Sun. Nov 18th, 2018

नहीँ आरजू कोई दौलत-ए-जहाँ की… मुहब्बत की तेरी  नज़र चाहती हूँ

दुआओं का तेरे असर चाहती हूँ 
जीवन मॆं मैं कुछ अगर चाहती हूँ ॥

मिले ना मिले जो भी अपना मुकद्दर !
साथ जिसमें हो तू वो सफर चाहती हूँ ॥

नहीँ आरजू कोई दौलत-ए-जहाँ की…
मुहब्बत की तेरी  नज़र चाहती हूँ ॥

जाकर रुके जो तेरे ही दर पे…
वही मेरे मालिक  डगर चाहती हूँ ॥

कहे मुझको रब माँग ले वर कोई तू !
“ग़ज़ल” तुझको सारी उमर चाहती  हूँ ॥

दुआओं का तेरे असर माँगती हूँ !
जीवन मॆं मैं कुछ अगर चाहती हूँ ॥

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