत्रीयता और अपने पराए के क्षुद्र भाव से ऊपर उठकर एक बृहद राष्ट्रीयता का भाव लेकर आगे बढ़ना होगा। तब नेपाल के गणतंत्र को गति मिल पाएगा। अन्यथा दुर्गति ही नहीं अपांग होने से कोई नहीं रोक सकेगा।
देस के नागरिक से झूठ बोलकर जनता को झाँसा और अन्धकार में रखकर सत्ता में बने रहने की कुकर्म में लिप्त नेताओं से समाज, राष्ट्र और संस्कृति के ऊपर ही खतरा है। विकास पथ के अवरोधक कदापि देसभक्त नहीं हो सकता। किसी ख़ास वर्ग को अधिकार से वन्चित रखना आतंकवादी चरित्र का प्रमाण है। काम में ढिलाई और नैराश्यता दिखाना राष्ट्रघात है। मानव अधिकार हनन करना गृहयुद्ध को निमंत्रण देना है। अतः जब जनता सर्वोपरी है और संविधान सर्वशक्ति संपन्न है। कानून का राज है। फिर हत्यारा नेता खुलेआम सर्वोच्च के फैसला के विरुद्ध घूमना किस कानूनी राज का प्रमाण है ? एक घंटा के काम के लिए महीनो कार्यालय में दौड़ने को वाध्य करना किस लोकतांत्रिक संस्कार का प्रतिक है ? इन सभी मुद्दों पर इस गणतंत्र दिवस पर खुलकर वहस होना आवश्यक है। राष्ट्रीयता का उत्तम परिभाषा निकालना आवश्यक है। मानव अधिकार का शुक्ष्म विश्लेषण होना आवश्यक है। शैक्षिक गुणवत्ता के बारे मे वैज्ञानिक सोच पैदा करना आवश्यक है। सरकार और सरकारी कर्मचारी के हर क्रियाकलाप का शुक्ष्मतम विश्लेषण, मूल्याङ्कन और दण्ड तथा सम्मान का प्रावधान होना आवश्यक है। एक भी नागरिक आत्म हत्या करता है तो उससे सम्वंधित सभी कर्मचारी समाजसेवी नेता मंत्री प्रहरी प्रशासन को जिम्मेवारी लेना पड़े यह सोच विक्सित होना आवश्यक है। जनता भूखे रहे, नंगा रहे, रोगी रहे यह वर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए। सम्बंधित व्यक्तियों से सीधा प्रश्न पूछा जाना चाहिए।
आज का दिन यही तथ्य समझने और समझाने का है कि हमारे देश में संविधान सर्वोपरि है न कि कोई व्यक्ति, वंश, समाज या समुदाय। हमें कानून का राज्य चाहिए नेताओं का नहीं। नेताओं की जय करने से पहले स्वयं की और संविधान की जय करना सीखना होगा। नेता हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, शासक नहीं। नेताओं का भविष्य जनता के हाथ में है, जनता का भविष्य नेताओं के हाथ में नहीं।

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