Fri. Dec 14th, 2018

‘छमिया’ जिसे पढ़ना यथार्थ से गुजरना है : डा.श्वेता दीप्ति

नेपाली साहित्य के सजग साहित्यकार की श्रेणी में एक नाम आबद्ध हो चुका है गणेश लाठ जी का । जिन्हें साहित्यकार से पहले एक सफल उद्योगपति के रूप में जाना और पहचाना जाता रहा है । किन्तु यह कहने में तनिक भी गुरेज नहीं है कि आप सफल उद्योगपति के साथ ही एक सफल रचनाकार भी हैं । व्यंग्य जैसे दुरुह विधा को लेकर लाठ पाठकों के समक्ष उपस्थित हुए हैं यही इनकी सशक्त रचना–प्रवृत्ति का उदाहरण है ।

 

डा.श्वेता दीप्ति

व्यंग्य, जिसके विषय में डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि, “व्यंग्य तभी होता है, जब कहने वाला अधरोष्ठ में हंस रहा हो, सुनने वाला तिलमिला उठा हो, फिर भी जवाब देना खुद को उपहासास्पद बना लेना होता है ।” वैसे व्यंग्य में क्रोध की मात्रा आ जाए तो हास्य की मात्रा कम हो जाती है । व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराईयों और कमजोरियों की हंसी उड़ाकर पेश करना होता है । मगर इसमें तहजीब का दामन मजबूती से पकड़े रहना जरूरी है । व्यंग्य वह गंभीर रचना है जिसमें व्यंग्यकार विसंगति की तह में जाकर उस पर वक्रोक्ति,वाग्वैदग्ध आदि भाषिक शक्तियों के माध्यम से तीखा प्रहार करता है, उसका लक्ष्य पाठक को गुदगुदाना न होकर उससे करुणा,खीज अथवा आक्रोश की पावती लेना होता है ।

इक्कीसवीं सदी में विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में जिस प्रकार परिवर्तन एवं परिवद्र्धन हुआ है, उसी प्रकार साहित्य के क्षेत्र में भी नए प्रयोग, नए विचार और कल्पना के नए आयामों का आर्विभाव हुआ है । साहित्य में व्यंग्य सिर्फ शब्द शक्ति के भाव मात्र में सीमित न रहकर आज विस्तृत रूप में उभर कर सामने आया है । व्यंग्य का वास्तविक उद्देश्य समाज की बुराईयों और कमजोरियों को पेश करना होता है, व्यंग्य ‘किया’ जाता है, ‘कसा’ जाता है, व्यंग्य ‘मारा’ जाता है, व्यंग्य ‘बाण चलाया’ जाता है । ये मुहावरे व्यंग्य के तीखेपन को दर्शाते हैं व्यंग्य आरम्भ से बोलचाल की भाषा में तो रहा, लेकिन साहित्य में इसका प्रवेश बहुत बाद में हुआ । साहित्य अपनी परिभाषा में ही सौम्य होता है । सबको साथ लेकर चलने की उसकी मंशा रहती है। सहित से ‘साहित्य’ बना है । लेकिन व्यंग्य सबको साथ लेकर नहीं चलता । वह समाज में व्याप्त विरोधाभासों की मजाक उड़ाता है । पाखण्ड पर चोट करता है । छल प्रपंच और ऊपर से न दिखाई देने वाली विसंगतियों का परदाफाश करता है । दोगलेपन को धिक्कारता है । उसके उपहास में भी आलोचना का तत्व होता है । ऐसे में वह साहित्य में सहज ही प्रवेश नहीं कर पाता । व्यंग्य का जन्म अपने समय की विद्रूपताओं के भीतर से उपजे असंतोष से होता है । विद्वानों में इस बात पर मतभेद लगातार बना रहा है कि व्यंग्य को एक अलग विधा माना जाए या कि वह किसी भी विधा के भीतर ‘स्पिरिट’ के रूप में मौजूद रहता है । दरअसल व्यंग्य एक माध्यम है जिसके द्वारा व्यंग्यकार जीवन की विसंगतियों, खोखलेपन और पाखंड को दुनिया के सामने उजागर करता है । जिनसे हम सब परिचित तो होते हैं किंतु उन स्थितियों को दूर करने, बदलने की कोशिश नहीं करते बल्कि बहुधा उन्हीं विद्रूपताओं, विसंगतियों के बीच जीने की, उनसे समझौता करने की आदत बना लेते हैं । व्यंग्यकार अपनी रचनाओं में ऐसे पात्रों और स्थितियों की योजना करता है जो इन अवांछित स्थितियों के प्रति पाठकों को सचेत करते हैं । जैसा कि ‘व्यंग्य’ नाम से ही स्पष्ट है, इस विधा में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण सीधे–सीधे (अभिधा में) न होकर परोक्षतः (व्यंजना के माध्यम से) होता है । इसीलिए व्यंग्य में मारक क्षमता अधिक होती है । हमारा समाज अन्याय, अनाचार, पाखंड, कालाबाजारी, छल, दोगलापन, अवसरवाद, असामंजस्य तथा आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक विसंगतियों से घिरा हुआ है । सजग साहित्यकार व्यंग्य के माध्यम से इन सभी विसंगतियों एवं विद्रुपताओं पर तीक्ष्ण प्रहार करता है ।

