Wed. Oct 17th, 2018

नेताओं की तुलना ना तो गधे से न ही कुत्तों से और न ही गिरगिट से, भैंसों का बोलबाला है

सुरभि, बिराटनगर, २१ जून, (व्यंग्य) | बड़ा जतन मानस तन पावा, जिसको खुद के भले लगावा
नेताओं का नया सुर है, राजनीति के नाम पर दे दो बाबा आपका भला होगा । पहले भगवान के नाम पर लोग माँगते थे पर आज तो राजनीति के नाम पर भीख माँगी जा रही है । एक पद का लालच मिला और नीति गई भाड़ में । अरे हाँ भई, इन्होंने जनता का ठेका थोड़े ही लिया है । बहुत मुश्किल से मानस तन मिला है इसका सदुपयोग तो बनता है । इसलिए इनके लिए कभी राष्ट्रपति बनने का लालच कभी प्रधानमंत्री बनने का लालच बस इतना काफी है दिग्भ्रमित होने के लिए और उसके बाद तो, गई भैंस पानी में । आजकल ऐसे भी भैंसों का ही बोलबाला है । क्योंकि नेताओं की तुलना ना तो हम गधे से कर सकते और न ही कुत्तों से और न ही गिरगिट से । गधा बेचारा एक ही राग अलापता है, उसे सुर बदलना नहीं आता, कुत्ता वफादारी की मिसाल है और गिरगिट भी तय वक्त पर ही रंग बदलती है । इसलिए भैंस ही सही है, भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय । फिर तो चाहे दुनिया इधर की उधर क्यों ना हो जाय उसे कोई फर्क नहीं पड़ता ।

हाँ तो यहाँ बात हो रही थी राजनीतिक ठेकेदारों की जिनके लिए कुछ भी बुरा नहीं होता । अब देखिए ना कल तक जो दुश्मन थे आज दोस्त बन गए । कभी माओ का दामन थामो कभी एमाले का तो कभी काँग्रेस का । बस सूघँते रहते हैं हड्डी किधर है । पर ये भूल जाते हैं कि हड्डी चबाते चबाते कुत्ता खुद अपने लहु का ही स्वाद लेता है और समझता है कि उसे गोस्त मिला है । ओह जाने दीजिए जनाब अगर इतनी समझ होती तो ये नेता क्यों बनते ? इनके तो वारे न्यारे हैं । कभी पति के मौत के मुआवजे में पद मिल जाता है तो कभी उसकी यादों के एवज में मिल जाता है । अचानक एक रात में नीति भी बदल जाती है और नजरिया भी । जय हो पद मोह की और जय हो राजनीति बाबा की । राजनीति ने अब समाज सेवा से अपना इस्तीफा दे दिया है । अब यह शुद्ध रुप में ठेकेदारी बन गई है । जहाँ अच्छी आमदनी वहाँ अपनी गद्दी । सही भी है पहले आत्मा फिर परमात्मा । जैसे ठेकेदारी एक व्यवसाय है ठीक वैसे ही राजनीति भी एक व्यवसाय बन गई है । व्यवसाय का अर्थ कुछ न कुछ निर्माण करने वाली संस्था या व्यक्ति या व्यक्ति समूह से है, जो किसी कार्य को करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया के तहत अधिकृत किए जाते हैं जिसके बदले में वे पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं।
बस यही हाल हमारे नेताओं का भी है । आजकल तो यह व्यवसाय भगवान की कृपा से कुछ अधिक ही फलफुल रहा है । अब नमूना देखिए एक नेता जो मसीहा बन कर उभरे जिनकी बुनियाद इसी से बनी अचानक उनका रंग बदल गया और अब वो जिनके मसीहा थे उनके सपनों की ही कब्र खोद रहे हैं । पर कोई बात नहीं भला हो इनका, मसीहा नहीं बन पाए तो क्या ठेकेदार तो बन गए । इसी श्रेणी में एक और महाशया हैं जिन्हें अचानक उस दल पर इतना प्यार उमड़ा है कि मत पूछिए । आज तो गोली वाली बोली में इन्हें इतना शहद दिख रहा है कि बस चासनी ही चासनी । डुबकी लगाते रहो और कल जिसके पक्ष में थे उसे गरियाते रहो । जय हो राजनीति बाबा की । आखिर ये कौन सी घुट्टी पी कर आते हैं जो इनसे गिरगिट भी शरमाने लग जाते हैं । बच्चों को दाँत आसानी से निकले इसके लिए जन्मघुट्टी पिलाई जाती है यह तो पता है, पर नेता को तैयार करने के लिए किस घुट्टी का इस्तेमाल होता है यह समझ पाना मुश्किल लग रहा है । वैसे यह भी एक अच्छा व्यापार हो सकता है क्यों ना बेरोजगारी के इस दौर में एक भट्टी लगाई जाय जहाँ बेमिसाल नेताओं को तैयार करने की घुट्टी बनाइ जाय । यकीन मानिए यह बिजनेस जमेगा जरुर एक बार आजमा ही लिया जाय । (व्यंग्य)

सफल राजनीतिज्ञ वह, जो जन-गण में व्याप्त
जिस पद को वह पकड़ ले, कभी न होय समाप्त
कभी न होय समाप्त, घुमाए पहिया ऐसा
पैसा से पद मिले, फिर मिले पद से पैसा
कहं काका, यह क्रम न कभी जीवन भर टूटे
वह नेता है सफल और सब नेता है झूठे।

  • काका हाथरसी 

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of