Tue. Nov 13th, 2018

गोरखालैंड : पहचान का लम्बा सफर

इन दिनों भारत के दार्जिलिङ में फिर से बंगाल से अलग गोर्खाल्यैंड प्रान्त की माँग को लेकर आन्दोलन भड़क उठा है । नेपाली भाषियों की आबादी वाले मनोरम दार्जिलिङ और आसपास के कालिम्पोङ, खर्साङ, मिरिक और डुअर्स क्षेत्र अशान्त है । बीते मई माह में बंगाल की ममता बेनर्जी की नेतृत्ववाली तृणमूल कांग्रेस की प्रान्तीय सरकार ने राज्य के स्कूलों में बंगाली भाषा अनिवार्य करने का निर्णय किया था । प्रान्तीय सरकार का यह निर्णय ही जनअसंतोष का प्रमुख कारण बना । गोरखा जनमुक्ति मोरचा के नेतृत्व में कई जगहाें पर लोगों ने सड़क पर प्रदर्शन किया । पुलिस ने भीड़ पर काबु पाने के लिए गोलियां चलाईं, नतीजा कुछ लोगों की मौत भी हो गई । इस घटना के बाद लोगों में आक्रोश और बढ़ा । वैसे ममता बनर्जी सरकारी निर्णय पर अलग तरीके से सफाई देने की कोशिशें कर रहीं है फिर भी अब समस्या भाषा से आगे निकल कर गोरखालैंड प्रान्त की माग तक पहुंच चुकी है । हिंश्रक रूप में आगे बढ़ रहा आन्दोलन किस मोड़ पर जाकर विराम लेगा अभी कह पाना कठिन है । वैसे बंगाल की प्रान्तीय सरकार पहले ही नेपाली भाषी समुदाय के अन्दर की लेप्चा, राई, तामाङ और अन्य कुछ जातियों के नाम पर विकास बोर्ड गठन कर चुकी है । परन्तु इस कार्य को लेकर भी लोगों में संतोष के बदले आक्रोश है । बृहत नेपाली भाषी समुदाय में फूट डालकर गोरखालैंड के नाम पर प्राप्त होनेवाले राजनीतिक आन्दोलन को निश्तेज करने के लिए अपनाए गये प्रान्तीय सरकार के हथकंण्डे के रूप में लोगों ने इसे समझा है ।
गणतन्त्र नेपाल में आदिवासी जनजातियों ने पहचान के रूप में संस्कृति को प्राथमिकता दिया है । परन्तु वहां के लोग अपने आप को अपनी किसी छोटी जाति व समूह की अपेक्षा नेपाली भाषी अर्थात् गोरखा के रूप में पहचान स्थापित करने का प्रयास करते आ रहे हैं । भारत में शुरु में प्रान्तों का गठन भाषा के आधार पर किया गया था । इसके कारण भी भाषा के प्रति शुरु से ही यहां लगाव रहा है । नेपाली भाषा को आठवीं अनुसूूचि में शामिल करने का आन्दोलन भी अरसे तक चला है । सन् १९५६ में देहरादुन के आनन्दसिंह थापा ने तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति डा. राजेन्द्रप्रसाद के समक्ष इस माँग को लेकर एक मेमोरेण्डम पेश किया था । भारत में नेपालियों की सब से बड़ी आबादी होने के कारण भी उसका प्रभाव दार्जिलिङ क्षेत्र में पड़ना अस्वभाविक नहीं था । भाषा आन्दोलन कें कामयाब होने में दार्जिलिङ और सिक्कीम की विशेष महत्वपूर्ण भूमिका रही है । इसी आन्दोलन के बल पर सन् १९६१ में बनी सरकारी भाषा कानून, अनुच्छेद २ ए मुताबिक दार्जिलिङ, खस्र्याङ और कालिम्पोङ सबडिभिजनों में सरकारी कामकाज के लिए नेपाली भाषा को भी कागजी रूप में ही सही, वैधानिकता मिली । परन्तु इसपर अमल होने में तकरीबन आठ साल से भी अधिक समय लगा । भाषा आन्दोलन की दिशा में सफलता का यह पहला पडाव था । नेपाली साहित्य को आगे बढाने के लिए चार दशक पहले तक दार्जिलिङ नेपाल से भी आगे रहा है । दार्जिलिङ ने नेपाली साहित्य को धरणीधर कोईराला, पारसमणी प्रधान और सूर्यविक्रम ज्ञावली, इन्द्रबहादु राई, अगमसिंह गिरी जैसे कई अन्य व्यक्तित्व को दिया । नेपाली साहित्य और संगीत के क्षेत्र में आज भी दार्जिलिङ का अपना अलग स्थान है । नेपाली अथवा गोर्खा समूदाय के अन्दर की छोटी भाषाओं की अपेक्षा नेपाली को बतौर मातृभाषा के रूप में प्रयोग करनेवालों की तादाद यहां ज्यादा है । इसलिए नेपाली भाषा के प्रति लोगों में लगाव है । लम्बे प्रयास के बाद सन् १९९२ में आकर नेपाली भाषा को आठवीं अनुुसूची में समावेश कर लिया गया है ।