कुछ दिनों पहले मुझे एक नयी कृति ‘छमिया’ पढ़ने का अवसर मिला । लेखक हैं गणेश लाठ । पुस्तक के शीर्षक ने ही उत्सुकता जगायी कि आखिर इसके भीतर केन्द्रबिन्दु कौन है ? पहली सफलता किसी भी रचनाकार को तभी मिल जाती है, जब वो पाठक के अन्दर कृति के प्रति एक उत्सुकता जगाने में सफल हो जाता है । यहाँ छमिया के लेखक को सफलता मिली है ।

नेपाली साहित्य के सजग साहित्यकार की श्रेणी में एक नाम आबद्ध हो चुका है गणेश लाठ जी का । जिन्हें साहित्यकार से पहले एक सफल उद्योगपति के रूप में जाना और पहचाना जाता रहा है । किन्तु यह कहने में तनिक भी गुरेज नहीं है कि आप सफल उद्योगपति के साथ ही एक सफल रचनाकार भी हैं । व्यंग्य जैसे दुरुह विधा को लेकर लाठ पाठकों के समक्ष उपस्थित हुए हैं यही इनकी सशक्त रचना–प्रवृत्ति का उदाहरण है ।

बात करुँ छमिया की । नेपाली भाषा में रचित छमिया नौ व्यंग्य कथा का संग्रह है जिसकी शुरुआत ‘चोरसँग साक्षात्कार’ से होती है । पत्नी का मायके जाना पति के लिए सौभाग्य की बात ही होती है । कुछ दिनों स्वतंत्र हवा में साँस लेने की खुशी और पत्नी की कचकच से छुटकारा । कथा की शुरुआत मिथिलेश की इसी खुशी के साथ होती है । प्रारम्भ में लगता है कि लेखक आम तौर पर पत्नियों पर बन रहे चुटकुलों की तरह ही अपने व्यंग्य का आधार भी पति पत्नी के रिश्ते को ही ले रहा है । परन्तु लेखक तत्काल ही अपने विषय पर आता है, जब पत्नी के मायके जाने के बाद अपनी स्वतंत्रता का सेलिब्रेशन करते हुए मिथिलेश के घर में एक चोर का पदार्पण होता है । यह चोर प्रतीक है समाज के हर उस व्यक्ति का जो किसी ना किसी रूप में चोर ही है । फर्क इतना ही है कि सभी एक सफेदपोश की जिन्दगी के साए में अपने इस काले पक्ष को छुपाने में माहिर होते हैं । चोर कालिदास के माध्यम से लेखक ने समाज के इसी पक्ष को जिसमें नेता से लेकर बुद्धिजीवी और जनता से लेकर एनजीओ के नाम पर चोरी करने वालों पर गहरा कटाक्ष किया है । एक ऐसा चोर जो चुनाव लड़ने तक की हिम्मत रखता है और अपने चोरी के पेशे को सही साबित करने की भी । रोचक तरीके से कथाकार ने समाज की दुरावस्था का, जहाँ हर व्यक्ति किसी ना किसी रूप में चोर है, का वर्णन किया है ।

