Tue. Nov 20th, 2018

जितने मुंह उतनी बातें
मुकुन्द आचार्य

इस सारे कायनात में आदमी एक अजीबोंगरीब जानवर है। वह कब कैसे खुश और नाखुश होता है, यह कहना बहुत मुश्किल है। इसी चंचल मतिवालों को संस्कृत के किसी कवि ने कहा है-
क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा, रुष्टा-तुष्टा क्षेण क्षणे !
अर्थात् क्षण क्षण में खुश-नाखुश होने वाला शख्स।
खैर मैं एक रोज हिमालिनी के दफ्तर से शाम को निकल कर अपने घोसले की ओर पैर-पंख को फैलाते हुए तेजी से उडÞ रहा था। क्या सुहानी शाम थी। मेरे आदरणीय पाठकवृद्ध, आप लोगों से क्या छुपाना। इधर जब से मैंने भाष्कर समूह, राजस्थान का प्रकाशन ‘आहा जिन्दगी’ पढÞना शुरु किया है तभी से हर बुरी चीज में भी अच्र्छाई को ढूंढ निकालने की ‘बुरी’ आदत सी लग गई है। माफ कीजिएगा ! वह सुहानी शाम इसी तर्ज की थी।
यात्री लोग सभी घर लौटने की जल्दी में थे। मैं भी उसी भीडÞ-भाडÞ की शोभा बढÞा रहा था। युवक-युवतियाँ अपनी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रयोग करके सभी सीट में शोभायमान हो चुके थे। ‘डेट एक्सपायर’ दवा की तरह हमेे किसी कोने में भीडÞ ने फेंक दिया था।’ क्या सुहानी शाम थी।
इधर नेपाल सरकार ने इन्धन के मूल्यों को इतना उछाल दिया कि र्सवसाधारण जनता, जिसे आम भाषा में आम जनता कहते हैं, खुशी से नाच उठी। यात्रीगण अपनी-अपनी सीट को सम्हाले मजे ले-ले कर सरकार की तारीफ में कसीदे भर रहे थे। चुनचुनकर सुन्दर-सुन्दर गालियाँ दे रहे थे। कोइ पढÞा-लिखा सा दिखनेवाला यात्री ने ऐलान किया- यह प्रधानमन्त्री तो बहुत हीं छँटा हुआ निकला। जनता राहत के लिए मुँह बाए खडÞी थी ! प्रधानमन्त्री महोदय ने तो मंहगाई दे दी ‘राहत पैकेज’ में।
किसी कोने से दूसरी आवाज आई, यह साली अंग्रेजी भाषा भी क्या चीज है यार। किसी भी बुरे और घटिया काम में अंग्रेजी का एक शब्द जोडÞ दो, देखते हीं देखते वह शब्द वजनदार बन जाता है। अब इसी ‘राहत पैकेज’ को ले लीजिए। सुनने में लगता है कोई अच्छी चीज होगी। मिलती है मंहगाई । वह भी थोक में !
किसी सज्जन से रहा नहीं गया। वे फूट पडÞे, आयल निगम हमेशा घाटे में रहती है। पता नहीं इसे घाटे से उसको इतना जोडÞदार प्रेम क्यों हो गया है।
किसी ने नहला पर दहला मारा- घाटे से नहीं इसे भ्रष्टाचार से भरपूर प्रेम हो गया है। यह आयल निगम हमेशा घाटे में ही रहती है, मगर हरेक साल अपने कर्मचरियों को एक मोटी रकम बोनस में देती है। ऐसा अजूबा दुुनियाँ के किसी कोने में आपको देखने को नहीं मिलेगा।
मैंने वह सब सुनकर अपने डूबते हुए दिल को तसल्ली दी- यार ! क्या सुहानी शाम है। सीट नहीं मिली तो क्या हुआ, खडेÞ-खडÞे देश के बारे में अपना सामान्य ज्ञान तो बढÞ रहा है न !
गम गलत करने के लिए युवा-युवती की एक जोडी दूर कोने में बैठे हंस खेल रही थी। मुझे लगा, जवानी वास्तव में दीवानी होती है। इस प्रेमी-युगल को मंहगाई से कुछ लेना-देना नहीं था। दोनों ने मंहगाई को अपने मौम डैड के सबल कन्धों पर रख छोडÞा था। दोनों ने जनम से लेकर जवानी तक मंहगाई को माँ बाप के कन्धों पर सुरक्षित रख दिय था। इसीलिए चुहल बाजी कर रहे थे। आखिर सुहानी शाम जो थी।
एक पंडितनुमा सज्जन ने तो श्राप हीं दे डाला- लोडशेडिङ करके सारे देश को अन्धकार में डूबानेवालों। आनेवाली सात पीढÞी तक तुमलोगों के खानदान में किसी को उजाला नसीब न हो।
बाद में पता चला, वे पंडित जैसे सज्जन दिमागी मरीज थे। एक मौलबी साहब ने फरमाया- बडेÞ मीयाँ तो बडÞे मीयाँ, छोटे मीयाँ सुमान अल्लाह। मैने पूछा, क्यों जबाव क्या हुआ – आप को क्या तकलीफ है – वे बोले- इस लोशेडिङ के चलते बच्चों को ट्युशन पढाने में बडÞी दिक्कत पेश आ रही है। मैने कहा, ओहो ! तो आप इसलिए खफा है – वे छूटते ही बोले, और नहीं तो क्या। लगता था यह सरकार जरुर कुछ अच्छा काम करेगी। डा. बाबुराम भट्टर्राई एक नेक दिल इन्सान हैं। वे जरुर कुछ करेंगे। मगर वही ढाक के तीन पात !
किसी ने कहा- करेंगे क्यूं नहीं ! जनता गरीबी और महंगाई के बोझ से दबी हर्ुइ थी। डाक्टर भट्टर्राई ने प्रधानमन्त्री बनते ही मंहगाई की ठोकर से जनता जमीन पर रेंगने के लिए मजबूर कर दिया। मेरे मुँह से निकल पडÞा- क्या सुहानी शाम है !
कोने में अठखेली करता हुआ लैला मजून का जोडÞा अचानक खिलखिलाकर हंस पडÞा। मुझे लगा, किस खुशी में ये पागल हुए जा रहे है – क्या इन्हें कवीर बाबा का ‘र्ढाई आखर प्रेम का’ पता चल गया – खैर, जोडÞे की हंसी ने शाम के सुहानेपन में कुछ इजाफा ही किया।

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