Fri. Sep 21st, 2018

डा.सी.के राउत की घेराबन्दी क्यों ? : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी | अब यह समान्य उत्सुकता की बात बनती जा रही है कि एक समान्य परिवार में जन्में बचपन का चन्द्रकान्त राउत और हाल का डा.सी.के राउत ने ऐसा क्या कर डाला है कि एक तरफ नेपाली राज्य हत्प्रभ और हतोत्साही बनती जा रही है, तो दूसरे तरफ मधेशी जनता अब अपने मुक्ति के लिए अन्तिम विकल्प के रुप में डा.राउत को ही देख रही है ?
कुछ महीने पहले नेपाल सरकार के गृह मन्त्रालय के सुरक्षा निकाय के डीआइजी रहे सेवा निवृत अधिकारी को मानें तो राष्ट्रिय सुरक्षा परिषद् के सारे बैठकों में डा.सी.के राउत और उनके द्वारा संचालित स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन अभियान के आलावा किसी और मुद्दों पर नाम मात्र की चर्चा होती है । नेपाल की सारी शक्ति डा.राउत के इर्दगिर्द ही नाचती दिख रही है । और मजे की बात तो यह है कि सीके राउत ने भगवान् कृष्ण के भाँति निश्चिन्त होकर नेपाली साम्राज्य के साथ साथ अपने विरोधी समेत को उनके आवेग एवं आक्रोशों को ऐसे खुल्ला छोड दी है मानों जो भी हो रहें हैं, वे सब अच्छाइयों के लिए ही हो रहे हैं ।
डा.राउत ऐसे प्रकृति के दिख रहे हैं जैसे वे यह जानते हों कि किसी काल में हार जब मधेश का रहा तो जीत भी अब मधेश का होना निश्चित है । क्योंकि सत्य को पहले हारना पडता है । पाण्डवों ने सारे चीजों को हार जाने के बाद ही कौरव तथा राज्यों पर विजय पायी थी ।
कुछ लोग यह कहते सुने जाते हैं कि सी.के के पास मधेशी नेताओं की समर्थन नहीं है । इसिलिए उन्हें नेपाली शासकों से जंग जितना मुश्किल है । और सीके की बातों को मानें तो वे यह कहते हैं कि आजादी की लडाई ही तो मुश्किलभरी है, जिसके कारण यह सब के बस की बात भी नहीं है । यह कठिनपूर्ण है । इसिलिए तो सीके को यह लडाई लडनी है । दूसरी बात यह है कि सत्य की लडाई में भगवान् राम ने जब बन्दरों के सहायता से रावन जैसे विशाल शतिm और बुद्धि के मालिक को हरा सकते हैं तो डा.राउत के साथ तो करोडों न्यायप्रेमी मधेशी जनता है । इसिलिए यह लडाई जितना संभव और स्थायी है, उतना कोई भी लडाई व संघर्ष नेपाली राज्य के सामने टिकाउ नहीं होने का उनका दावा है ।
कुछ लोग डर में, या घबराहट में, या फिर आक्रोष में ही यह सवाल करते आ रहे हैं, “आखिर डा.सी.के राउत को घेराबन्दी क्यों ?” बडा जायज और विचित्र प्रश्न है यह । कोई कहता है कि नेपाल में लोकतन्त्र ही नहीं है । किसी का मानना है कि यह नेपालियों का शासन है, तो कोई यह कहता है कि मधेशी कभी सुधर ही नहीं सकता । कोई गालियाँ देता है कि मधेशी नेताओं ने सब बिगार दिया ।
मैं लोगों के अध्ययन, विश्लेषण, तर्क व आक्रोषों के जबाव देने की हैसियत नहीं रखता । मगर यह सत्य है कि मधेश उपनिवेश मेेंं है, और उपनिवेश में कोई भी तन्त्र सुरक्षित नहीं रह सकता । उपनिवेश में कोई सुधर भी नहीं सकता । नेतृत्वों को कलंकित करना ही उपनिवेश का सही धर्म होता है । यही उपनिवेश की प्रकृति है ।
मनोविज्ञान यही कहता है कि व्यतिm को सुधारा जा सकता है, मानसिकता को नहीं । समाज में सुधार लाया जा सकता है, मनोविज्ञान में नहीं ।
