Tue. Oct 23rd, 2018

चुनावी गठबन्धन,प्रजातंत्र का विकृत नमूना पेश किया जा रहा है : श्वेता दीप्ति

यह गहन प्रश्न कैसे समझाएँ ?
दस बीस अधिक हों तो हम नाम गिनाएँ ।
पर, कदम कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाए घात खड़ा घातक है ।
– दिनकर

election-14-may-017

श्वेता दीप्ति , (सम्पादकीय, मई अंक ) | गठबन्धन की राजनीति जारी है, जिसका अजीबोगरीब नमूना स्थानीय चुनाव में देखने को मिल रहा है । पदलोलुपता इस कदर बढ गई है कि जहाँ न विचारों का सामंजस्य है और न ही नीतियों का, फिर भी दो विपरीत ध्रुवों पर चलने वाले दल एक दूसरे का हाथ थाम कर चुनाव का हिस्सा बन रहे हैं । प्रजातंत्र का विकृत नमूना पेश किया जा रहा है । ऐसे बेमेल गठबन्धन से भविष्य में होने वाले विकास की गति का भी अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है । देश में किसी भी निकाय का चुनाव हो, वह एक राष्ट्रीय त्योहार की तरह होता है जिसमें जनता उत्साह के साथ शामिल होती है, परन्तु देश की जनता में यह माहोल या भावना कहीं नहीं दिख रही है । फिलहाल यह उत्साह सिर्फ प्रतिनिधियों में है, मतदाता इसके प्रति उदासीन ही हैं । घोषणापत्र के लुभावने वाक्य के पीछे छिपी दास्तां इन्हें मालूम है, बावजूद इसके मतदाता न चाह कर भी इन्हें अपना बहुमूल्य मत देकर इन्हें चुनने को बाध्य होंगे और अपने क्षेत्र को इनके हाथों न जाने कितने सालों के लिए गिरवी भी रख देंगे ।

मुख्य तीन दलों के लिए मधेश की राजनीति में हुई परिवर्तन अप्रत्याशित थी, वहीं मधेशी जनता के लिए आशा और उम्मीद की किरण रौशन हुई है । सरकार अपनी कुर्सी बचाने के लिए और कई कमियों और कमजोरियों के बीच किसी भी तरह चुनाव सम्पन्न कराने के लिए प्रयासरत है । बीता महीना कई मायनों में महत्तवपूर्ण रहा और वह है, मधेश के छ दलों की एक मंच पर वापसी, प्रधानन्यायाधीश पर महाभियोग का लगना और फिर उनकी वापसी का फैसला, राप्रपा का इसी मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेने का निर्णय, गृहमंत्री का इस्तीफा और पुनर्वापसी, गच्छदार जी की दीर्धकालीन पद–प्राप्ति की संभावना के तहत अल्पकालीन पद को ग्रहणकर सत्ता में वापसी अर्थात् यह समय किसी ना किसी रूप में वापसी का रहा । देखा जाय तो कमोवेश देश की स्थिति ऐसी ही है कि जनता जानबूझकर मक्खी निगलने को तैयार है, आखिर करें तो क्या ???
यह गहन प्रश्न कैसे समझाएँ ?
दस बीस अधिक हों तो हम नाम गिनाएँ ।
पर, कदम कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाए घात खड़ा घातक है ।
– दिनकर

श्वेता दीप्ति, सम्पादक , हिमालिनी |

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