Tue. Nov 20th, 2018

धन साधन है या साध्य –

वृहस्पति स्मृति में एक श्लोक है-
आदरेण यथा स्तौति धनवन्तं धनेच्छया।
तथा चेद्विश्वकर्तारं को न मुच्येत बन्धनात् !
धन की इच्छा से मनुष्य जैसे आदर विवेक के साथ धनवान की सेवा-स्तुति करता है, वैसे हर्ीर् इश्वर प्राप्ति की इच्छा से विश्वरचयिता भगवान की सेवा करे तो जन्म-मृत्यु के बन्धन से छूट जाए।
‘न रम्यं नारम्यं प्रकृतिगुणतो वस्तु किमपि’
अर्थात् ‘जगत् में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो स्वभाव से ही अच्छी या बुरी हो’ अच्छी-बुरी वस्तु बनती है, उसके उपयोग के अनुसार। अणुशक्ति से लोकसुख के कार्य भी हो सकते हैं और अणु बम से निरीह लाखों प्राणी मारे भी जाते हैं। सांप दूध पीता है तो उससे जहर पैदा होता है और वह मनुष्य के प्राण हरता है। वही दूध एक बालक को पिलाया जाए तो उससे बालक के शरीर का गठन होता है। इसी प्रकार धन स्वभाव से बुरा नहींं है, उसका दुरुपयोग ही उसे बुरा बनाता है, और उसी से मनुष्य का अधः पतन होता है।
यदि धन का सदुपयोग होता है तो उससे मनुष्य की उन्नति होती है। धन का उपयोग जहां तक साधन के रुप में होता है, वहां तक वह हानिकारक नहीं होता, पर यदि धन को साधन के बदले साध्य के सिंहासन पर बैठा दिया जाता है तो वह निश्चय ही मनुष्य का पतन करता है।
यह बात तो र्सवसम्मत है कि मनुष्य जीवन का ध्येय भगवत् प्राप्ति है- क्योंकि दूसरे किसी भी शरीर में भगवत् प्राप्ति की योग्यता नहीं है, जबकि विषय सुख तो चौरासी लाख योनियों में अपने-आप मिल जाता है। अतएव साधान के तौर पर न्याय और धर्म के अनुसार धन कमाना बुरा नहीं है। पहले भी और आज भी धन के बिना जीवन निर्वाह नहीं हो सकता। इसलिए अर्थ को भी एक पुरुषार्थ बताया गया है। जो मनुष्य अपना निर्वाह भी नहीं कर सकता, वह दूसरों की सहायता कैसे कर सकता है – अपना निर्वाह करते हुए दूसरे की सहायता करना यह भी जीवन का एक बडÞा लाभ है।
एक श्लोक है-
भिक्षुका नैव भिक्षन्ति बोधयन्ति गृहे गृहे।
दीयतां दीयतां लोके अदातुः फलमीदृशम्।।
भावार्थ यह है कि भीख मांगनेवाले भीख नहीं मांगते, वे तो घर-घर यह शिक्षा देते हैं कि भाई ! दान करो, दान करो, इस जन्म में दान न करोगे तो इस समय जैसी हमारी स्थिति है, वैसी ही तुम्हारी होगी। इस समय नहीं बोओगे तो वर्षभर क्या खाओगे – इन लोगों ने पर्ूवजन्म में दान नहीं किया, इससे आज भीख मांग रहे हैं- इस प्रत्यक्ष उदाहरण से शिक्षा ग्रहण करो।
यहां तक हमने देखा कि जीवन-निर्वाह के लिए धन अत्यन्त आवश्यक है- परंतु उसकी प्राप्ति होनी चाहिए सत्यमार्ग से। धन की प्राप्ति सत्यमार्ग से ही क्यों करनी चाहिए, यह विषय विशेष विचारणीय है। जिस किसी भी प्रकार से प्राप्त किया हुआ धन क्या धन नहीं है – बैंक में उस का व्याज भी उतना ही मिलता है, जितना अन्यायोपार्जित धनका। व्यवहार में वह धन न्यायोपार्जित धन से जरा भी कम काम नहीं देता। उत्तर में निवेदन है कि ये विचार केवल स्थूल दृष्टि के हैं। इन में सूक्ष्म विचार औ दूरदर्शिता नहीं है। अब देखिए- शास्त्रों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार पुरुषार्थ बतलाए हैं। यहां परम पुरुषार्थ मोक्ष है। जो मनुष्य धर्म से अर्थ की प्राप्ति करके उस अर्थ का उतना ही उपयोग करता है, जितना जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है, वह चतर्ुथ पुरुषार्थ को थोडेÞ ही प्रयास में सिद्ध कर सकता है। मनुस्मृति में तो कहा है कि ‘अधर्म से प्राप्त किया हुआ धन कुछ दिन रहकर फिर न्यायोपार्जित धन को भी साथ लेकर नष्ट हो जाता है।’ कदाचित् ऐसा होने के पहले ही शरीर छूट जाता है तो वह धन तो यहीं पडÞा रहा जाता है और जीवन के किए हुए पाप के फलस्वरुप यातना शरीर धारण करना पडÞता है। अतएव अधर्म से प्राप्त किया हुआ धन बैंक में चाहे सुन्दर मालूम हो, पर वह है विष से भरे हुए सोने के घडÞे जैसा।
‘विष रस भरा कनकघट जैसे।’
जब मनुष्य सारी की सारी चेष्टाएं केवल धन की प्राप्ति के लिए ही करता है, तब उसका अधःपतन किस प्रकार होता है, इसको भगवान ने गीता के दूसरे अध्याय में विशद रूप से समझाया है। मनुष्य जब धन को जीवन का ध्येय बनाता है, तब उसका चित्त हर समय धन का ही चिन्तन करता है। चिन्तन करते-करते उसी में उसकी आशक्ति हो जाती है। आशक्ति से प्राप्त करने की प्रबल कामना जाग उठती है। कामना में प्रतिरोध होने पर अर्थात् इच्छित वस्तु की प्राप्ति में विघ्न आने पर क्रोधाग्नि भडÞक उठती है, क्रोध से विवेक का नाश हो जाने पर कर्तव्याकर्तव्य का भाव नहीं रहता। ऐसा होने पर सारासार, धर्माधर्म या नीति-अनीति के विचार ही मन में नहीं आते। परिणाम में मनुष्य का मनुष्यत्व मिट जाता है। और वह क्या बन जाता है- यह कहा नहीं जा सकता। उसे क्या कहना चाहिए- ते के न जानीमहे।’ यह बात समझ में नहीं आती- संक्षेप में यही कहना है कि जीवन निर्वाह के लिए धन कमाना आवश्यक है, परन्तु धन की प्राप्ति ही जीवन का ध्येय नहीं बन जाना चाहिए। ‘सन्तोष ही सुख है’ इसलिए जीवन के निर्वाहार्थ न्यायमार्ग से धन कमाना चाहिए। शरीर के बनाए रखने के लिए आवश्यक आहार-बिहार करना चाहिए। खान पान के लिए जीवन नहीं है। पर जीवन के लिए खान-पान है। इस सूत्र को याद रखना चाहिए। त्र

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