Mon. Nov 19th, 2018

ड्रैगन की नजर मधेश पर

डा. गीता कोछड़ जायसवाल/सीपू तिवारी | मधेश में नेपाली रणनीति का उपयोग करती चीन की  कूटनीति। यह तुलना इस संदर्भ में थोड़ी सी अलग लगती है क्योंकि चीन एक बड़ा देश है और मधेश नेपाल का हिस्सा, फिर भी अगर हम नेपाल की जटिलता और परिवर्तन की गहराई में जाते हैं, तो यह मुद्दा अधिक प्रतिबिंबित  नज़र आएगा। इसका मतलब यह है कि मध्यम गति के परिवर्तनों पर ध्यान देने के लिए ‘पहचान’ का एक लेंस होना चाहिए, जो बड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है और संबंध व मान्यता के अपरिवर्तनीय झगड़े में लगे समुदायों को विभाजित कर सकता है।

नेपाल एक बहुभाषी, बहुसंख्यक और बहुवचन समाज है। विभिन्न बाहरी कलाकारों के कारण राज्य की विविधता भी विकसित हुई है, जिन्होंने नेपाल की क्षेत्रीय सीमाओं को फिर से परिभाषित किया है और वर्तमान नेपाल के भूगोल को बदल दिया है। अनिवार्य रूप से, यह परिभाषित विकास युद्ध के बाद दी गई रियायतों और संघर्ष का परिणाम था। इसलिए, नेपाल का वर्तमान भूगोल भी प्रतियोगिता और संघर्ष का विषय है।

राष्ट्र-राज्य एक परिभाषा का विषय है, इसलिए चिंता और शत्रुता का अंतर्निहित विकास कई समुदायों के बीच परिभाषित हो रहा है, जो अक्सर सत्ता, स्थिति और नियंत्रण के पदानुक्रम के आधार पर विभाजित होता है। वर्तमान समय में नेपाल के लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण केवल बाहरी शक्तियां नहीं हैं, जिन्होंने नेपाल की सामाजिक संस्कृति को दोबारा बदल दिया है, परंतु इसके भीतर के समुदायों में मान्यता और स्वीकृति पर अप्रसन्नता की गहरी जड़ें हैं। यह अप्रसन्नता केवल कुछ समुदायों की नहीं जो अपने आप को मुख्यधारा की भूमिका और नियंत्रण से विभाजित या बहिष्कृत महसूस करते हैं, बल्कि तराई (मधेश) के एक संपूर्ण क्षेत्र में है जहां कई समुदायों को ‘विस्तारित नेपाल’ (Greater Nepal) की धारणा के तहत संयोजित और स्वीकार नहीं किया गया है। इसलिए, ऐसा लगता है कि ‘एक नेपाल, एक मधेश’ मौजूद है, जो औपचारिक रूप में ‘विस्तारित नेपाल’ की इस धारणा का एक अभिन्न हिस्सा है।

कई दशकों से, इस मनोवैज्ञानिक बाधा को तोड़ने के लिए नीतियों पर सोच विचार करने और एक नया स्वरूप देने के लिए नेपाली सरकार पर दबाव डाला गया है, जबकि भीतर की कई ताकतों ने वास्तव में अपने आप को और अधिक विभाजित महसूस किया है। नतीजतन, वैकल्पिक बल और आवाज का उद्भव है जो राष्ट्र निर्माण की पूरी प्रक्रिया में अपने आप को विचलित महसूस करता है। बाहरी शक्तियों के दबाव में उठाए गए प्रासंगिक मुद्दों में एक पहलू नेपाल के पूर्वी हिस्से के समुदायों के लोगों को तराई क्षेत्र में बड़ी आबादी में बसाना और विकसित करना है, जिसके परिणामस्वरूप नौकरी में अभाव के कारण स्थानीय समुदायों के लोग निराशा महसूस करते हैं और पूर्ण गरीबी कि मात्रा व स्थानीय संस्कृति पर आक्रमण के कारण जातीय संघर्ष और शत्रुता गहरी हो गई है।

अब नेपाल के इसी तरह के परिवर्तन और विकास को एशियाई क्षेत्र के बड़े संदर्भ के दृष्टिकोण से देखें। नेपाल, जो सांस्कृतिक रूप से हिंदू धर्म और सभ्यता से प्रभुत्व और जुड़ा हुआ है, वो चीन से निकटता और समानता से जुड़ी हुई कुछ समुदायों की वैकल्पिक संस्कृति द्वारा जोड़ा जा रहा है। वास्तव में, क्योंकि नेपाल और तिब्बत के बीच कई युद्ध हुए थे जिसके कारण नेपाल को चीनी साम्राज्य की शक्ति के अधीन होना पड़ा था, इसलिए नेपाल में तिब्बती समुदायों को केवल एक पृथक और विच्छेदनित समुदाय के रूप में विकसित किया गया था।

आज, चीन कनेक्टिविटी परियोजनाओं और जल विद्युत सौदों के साथ अपने तिब्बत क्षेत्र को नेपाल के साथ जोड़ रहा है। बेल्ट और रोड परियोजना (बीआरआई BRI) हिमशैल की सिर्फ नोक है, जबकी चीनी जड़ों का विस्तार और संबंधों में विकास लंबे समय से चल रही प्रक्रिया है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों से जिस गति से परिवर्तन हो रहा है वह उल्लेखनीय है।

