Sun. Nov 18th, 2018

नारी , न्याय और हमारा समाज

संजय यादव

१४ सितम्बर

नारीको अपनी लड़ाई ख़ुद ही अकेले लड़नी पड़ रही हैं । अब तो हालात इतने खराब हो गए हैं, हमारा समाज का स्तर इतना गिर गया हैं कि स्त्री को अपनी गरिमा और इज्जत की रक्षा के लिए निर्वस्त्र होकर लड़ना पड़ रहा हैं । कुछ ही दिन पहले एक युवती  निर्वस्त्र होकर इस असंवेदनशील समाज को दिखा रही है कि देखो  तुम्हारा स्तर कितना नीचे गिर चुका हैं । अाम जनता इस सरकार अाैर समाज से पूछना चाहती है कि क्या केवल महिलाएं अकेले अपनी गरिमा के लिए लड़े , हम पुरुष जो  समाज का ही एक हिस्सा हैं ये महिलाएं हमारी बहनें हैं, बेटी हैं , बहू है, माँ हैं हमारे ही परिवार और समाज का हिस्सा हैं क्या हमें जरूरत महसूस नहीं होती है कि हमे भी बाहर निकल कर अपने पुरुष दंभ को छोड़कर उनके साथ उनकी गरिमा के लिए लड़ना चाहिए ? या हाँ यह हो सकता है कि “हमने अपनी लड़ाई अलग अलग कर ली है। बलात्कारियों का पता चलने के बाद भी जिस तरह सरकार अनसुनी और अनदेखी कर रही हैं उसे साफ पता चलता हैं कि हमने मानवता को भी महिला और पुरुषों में बाट दिया हैं । कैसी सुशासन की बात करते हैं हमारे प्रधानमंत्री जी ; जहाँ बलात्कारी सरेआम घूम रहा हैं और पीड़ित परिवार वाले न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं। आजकल जिसतरह अखबारो में दिन प्रति दिन बलात्कार की घटनाएं पढ़ने को मिलती है उससे  आत्म ग्लानि महसुस होती हैं कि किस तरफ हमारा समाज जा रहा है और हमारे समाज के बुद्धिजीवी लोग मौन क्यों हैं ।कही न कही  हमारी मौनता इस जघन्य अपराधों का समर्थन ही कर रही हैं। कब तक छोटी छोटी बच्चियाें के अस्तित्व के साथ खिलवाड होता रहेगा और हमारी सरकार हाथ मे हाथ रखे बैठी रहेगी । मैं यह पूछना चाहता हूँ धर्म और संस्कृति की जरूरत क्यों पड़ी  इसलिए कि एक समाज का सही निर्माण  हाेसके अाैर और समाज को नियंत्रित किया जा सके जिससे हर मनुष्य गरिमा से जी सके ।हम विश्व के किसी भी धर्म और संस्कृति को खोल कर पढ़ ले तो हमे यही सीखने को मिलेगा की हमे महिलाओं की इज्जत करनी चाहिए। परन्तु हम क्या करते हैं , हम मंदिर में देवी की पूजा कर रहे है परन्तु बाहर समाज मे स्त्री को निर्वस्त्र करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इसका केवल एक ही अर्थ हो सकता हैं कि धर्म को केवल कर्मकांड और आडंवर से जोड़ दिया हैं उसे अपने जीवन तथा सोच में नही उतारा हैं । अाइए हम सभी यह प्रण लें कि नारी सिर्फ भाेगने की वस्तु नहीं है बल्कि वह भी इंसान है अाैर उसे भी सम्मान से जीने देने का हक मिलना चाहिए । इसके लिए हम सबकाे एकजुट हाेकर अागे अाने की अावश्यकता है । 

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

2
Leave a Reply

avatar
2 Comment threads
0 Thread replies
1 Followers
 
Most reacted comment
Hottest comment thread
1 Comment authors
janak Recent comment authors
  Subscribe  
newest oldest most voted
Notify of
janak
Guest

great article , samay sandarvik …. keep it up

janak
Guest

Nice article sanjay jee , keep it up …..बहू है, माँ हैं हमारे ही परिवार और समाज का हिस्सा हैं क्या हमें जरूरत महसूस नहीं होती है कि हमे भी बाहर निकल कर अपने पुरुष दंभ को छोड़कर उनके साथ उनकी गरिमा के लिए लड़ना चाहिए ? या हाँ यह हो सकता है कि “हमने अपनी लड़ाई अलग अलग कर ली है।