कभी कभी मधेशी लोग यह कहते सुनायी देता है कि मधेशी नेता या कर्मचारियों से अच्छे मानवीय व्यवहार के तो पहाडी नेता और कर्मचारी ही होते हैं । उन्हें इज्जत करते और हाथ जोडते ही दफ्तरों में काम कर देते हैं, वहीं पर मधेशी नेता व कर्मचारी बिना घुस लिए और गाली दिए मधेशियों का कोई काम नहीं करते ।
लोगों का कहना और शिकायत करना भी गलत नहीं हो सकता । लेकिन मधेश की राजनीति और उसके नेतृत्वों ने न अपने लोगों को इन शिकायतों से दूर कर सका, न नेपाली शासन की मनोवैज्ञानिक रणनीति को समझ पाया । इन्हीं बातों को डा.राउत ने वैज्ञानिक तरीकों से विश्लेषण करते हुए मधेश के आजादी को ही एक अन्तिम विकल्प दिया है ।
यथास्थिति को आँखें बन्द करके स्वीकारने बाले या राज्य का चाकरी करने बाले कुछ लोग अपने साथ जनता से यह कहलवाने में मस्त हैं कि मधेशी नहीं सुधर सकते । जिन मधेशियों के मेहनत, दानापानी, संघर्ष और बलिदानियों से राणा से लेकर पंचायततक, प्रजातान्त्रिक भाँडतन्त्र से लेकर ज्ञानेन्द्रतन्त्र तथा नश्लीय गण्तन्त्रतक के सारे तन्त्रों को उखार फेंका, सैकडों ने शहादतें दे दी, उसी मधेशी समुदायों को जड् और नीच समझना एक नीचता नहीं तो और क्या है ?
बार बार “सीके नजरबन्द में, सीके नजरबन्द में !” कहकर कुछ कायर लोग हल्ला फैलाकर नेपाली राज्य को मधेश में पालते आ रहे हैं । उन्हें यह जानना होगा कि दुनियाँ के हर महत्वपूर्ण व्यतिm, हर महत्वपूर्ण स्थान और हर मूल्यवान् चीज नजरबन्द में ही होते हैं । सिर्फ अवस्थायें अलग होती हैं । सुरक्षा की अवस्था एक जैसी ही होती है । दुनियाँ का हर राजा महाराजा, राष्ट्र प्रमुख तथा प्रधानमन्त्री से लेकर मन्त्री और उच्च अधिकारीतक को सुरक्षा घेरे में रहने पडते हैं । वे अपने मर्जी से घर से बाहरतक नहीं निकल पाते हैं । वह भी तो एक नजरबन्द ही है न ?
जहाँतक डा.राउत की नजरबन्द या घेराबन्दी की बात है तो हमें यह समझ लेना बेहद जरुरी है कि अब वे इतने सस्ते व्यतिmत्व नहीं रहे कि जब और जहाँ चाहे, निकल सकते हैं । राज्य उन्हें माने या न मानें, मधेश की जनता और विश्व की राजनीति उन्हें अपना सहकर्मी मानने लगे हैं । उस आधारपर भी नेपाली राज्य को बदले हुए रुप में भी उन्हें सुरक्षा मुहैया करानी पडती है जो मधेश के लिए गर्व की बात है । क्योंकि बहुत सारे ऐसे भी राजनेतायें होते हैं, जिन्हें उनके सुरक्षाकर्मी न चाहते हुए भी उन्हें सुरक्षा देते हैं । वह उसकी बाध्यता है । तीसरी बात, मधेश को गर्व है कि एक सी.के से राज्य का सारा अत्याचार अस्तव्यस्त है । सारे उसके शासन और प्रशासनतन्त्र त्रसित अवस्था में है । रात का उसका नींद हराम है । दिन में उसे चैन नहीं है और निकट भविष्य में उसकी पतन निश्चित है ।

मधेशियों बस् तुम एक अब हो लो, सीके तुम्हें अब देश देगा,
नेताओं से तुम पिछा छुडाओ, विश्व तुम्हें सन्देश देगा ।
भविष्य अब तेरा होगा सुरक्षित, अपना तेरा शान रहेगा,
राज्य रहेगा, शासन तेरा, तेरा अपना मान रहेगा ।।
सेना तेरा, पुलिस तेरी, अब तेरा अपमान न होगा,
सीना तानकर निकलोगे तुम, अपना ही तेरा स्वाभिमान रहेगा ।
विश्व मञ्च पर जब निकलोगे, सारे जहाँ को याद रहेगा,
ये है शेर मधेश का, वसुधा में तेरा ललकार रहेगा ।।

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