चीन जो नेपाल के उत्तरी हिस्से पर स्थित है एक दूर का पड़ोसी है और हिमालयी सीमा निकटता के लिए बाधा उत्पन्न करती है; जबकि भारत के साथ नेपाल की सदियों से लंबी खुली सीमा रही है। फिर भी, चीन ने हमेशा यह दूरी पार करने में गहरी रूचि रखी है, जो नेपाल की माओवादी क्रांति में दिखाई देती है। इसलिए, कई नेपाली लोगों के वैचारिक परिवर्तन का मुख्य कारण नेपाल में एक दशक लंबा गृह युद्ध है, हालांकि मूल पहचान हिंदू बनी रही है।

चीनी सरकार ने तेजी से नेपाल की बाजार क्षमता और संसाधन क्षमता को लक्षित किया है, जो राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण कमजोर है। राजनीतिक आवाजों और राज्य की पिछड़ेपन में विभाजन को राजनीति का फायदा उठाने और लाभांश हासिल करने के लिए चीन ने अर्थशास्त्र की शक्ति के फायदे से जोड़ा है। आकर्षक प्रस्तावों ने नेपाल के कट्टर विचारधाराओं की भी पेट के नीचे गुदगुदाहट पैदा की है, खासकर जब उनमें से प्रत्येक को सत्ता हासिल करने की चुनावी प्रक्रिया में अपनी शक्ति साबित करने के लिए खड़ा होना पड़ता है, जहां वास्तविक काम से धन अधिक शक्तिशाली है। इस मत्वकांक्षी योजना में मधेश एक दीवाल की तरह भारत के साथ खड़ा दिखता है, जो चीन की सारी योजना को धूल चटा सकता है, इसलिए मधेश को मिलाने या तोड़ने का खेल शुरू किया गया।

विभाजन और रिक्त स्थान ने चीनी को नेपाली भूमि में आसान प्रवेश करने का मौक़ा दिया है, जिसके चलते चीन के नेपाल में कई अध्ययन केंद्र काम कर रहे हैं, चीन-नेपाल मित्रता संघ है, चीनी पर्यटकों की बाढ़ है, और स्वाभाविक रूप से चीनी वस्तुओं की बढ़ोतरी है। चीनी सामान और भोजन का कारोबार जो शुरू में तिब्बती वर्चस्व वाले क्षेत्रों तक ही सीमित था, अब नेपाल के प्रमुख स्थानों में फैल गया है। इसलिए, चीन का स्वाद केवल नेपाल के कुछ सीमावर्ती इलाकों या तिब्बती समुदायों में ही नहीं मिलता है, बल्कि काठमांडू का केंद्रीय पर्यटक स्थल ठमेल भी धीरे-धीरे ‘चीनी शहर’ में बदल रहा है।

नेपाली भूमि में चीनी संस्कृति और जीवन का जुड़ाव भविष्य में चुनौतियों के बिना नहीं है, क्योंकि इससे ‘सांस्कृतिक आक्रमण’ हो सकता है, जिससे अस्तित्व की शत्रुता पैदा हो सकती है। अभी तक, पैसे के संगीत पे कई नेपाली नृत्य कर रहे हैं, लेकिन जब वही पैसा उनके स्थानीय अस्तित्व को चुनौती देगा, या अपने स्थानीय समुदायों को बदल देगा, तब एक विपरीत प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। पहले से ही, नेपाल में स्थानीय लोगों के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास पर एक प्रवचन चल रहा है, जो चाहता है कि स्थानीय जनसंख्या को लाभ मिले और संपूर्ण फ़ायदा सभी समुदायों के बीच समान रूप से बाँटा जाए।

हालांकि, अगर चीनी उपस्थिति स्थानीय बाजार को चीन पर निर्भर बाजार में तब्दील कर देगी, और नेपाल का मुक्त बाजार वैश्विक बाजार के लिए खुल जाएगा, तो नेपाल को गहरे झटकों का सामना करना पड़ेगा। नेपाल आज तक भारत की ‘सुरक्षा छतरी’ के अधीन है, लेकिन नेपाल के  पीएम ओली का एजेंडा नेपाल पर किसी भी विदेशी शक्ति को अत्यधिक नियंत्रण नहीं होने देना है। ओली सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती न केवल राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करना है, बल्कि नेपाल के समुदायों को एक साथ गुंथा (intertwined), परस्पर निर्भर (interdependent), और मिश्रित (interlinked) दुनिया की चतुराई में गिरने से बचाना भी है, जहां ‘राष्ट्र’ का अपना अस्तित्व और अपनी संस्कृति को विदेशी शक्तियों द्वारा चुनौती है।

डा.गीता कोछड़ जायसवाल-चीन में संघाई फुतान विश्वविद्यालय में अस्थाई बिद्वान है, और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर है।

सीपु तिवारी- लेखक, राजनीतिज्ञ और मधेश के जानकार है।

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