‘नेपाल श्रीमती पीडि़त महासंघ’ दूसरी व्यंग्य कथा है जिसका शीर्षक ही बताता है कि कथा की पृष्ठभूमि क्या होगी । पत्नियों पर जितने चुटकुले बने हैं उतने शायद ही किसी और विषय पर बने होंगे । इस कथा में स्वाभाविक तौर पर पति अपनी पत्नियों से पाए गए दुख के विरोध में संगठन का निर्माण करते हैं । किन्तु यह व्यंग्य है इस देश की व्यवस्था पर जहाँ रोज एक समस्या को लेकर संस्थाएँ बनती हैं, आयोग बनते हैं और जहाँ समस्या का समाधान नहीं होता बल्कि वह संस्था पैसा बटोरने की संस्था बन जाती है । जहाँ विभिषणों की कमी नहीं है । देश की व्यवस्था पर करारी चोट है उक्त कथा ।

इसी तरह जब पाठक रामभरोसेकी छमिया पर पहुँचता है तो उसका भ्रम टूटता है । छमिया किसी ग्रामीण बाला की या किसी छमकछल्लो की कहानी नहीं है बल्कि एक भैंस की कहानी है जिसका नाम छमिया है । यह कटाक्ष है सूचना और संचार विभाग पर । जहाँ किस तरह छोटी सी बेकार घटना को भी परोस कर मीडिया की टीआरपी बढाई जाती है और महत्तवपूर्ण घटनाओं की भी लीपापोती कर दी जाती है । अत्यन्त चटकारे ढंग से लेखक ने इस कथा का ताना–बाना बुना है । पाठक मुस्कुराते हैं पढ़कर, किन्तु एक चिढ़ जो दिल में पैदा होती है ऐसे हालात के लिए वही इस व्यंग्य कथा की सार्थकता भी सिद्ध करती है । देश की परिस्थितियों को व्यंग्य का रूप देकर लेखक ने समाज का बेरंग और कुरूप आईना दिखाने की कोशिश की है । सार्थक शब्दचयन, परिस्थितिनुकूल भाषा और वातावरण का अद्भुत संयोजन आपकी हर कथा में झलकती है । आगत शब्द जहाँ साहित्य का सौन्दर्य बढ़ाते हैं वहीं कथा शैली में जीवन्तता भी प्रदान करते हैं । मधेश की मिट्टी की खुशबु, ग्रामीण परिवेश के साथ ही शहरों का तामझाम और जीवनशैली तथा व्यस्तता की वास्तविक तस्वीर देखने को मिलती है छमिया में जो यह दर्शाता है कि लेखक का अनुभव इन गलियारों से होकर गुजरा है ।

भ्रष्ट आचार, पानबाबा, म वीरगंजे सभी स्तरीय और पठनीय कथा है । मधेश की आँचलिकता इनका सौन्दर्य है और लेखक की प्रस्तुति शैली में मिट्टी की महक और देश के लिए चिन्ता भी स्वाभाविक रूप से झलकती है । प्रस्तुति शैली की एक झलक, “मेरो नाम वीरगन्जे हो । नेपालको दक्षिण सिमानाको मध्यमा अवस्थित छु । समस्त ब्रह्माण्डका रचियताले मेरो तपक्रम ६ डिग्री देखि ४५ डिग्री सेल्सियस कायम राख्ने गरेका छन् । जीउ तातो छ, तर हेक्का राख्नुहोला, रगत, मन, विचार, सबै शीतल नै छन्……‘लाटालाई लात, बाठोलाई ठाँट’ भनने उखान को रचना मेरै क्षेत्रमा भएको हो ।” एक अनुच्छेद में वीरगंज का वातावरण, उसकी अनदेखी पीड़ा को समेट लिया गया है । यही शैली लेखक की विशेषता है ।

नौ की नौ कथा एक साँस में पढ़ जाने की क्षमता रखती है । लेखक की देश के प्रति, उसकी विसंगतियों के प्रति और अव्यवस्था के प्रति जो चिन्ता है, रोष है वो सब तीक्ष्णता के साथ अभिव्यक्ति पाता चला गया है । एक सार्थक और अद्भुत कृति के लिए रचनाकार को साधुवाद ।

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