Mon. Nov 19th, 2018

नेपाली तन में पाकिस्तानी मन : अजय कुमार झा


अजय कुमार झा, जलेश्वर | भारत और नेपाल केवल पड़ोसी देश नहीं हैं बल्कि इनका सदियों पुराना नाता है जो इन्हे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, और धार्मिक रूप से जोड़ता है।
*नेपाल से भारत का रिश्ता रोटी और बेटी का है। जिसका आधार मधेसी और गोरखाली हैं। जो की नेपाल और भारत को कभी शत्रु के रुप में नहीं देख सकता। भले ही तथाकथित राष्ट्रवादी भारत से नेपाल की दुरी बढाने का असफल प्रयास करे। आम जनता भारत और नेपाल को शारीर और आत्मा के रुप में देखती है। वैसे सरकारी स्टार से भी सदियों से इस रिश्तों की परंपरा को दोनों देशों ने निभाया है। भारत-नेपाल के बीच कोई सामरिक समझौता नहीं लेकिन नेपाल पर किए गए किसी भी आक्रामण को भारत बर्दाश्त नहीं कर सकता।जिस प्रकार डोकलाम से चीनी घुसपैठ और षडयंत्र को भारत ने निष्फल कर दिया वही अवस्था नेपाल में घुसपैठ करने की सोच रखनेवाले किसी भी देस के साथ भारत करेगा।
*1950 से लेकर अब तक नेपाल में जो भी समस्याएं आई भारत ने उसको उनको अपना माना और भरपूर साथ दियाभारतीय नेपाली या भारतीय गोरखा वह लोग हैं जो नेपाली मूल के लोग हैं लेकिन भारत में रहते आ रहें हैं, जिन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त है। वह लोग नेपाली भाषा के अलावा भी कई भाषाएं बोलते हैं, नेपाली भाषा भारत के कार्यालयी भाषाओं में से एक है। ठीक इसी प्रकार नेपाल के दक्षिणी भूभाग में रह रहे लगभग 1.5 करोड़ भारतीय मूल के नेपाली नागरिक नेपाल में रह रहे हैं। जिनकी मूल भाषा हिंदी, मैथिली,भोजपुरी,बज्जिका और थरुहट है। जिन्हें नेपाल में तीसरे दर्जे के नागरिक के रुपमे देखा जाता है। भारत पर लगाए जा रहे नाकावंदी के आरोप वास्तव में भारतीय मूल के नेपालियो के संवैधानिक अधिकार को हनन करने और ओझल में डालने का षडयंत्र है। मोदी को नहीं गाली दिया जा रहा है ; वास्तव में मधेसी को गाली दिया जा रहा है। वह जानता है की अब उसके हाथों से सत्ता खिसकने लगा है। और मधेसियों को अब जादा दिन तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता। वास्तव में मधेश वह उर्वरा भूमि है, जिसको विकसित होने में चन्द महीने लगेङ्गे। यदि भारत ठान ले तो। बस! भय यही से शुरू होता है। कहावत है: खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे। यही हाल यहाँ के खस समुदायों का है। हिमालय की महिमामयी भूमि में इतने क्षुद्र लोगों को देख पर्वतराज हिमालय भी शर को झुका लिए होंगे! भगवान प शुपति नाथ को लग गया होगा की , ए लोग पशु ही रह गए। भला वानाशुर को कृष्ण से प्यार भी हो तो कैसे!
इन मूढो को कौन समझाय की मनीषा कोइराला चीन में नायिका नहीं बन सकती। उदित नारायण चिनिया गायक नहीं हो सकते। पशुपति नाथ के दर्शन करने आनेवाले शैलानियों का झुण्ड पाकिस्तान और चीन का नहीं हो सकता। घर घर में देखे जानेवाले टी भी सीरियल और फिल्म चीनी नहीं हो सकता। नेपाली भाषा पाकिस्तानी और चीनी लोग नहीं समझते। बुद्ध को जानने के लिए भी भारत ही जाना होगा। महावतार बाबा,पायलट बाबा,ओशो,जे कृष्णमूर्ति,श्री श्री रवि शंकर,बाबा रामदेव लगायत के संत पाकिस्तान में नहीं मिलेंगे। पतंजलि,चरक,सुश्रुत,चार्वाक,वेदव्यास,कणाद,याज्ञवल्क्य, गार्गी, कालिदास,मम्मट, अष्टावक्र, जनक, सुखदेव, रविन्द्रनाथ टैगोर, बाल्मीकि, तुलसीदास, विवेकानन्द…… जैसे लाखों दिव्यात्माओं को कहाँ से लाओगे? ध्यान से समाधि तक का यात्रा क्या आत्मघाती आतंक के शिरमौर से प्राप्त होगा! कणकण में रमण कर रहें राम , जिस को पाना हामारा परम लक्ष्य है। उसको क्या अनुवम में खोजो गे! कृष्ण की वांशुरी का धुन और भक्ति का महारास क्या काश्मीरी पत्थर बाज और मोर्टार में मिलेगा! याद रहे अब भगवान बुद्ध के वर्त्तमान प्रतिनिधि बुद्ध श्री दलाईलामा भी अब तिब्बत में नहीं भारत में ही मिलेङ्ग्गे। चीन में बुद्ध के लिए कोई स्थान नहीं है। और बुद्ध ज्ञान का वह हिमालय हैं जिनका जन्म नेपाल में हुआ था। क्या इसे भी खो दोगे। एक मधेशी को अपमानित करने में पूरी संस्कृति और ऐतिहासिकता को कलंकित करना होगा। जिस आर्यावर्त भरतखण्ड को स्वयं परमात्माने सिर्जना किए हैं, उसको विधर्मियों के हाथों में सौपकर अपनी संस्कृति और पूर्खा को कलंकित कर भास्माशुर मत बनो।

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