जातीयता और राष्ट्रीयता को लेकर भले ही लोगों में अपनी तरह की खयालात है परन्तु नेपाल में चल रही व्याख्याओं के मुताबिक नेपाल के नेपालियो के लिए नेपाली राष्ट्रीयता वह है जिसमें कई आदिवासी जनजाति आपस में अपनी पहचान को कायम रखते हुये समाहित हैं । भारत के नेपाली व गोरखा भारतीय राष्ट्रीयता में समाहित एक अल्पसंख्यक समुदाय है जो खुद को अपनी पहचान के लिए स्वयं को संघर्षरत बताता आ रहा है ।
इतिहास में पहले कभी भी दार्जिलिङ का भूभाग बंगाल में नहीं रहा । सन् १८६६ में सिक्कीम से लेकर दार्जिलिङ, खरसाङ, कालिम्पोङ और कुछ मैदानी हिस्से को मिला कर अंग्रेजों ने पहली बार जिले का दरजा दिया था । सन् १९०५ तक इसे राजशाही विभाग में रखा गया था । बाद में १९१२ तक इस भूभाग को भागलपुर के तहत रखा गया । उसके बाद यह भूखण्ड फिर से राजशाही के हवाले कर दिया गया । भारत के अन्दर नेपाली बोलने वालों के लिए एक अलग प्रान्त की मांग अंग्रेजो के समय से ही विभिन्न रूप में चलता आ रहा है । सन् १९१७ में हिलमेन एशोसिएसन की ओर से रायसाहेब हरिप्रसाद प्रधान ने अंग्रेज सरकार को दिये एक मेमोरेन्डम में लिखा कि नेपाल से पूर्व असम तक फैले हिमालय की तलहटी की भूभाग को लेकर उत्तरपूर्वी सीमान्त प्रान्त नामक एक अलग प्रसाशनिक इकाई गठन की जाये । उन्होने इस इकाई से उत्तरी सिमा पर भारत की सूरक्षा और मजबुत होने का तर्क भी दिया है । सन् १९४५ मे गोरखा लीग, जो भारतीय नेपालियो का एक मात्र राजनीतिक संगठन था ने भी दार्जिलिङ और उस के आसपास के नेपाली बहुल क्षेत्र को आसाम के साथ मिला कर एक प्रान्त बनाने की माग की थी ।
भारत मे आजादी के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा । सन् १९४९ में भारतीय कम्युनिष्टों ने भी नेपाल और इस भूखण्ड को लेकर गोर्खास्तान बनाने की माग नेहरु के समक्ष की थी । उसी साल गोरखा लीग ने भीं उत्तराखण्ड के नाम पर इस क्षेत्र को अलग प्रान्त बनाने की माँग को आगे बढाया । सन् १९७९ में भी प्रान्त परिषद् नामक राजनीतिक पार्टी ने भी अलग राज्य की माँग को रखा । परन्तु इन सभी प्रयासों के बावजुद भी मसले पर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया । गोरखाल्याण्ड माँग पर तब नाटकीय मोड़ आया जब सुवास घिसीङ ने गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोरचा का गठन किया और सन् १९८६ से आन्दोलन का ऐलान कर दिया । घिसिङ का आन्दोलन ऐसी परिस्थितियों में शुरु हुआ जब पुर्वोत्तर भारत में नेपाली भाषियो पर देखते ही पुलिस गैरकानुनी विदेशी के नाम पर गिरफ्तार कर रही थी । आसाम और मेघालय प्रान्तों में विदेशियो को खदेड़ने के लिए आन्दोलन चलाये जा रहे थे । जिसमे भारतीय नेपालियों को भी बख्शा नहीं जाता था । बंगाल के मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु ने सरे आम गोरखालैंड की माँग करनेवालों को नेपाल जाने की सलाह दी । प्रधानमंत्री मोरारजी देशाई ने नेपाली भाषा को विदेशी भाषा बताकर इस समूदाय के लोगों को निराश कर दिया था । घिसिङ ने दिल्ली और काठमाण्डो की सरकार को कईबार पत्र और तार भेजकर दार्जिलिङ और उससे बाहर रह रहे गोरखों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा कि दार्जिलिङवासी किस देश के नागरिक है । इसी गर्म परिस्थिति ने गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोरचा का आन्दोलन लोकप्रिय बना । आन्दोलन में ग्यारह सौ से अधिक लोगों की जानें चली