Thu. Oct 18th, 2018

बिम्मी शर्मा
इस देश की राजनीति डायपर जैसी हो गई है बदबुदार । इसीलिए नेता बच्चे के डायपर की तरह अपना सिद्धांत और पार्टी बदल रहे हैं । एक छोटा बच्चा एक दिन में जितनी बार डायपर चेंज नहीं करता है उस से ज्यादा बार महीने में नेता लोग डायपर बदल रहे हैं । राजनीति के डायपर से बच्चे की सूसू और पोटी की तरह अपने सिद्धांत और भ्रष्टाचार के लीक होते ही नेता झट से डायपर बदल लेता है अर्थात पार्टी बदल लेता है । और पार्टी बदलने की यह डायपर बच्चे की डायपर की तरह सस्ता बिल्कुल भी नहीं है । यह डायपर खरीदने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करना पड़ता है । अभी हाल ही में देश के सबसे बडे धनाढय उद्योगपति ने नेकपा एमाले ब्राण्ड का अपना पुराना डायपर चेंज कर के नेपाली कागे्रस ब्राण्ड का लेटेस्ट डायपर पहन लिया है । जिस डायपर में उन्हे समानुपातिक में मधेशी कोटे से टिकट मिला है ।
राजस्व मारने और पचाने के लिए मशहूर इस उद्योगपति ने अपना नेकपा एमाले वाला पुराना डायपर राष्ट्रवाद के पसीने से गीला होने के कारण बदल दिया और नयां कागें्रस वाला डायपर पहन कर सुकून महसूस कर रहे हैं । यह तो एक उदाहरण है, ऐसे कई नेता हैं विभिन्न राजनीतिक दल में, जो निर्वाचन के बिस्तर पर दल और उम्मीदवारी का डायपर पहन कर बच्चे की तरह धमाचौकड़ी कर रहे हैं । जो नैपकिन की तरह यूज एंड थ्रो वाले सिद्धांत से निर्देशित हैं वह डायपर बदलने में माहिर हैं । जो राजनीति में जा कर देश का चेहरा और तस्वीर बदलने की बात कहते नहीं थकते थे वह राजनीति को ही डायपर बना कर आए दिन बदलते रहते हैं ।
कुछ न कर के भी कुछ करते रहने का आभास दिलाने के लिए और मीडिया में बादल की तरह छाने के लिए नेता और उद्यमी दोनो डायपर की तरह पार्टी बदलते हैं और चर्चा में रहते है । बच्चों को पहनाया जाने वाला यह डायपर बूढ़े, बीमार, असक्त और अपंग तो पहनते ही थे अब नेता भी इसका इस्तेमाल करने लगे दल बदलने में । वह नेता जो बच्चे भी नही और वृद्ध भी नहीं पर दिमाग से बच्चे से भी कच्चे हैं ‘डायपर कल्चर’ को बढ़ावा दे रहे हैं । जब यह नेता नया डायपर बदलते हैं तब राहत की सांस लेते हुए सोम शर्मा के सत्तु की तरह अपने पेट और परिवार की प्रगति का सपना देखने लगते हैं । जब हांडी में रखा हुआ सत्तु फूट जाता है तब यह फिर दूसरा डायपर यानि दल बदलने के लिए छटपटाने लगते हैं । यदि नहीं बदलेंगे तो गीला और बदबुदार यह डायपर इन्हें उकसाने लगता है । इसीलिए यह आगा–पीछा सोचे बिना चल देते हैं ।
वीरगंज के पूर्व मेयर जो गत स्थानीय तह के निर्वाचन में राजपा में प्रवेश किया उस से मेयर के लिए अपनी उम्मीदवारी न मिलने से बौखला गए थे । अगले दिन फोरम लोकतात्रिंक मे प्रवेश कर के मेयर का टिकट हथिया लिया । पर जब जीत नहीं पाए तो विजय गच्छेदार के फोरम में टिक भी नहीं पाए । इसीलिए उन्होंने आनन फानन में गच्छेदार का पहनाया हुआ डायपर उतार कर उपेन्द्र यादव की फैक्ट्री मे बना हुआ फोरम ब्राण्ड का लेटेस्ट डायपर पहन लिया । इससे पहले वीरगंज के यह पूर्व नगरपिता ने तराई मधेश लोकतात्रिंक पार्टी का डायपर पहना हुआ था और उस से भी पहले राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का डायपर पहना हुआ था । या डायपर पहनने के मामले में इतने माहिर हंै कि इन का नाम ‘गिनिज बुक आफ वल्र्ड रिकार्डस्’ मे दर्ज हो जाना चाहिए ।
