Sun. Nov 18th, 2018

निर्मल दरबार के बारे मे

पाठक पत्र

सम्पादक जी,
हिमालिनी के मई अंक में करुणा झा का लेख ‘निर्मल बाबा एक रहस्य’ पढ़ा। सर्वप्रथम तो मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह लेख है ही नहीं। लेख में लेखक की अपनी भाषा और शैली में अपने विश्लेषणात्मक विचार होते हैं। इस लेख में ऐसा कुछ नहीं है। सिर्फ टी.वी. चैनलों में संप्रेषित समाचारों को इस लेख में प्रस्तुत किया गया है।
अब बात है निर्मल बाबा की। निर्मल बाबा पर पहला आरोप यही लगाया जा रहा है कि वे एक व्यापारी या ठिकेदार थे। मुझे समझ में नहीं आता है कि इस में गलत क्या है ? सभी व्यक्ति जन्मजात संत नहीं थे, तब तक अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए कुछ काम करते थे जो निश्चय ही कोई कदाचार या दुराचार नहीं था। बाबा पर मिडिया का दूसरा आरोप है कि वे समागम से करोड़ो की राशि कमाते है। लेकिन इस बात की ओर किसी का ध्यान नहीं है कि उनके समागम जो बड़े–बडेÞ शहरों के स्टेडियम में होता है, क्या उन्हें मुफ्त में उपलब्ध होता है ? इसमें खर्च नहीं होता है ? भक्तों को अगर उन में आस्था नहीं है तो क्यों ६ महिना पहले ही समागम की बुकिंग फुल हो जाती है। अब बात है दशबंध की। बाबा जी अनेकों बार यह कह चुके हैं कि किसी भी बात के लिए मेरी ओर से कोई बाईन्डिगं नहीं है। लेकिन यह शक्तियों का नियम है। अब यह आपके ऊपर है कि आप दसबंध भेजे या नहीं। आप लाल पर्स रखें या काला। किसीको भी किसी काम के लिए कोई बाध्यता नहीं है।
बाबाजी की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे कभी भी अपने को भगवान समझकर पूजा कराने की बात नहीं कहते। बल्कि उनका कहना है कि असली शक्तिकी पूजा करो, कृपा उसीसे मिलती है, भटकनमें नहीं पड़ो। बाबजी पर अंधविश्वास फैलाने का आरोप है। लेकिन मैं तो समझती हूँ कि बा जी उल्टे अन्धविश्वास को दूर कर रहे है कि टोना टोटका नहीं करों, ग्रह रत्नों के पीछे मत भागो। सिर्फ सच्चे मन से दो मिनट ही सही सच्ची शक्ति की पूजा करों। उन पर एक आरोप यह है कि समागम में वे अपने लोगों को पैसे देकर बुलाते हैं। यह आरोप भी सरासर गलत है। मैं खुद दिल्ली समागम में सामिल हुई थी और मुझे बोलने का अवसर भी मिला था, लेकिन इसके लिए मुझे पैसे नहीं दिए गए थे। उनकी आमदनी का टैक्स सही रुप में जम्मा होता है कि नहीं इस बात की जानकारी मुझे नहीं है। अगर होता है तो ठीक है नहीं हो तो वह होना चाहिए। अंत में बिना प्रमाणिकता के किसीपर कोई ईल्जाम लगाना सरासर गलत है।
–रागिनी मिश्रा, नई दिल्ली

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