Sat. Nov 17th, 2018

नियम बनने से नहीं होगा नीयत सही होनी चाहिए

amar moktan
अमर मोक्तान,राजनीतिक विश्लेषक

अमर मोक्तान , नेपाल हमेशा से धर्म, परम्परा और जाति के नाम पर राजनीति करता आया है उच्च जाति हमेशा से सामने रही है । मैं एक महाभारत का प्रसंग कहना चाहूँगा । महाभारत में एक पात्र है बर्बरीक । कृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ा तो पाण्डव के लिए मुश्किल हो जाएगी । इसलिए उन्होंने रास्ते में ही उसका सर काट दिया । तब र्बबरीक ने कहा कि मैं भी कौरवो की तरफ से नहीं लड़ना चाहता था इसलिए आपके सामने आया और आपके ही हाथों मैं मर कर मुक्ति पाना चाहता हूँ, पर मेरी एक अभिलाषा है कि आप मुझे वरदान दें कि मैं महाभारत का यह युद्ध आद्योपान्त देख सकुँ । जब युद्ध समाप्त हुआ तो पाण्डव गर्वोन्नत होकर लौट रहे थे । उन्होंने आकाश में एक सर कटी लाश को झूलते देखा । तब कृष्ण ने उन्हें कहा कि इसे प्रणाम करो यह महान योद्धा बर्बरीक है और इसने आद्योपान्त महाभारत का युद्ध देखा है । तो पाण्डव उससे पूछने लगे कि मेरे अस्त्र शस्त्र के कमाल को तुमने देखा ? इस पर वह अट्हास कर उठा । इस पर पाण्डव ने पूछा कि तुम क्यों हँस रहे हो ? तब वह बोला कि मैंने कुछ नहीं देखा सिवाय सुदर्शन चक्र के । तात्पर्य यह कि आज भी कुछ वर्ग ऐसे हैं जो गर्वोन्नत हैं । उन्हें लगता है कि यह देश सिर्फ उनका है और वही उसे चला सकते हैं । यहाँ कई ऐसे व्यक्तित्व हैं जो महान है. किन्तु उनका नाम बहुत कम लोग जानते हैं क्योंकि वो दलित हैं । मैं बहुत बार यह पूछता हूँ कि कब आपकी मानसिकता बदलेगी ? मैं यह भी सवाल करता हूँ कि आखिर संविधान सभा का विरोध क्यों ? जबकि संविधान सभा की माँग तो संवैधानिक मांग है ? तो दरअसल ये इस बात से डर रहे हैं कि अगर DSC_0038 DSC_0043 DSC_0011संविधान सभा की बात मान लेंगे तो सभी समान हो जाएँगे और तब इनकी उच्चता और वर्चस्वता खतरे में पड़ जाएगी । इसलिए इनका विरोध जारी है । जबकि अगर यह देश एक शरीर है तो इसके सभी अंगों की महत्ता समान है । पर यहाँ क्या हो रहा है कि अगर एक अंग थोड़ा सक्षम है तो वही अपने आपको देश समझ बैठा है । आरक्षण की बात करते हैं पर वह भी ऐसा जिसमें उन्हीं का भला हो  । नियम बनाए जाते हैं पर नीयत में खलल है । इसलिए नियम नहीं नीयत सही होनी चाहिए । आज संघीयता के सवाल पर जो भी मतभेद दिख रहे हैं वो बेवजह है । हमारे पड़ोसी देश भारत से हम बहुत कुछ लेते हैं । परन्तु जो इनके स्वार्थ के अनुकूल है उसे लेते हैं । पहचान को इतना बड़ा विषय बना गया है, नामकरण पर विवाद है । जबकि भाषा, संस्कृति, भौगोलिक संरचना  और इतिहास को आधार बना लिया जाय तो यह कोई समस्या ही नहीं रहेगी । यह मंथन का दौर है और मैं उम्मीद करता हूँ कि इस मंथन से कोई ना कोई अमृत जरुर निकलेगा । और अगर ऐसा नहीं हुआ तो आन्दोलन पहले भी हुआ है और आगे भी होगा ।

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