इस देश की राजनीति में डायपर संस्कृति बडेÞ धड़ल्ले से फलफूल रही है । यह डायपर भी धर्म, जातिवाद और आरक्षण का लेवल लगा कर पहन और पहनाया जा रहा है । जिस उद्योगपति ने नेकपा एमाले के समानुपातिक कोटे से सभासद बन कर अपना खाया हुआ थाल भी साफ किया था वही उद्योगपति सभासद ने जब एमाले ने माओवादी से एकता कर लिया तो डूबने वाले जहाज से जैसे चूहे सबसे पहले भाग जाते हैं उसी तरह भाग गए । शायद उन्हे डर होगा कहीं माओवादी उनका पुराना डायपर उतार कर उन को बिल्कुल नंगा न कर दें इसीलिए कागें्रस की छाया में आ कर दूसरा नया डायपर बदल लिया वह भी करोड़ों रुपए में खरीद कर । डायपर शरीर का नंगापन तो ढक देगा पर क्या वह डायपर मन, आत्मा, सिद्धांत और व्यवहार का नंगापन ढक सकता हैं ?
नेपाल की राजनीति भेड़ की तरह हो गई है । कोई एक भेड़ गढ्ढे में कूद जाएगी या दलदल में धंस जाएगी तो बांकी बचे सारे भेंड भी उसी के नक्शे कदम पर चलते हुए गढ्ढे मे कूद जाएँगें । इस देश के जनता या मतदाता भी भेड़ ही है । इसीलिए तो डायपर बदल कर खुद को शुद्ध, बुद्ध मान कर इन के द्वार में आने वाले सभी उम्मीदवारों का स्वागत बडेÞ जोरो से करती है । यह नहीं देखते कि आज जो डायपर पहन कर उनके घर में वोट मागंने आया है वह अगले चुनाव में दूसरा डायपर पहन कर फिर से उन के घर में वोट माँगने आएगा । क्योंकि इन पांच सालों में उस उम्मीदवार का सिद्धांत और व्यवहार दोनो डायपर से लीक हो कर सबको दिखाई देगा ।
जो उम्मीदवार जनता से वोट मांगने आते हैं वह दरअसल मतदाता का ही असली चेहरा है । यदि मतदाता या जनता ठीक रास्ते पर हो और सही, गलत का पहचान कर सकने में सक्षम हो तो मजाल है कि कोई उम्मीदवार इनको वरगला सकेगा ? पर मतदाता खुद ही वोट के बदले नोट में बिक जाते हैं, जिनमें बेईमानी और मक्कारी कूट कूट कर भरी है वह अपने उम्मीदवार को भाग्य विधाता के रूप में देखता है । उसको अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक का डायपर नहीं दिखता । क्योंकि मतदाता खुद ही राजनीति पार्टी का हनुमानकारिता और अनुमानकारिता करने के लिए डायपर पहना हुआ है । जो खुद अंधा है वह दूसरों को कैसे पहचानेगा कि वह अंधा है की नहीं ? इसीलिए टीवी पर भले ही बच्चे के डायपर का विज्ञापन आता हो पर हमारे देश की राजनीति में यह डायपर नेता और उसके पिछलग्गु पहन रहे हैं और राजनीति में डायपर कल्चर का प्रयोग कर रहे हैं । क्योंकि नेता बनाम डायपर है और डायपर बनाम नेता । अगली बार जब टीवी में बच्चे के डायपर का विज्ञापन देखिएगा तो उस डायपर में आप को नेता और चुनाव के उम्मीदवारों का अक्श न दिखाई दे तो कहना । क्योंकि नेपाल की राजनीति अभी ‘डायपरमय’ है ।

 

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