Wed. Oct 17th, 2018

गृहस्थी के बोझ तले; दबे रह गए, बाबू जी । । महँगाई का दर्द : सुरभि मिश्रा 

गृहस्थी के बोझ तले;

महँगाई का दर्द

खस्ता हालत;

सस्ता चप्पल;

कभी तो, नंगे पाँव चले;

चलते-चलते, थक जाते;

सुस्ताते, छतरी छाँव तले;

कंकड़-पत्थर, पथ दुष्कर पर;

आह ! न भरते, बाबू जी;

गृहस्थी के बोझ तले;

दब के रह गए, बाबू जी ।

तेज धूप, और खड़ी दोपहरी;

बाँध सके न, सर पर पगड़ी;

गृहस्थी के बोझ तले;

दबे रह गए, बाबू जी ।

दिन खींचते, रात बाँधते;

ग़म में राग, ख़ूब साधते;

हरे-भरे, बाहर से दिखते;

अन्दर आग, लिए  बाबू जी;

गृहस्थी के बोझ तले;

दब के रह गए, बाबू जी ।

साइकिल एक, पुरानी सी;

डुगडुग चलती, नानी सी;

लेकर चलते, बड़े शान से;

रानी कहते,  बाबू जी;

गृहस्थी के बोझ तले;

दब के रह गए, बाबू जी ।

अपने सपने, छोड़ हमारे;

सपने पूरे, करने को;

दौड़-भाग, करते रहते यूँ;

फ़र्ज़, कर्ज से भरने को;

ऐसे पिता, मिलें सभी को;

जैसे मेरे, बाबू जी;

गृहस्थी के, बोझ तले;

दब के रह गए, बाबू जी ।।

●●  सुरभि मिश्रा  ●●

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