गई । आखिरकार सन् १९८८ में केन्द्र सरकार, बंगाल प्रान्तीय सरकार और गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोरचा के बीच त्रिपक्षीय समझौता सम्पन्न हुआ । जिसके तहत अलग राज्य गोरखों को नहीं मिला परन्तु बंगाल के अन्दर ही एक स्वायत्त दार्जिलिङ गोरखा पार्वत्य परिषद् मिला । उसके बाद यह आन्दोलन कुछ समय प्रभावहीन सा हो गया । घिसिङ पर विश्वासघात का आरोप भी लगा । और उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट देखने को मिली । सन् २००७ में विमल गुरुङ ने गोरखा जनमुक्ति मोरचा का गठन किया । यह आन्दोलन भी कुछ समय के बाद बंगाल के अन्तरगत ही गोरखा टेरिटोरियल एडमिनीष्ट्रेशन पर जाकर समझौता हुआ । गुरुङ इस के चेयरमेन है । इस तरह वर्तमान में चल रहा आन्दोलन भी सही मुकाम पर पहुंच पायेगा इसमें लोगाें में अब भीे संदेह है । परन्तु इस समय एक ओर जनमुुक्ति मोर्चा पर आम लोंगों का दबाव है तो दूसरी ओर संभावित गोरखालैंड क्षेत्र के लगभग सभी स्थानीय राजनीतिक पार्टियां भी आन्दोलन के पक्ष में खडेÞ हो गए हैं ।ं
जानकारों का मानना है कि भारतीय सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण संस्थान पक्ष इस माग को पूरी करने में कतराता आ रहा है । सन् १९४६ में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने भी प्रधानमंत्री नेहरु को एक पत्र लिखकर उत्तर के लोगों की भारत के प्रति वफादारी पर शंका व्यक्त किया था । शायद यही मानसिकता अभी तक भी काम कर रही है । गोरखों ने भारत की सुरक्षा के क्षेत्र में जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है उसे देखते हुये सरदार पटेल की पुुरानी शंका अब तक कई बार स्वतः बेबुनियाद सिद्ध हो गया है । दिल्ली की सरकारें भी बंगाल की सरकार को इस मसले पर आगे रखती आयी है । विगत में कांग्रेस ने भी प्रान्तीय सरकार और आन्दोलन के बीच में खेलने की भरपूर कोशिशें की । अब भारतीय जनता पार्टी भी उसी पारम्परिक भूमिका में नजर आती है । दार्जिलिङ में अलग राज्य की माँग और आन्दोलन के तकरीवन सौ साल व्यतीत हो चुके है । इस बीच भारत में कई नये प्रान्तों को बनाया जा चुुका है । लम्बे समय तक इस संवेदनशील इलाके में असंतोष का रहना अब भारत के हित मे नहीं हो सकता ।
इस ओर नेपाल की तराई में आरोह अवरोह के साथ चल रहे मधेश आन्दोलन को लेकर सामाजिक संजाल से लेकर कई लोगों के बीच तरह तरह की टिप्पणियों का बाजार गर्म है । मधेश आन्दोलन को दिल्ली का विभिन्न तरीकों से किए गये समर्थन के खिलाफ जो जनमत नेपाल में बना है उसी खेमें से इस तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं । विगत में कुछ ताकतों ने गोरखालैंड आन्दोलन को कमजोर बनाने के लिए उसे नेपाल के साथ जोड़ने की बडी मशक्कत की थी । परन्तु यह दुष्प्रयास असफल रहा । नतीजा यही है कि लम्बे समय तक भी यह भारत की अन्दरुनी संघर्ष के रूप में चल ही रहा है । सवाल ठीक और बेठीक का नहीं है बल्कि भारत का गोरखालैंड और नेपाल का मधेश आन्दोलन दोनो पहचान की समस्याएं हैं इसलिए दोनों में इस बात पर समानता है ।
आन्दोलन के हिसाब से गोरखालैंड और मधेश आन्दोलन में तुलना हो ही नहीं सकता । मधेश आन्दोलन नेपाली राजनीति को निरन्तर प्रभावित करने में सक्षम है । उसे नजरअन्दाज करना सिंहदरबार के लिए नामुमकिन है । इसे संघीयता को नेपाल में स्थापित करने का यश प्राप्त है । जबकि गोरखाल्यैंड आन्दोलन पुराना होते हुये भी इन सब विशेषताओं को प्राप्त नहीं कर सका है ।

 

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