Sat. Apr 20th, 2019

नेपाली पाठकों के लिए दूसरी सम्पर्क भाषा जैसी है हिन्दी : मनप्रसाद सुब्बा

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हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 |नेपाली भाषा और हिन्दी भाषा मे एक–आपस में सिर्फ सामीप्य ही नहीं बल्कि सगे भाई–बहन का रिश्ता भी है । हम सभी जानते हैं कि दोनों भाषाओं के पूर्वज एक ही हैं । लेकिन सदियों के विकासक्रम के दौरान दोनों भाषाओं ने अपने–अपने चरित्र विकसित करते हुए अलग–अलग पहचान बना ली है । नेपाल की उत्तरी और पूर्वी सीमा तिब्बती–बर्मी भाषा के प्रभुत्व वाले देशों से होने के कारण उन भाषाओं का प्रभाव भी नेपाली भाषा पर पड़ना स्वभाविक ही है । आध्ुनिक नेपाल के अंदर भी अनेकों जाति–जनजातियों की भाषा अधिकतर तिब्बती–बर्मी मूल की ही है । सत्रहवीं शताब्दी में जब पृथ्वीनारायण शाह ने राज्य विस्तार का ऐतिहासिक अभियान चलाया तो नेपाली भाषा भी विजीत जाति–जनजातियों की भाषाओं के सम्पर्क में आकर प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकी ।

आज नेपाली भाषा की अपनी एक विशिष्ट पहचान ही नहीं बल्कि विश्व की उन्नत और समृद्ध भाषाओं में नेपाली भाषा को भी एक माना जाता है । इस भाषा में लिखे हुए साहित्य के भण्डार को कतई कम नहीं कहा जा सकता । पिछले सौ सालों में इस भाषा में कापफी उत्साह से नेपाली साहित्य का भण्डार भरने का काम हुआ है । इस भण्डार में कई विश्वस्तर की साहित्य रचना पायी जाती हैं । विगत आठ दशकों का नेपाली साहित्य को देखे तो लगता है कि नेपाली साहित्य बड़ी छलांग मारते–मारते आज के विश्वस्तर की उत्तर आधुनिक तथा समकालीन साहित्य रचना से कंध मिलाते हुए दिखाई देता है । आज के विश्व साहित्य से रु–ब–रु होते हुए भी नेपाली साहित्य ने अपनी पृथक होने की पहचान नहीं खोई है । नेपाली साहित्य नेपाली मिट्टी अर्थात् नेपाली संस्कृति की गंध से अलग नहीं है ।

नेपाल की चार सीमाओं में से तीन सीमाएँ भारत से सटी हुई हैं । इस भौगोलिक अवस्था का बड़ा प्रभाव नेपाली संस्कृति और भाषा पर दिखाई देता है । वैसे तो हिन्दी साहित्य का प्रभाव नेपाल के लेखकों में कम नहीं दिखाई देता । अधिकतर नेपाली पाठकों के लिए दूसरी संपर्क भाषा जैसी है हिन्दी भाषा । इसीलिए नेपाली भाषियों के लिए हिन्दी पत्रिकाएँ, हिन्दी साहित्य पढ़ना सामान्य बात है । हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों के बारे में नेपाली साहित्यिक वर्ग थोड़ी–बहुत जानकारी रखते ही हैं । लेकिन विडम्बना यह है कि हिन्दी साहित्यकारों को नेपाली साहित्य के बारे में बहुत ही कम जानकारी है । अपने सबसे करीबी पड़ोसी देश होते हुए भी उसके साहित्य के बारे में इतनी कम जानकारी होने के पीछे क्या–क्या कारण हो सकते हैं ? इस प्रश्न का सबसे पहला कारण होगा कि नेपाली साहित्य का हिन्दी भाषा में अनुवाद होने की कमी । इसके अलावा और भी कई कारण हो सकते हैं । लेकिन अभी उस तरफ न जाते हुए मैं अपनी बात अनुवाद तक ही सीमित रखता हूँ । अधिकतर नेपाली लेखक–सर्जक हिन्दी साहित्य सीधे हिन्दी में ही बिना अनुवाद के माध्यम पढ़ते हैं, पढ़ सकते हैं जबकि हिन्दी पाठकों को नेपाली में लिखे हुए साहित्य को समझने के लिए अनुवाद का सहारा लेना पड़ता है और नेपाली साहित्य का जितना अनुवाद हिन्दी में होना चाहिए था उतना हुआ ही नहीं । जब तक नेपाली भाषा के स्तरीय साहित्यों का अनुवाद हिन्दी भाषा में नहीं होगा तब तक हिन्दी पाठकों के लिए नेपाली साहित्य अनसुनी कहानी, अनकही बात–सी लगेगी ।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाली भाषा सिर्फ नेपाल की ही भाषा नहीं है । भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त प्रमुख भारतीय भाषाओं में से एक नेपाली भाषा भी है । इससे भी पहले साहित्य अकादमी द्वारा इस भाषा को मान्यता दी गई थी और हर साल पिछले बयालीस सालों से इस भाषा में लिखे हुए उत्कृष्ट नेपाली साहित्य को अकादमी पुरस्कार दिया जाता रहा है । लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि नेपाली भाषी भारतीय कवि–लेखकों को कई राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में नेपाल से आए हुए अतिथियों की तरह देखा–समझा जाता है । मैं खुद भी इस बात का भुत्तभोगी हूँ । कई ऐसे लोगों से भी सामना हुआ है जो भारत की हिन्दी से इतर आंचलिक भाषाओँ को छोटी भाषा समझते हैं । इसी साल मार्च माह में विश्व कविता दिवस के अवसर पर साहित्य अकादेमी द्वारा दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में भारतीय–नेपाली भाषी कवि के रूप में मैंने चार–पाँच कविताएँ पढ़ी थी और एक–दो कविताओं के लिए श्रोताओं से मुझे वाहवाही भी मिली । सत्र के बाद चायपान पर मैं ब्रजेंद्र त्रिपाठी जी से कुछ बातें कर रहा था तो एक श्रोता हमारे नजदीक आए और मुझे संकेत करते हुए ब्रजेंद्र जी से बोले – ‘छोटी भाषा में भी इतनी सशक्त कविता लिखी जाती हैं, आज पता चला’ ब्रजेंद्र जी तपाक से बोले – ‘कोई भी भाषा छोटी–बड़ी नहीं होती… बोलने वालों की संख्या अधिक होने से भाषा बड़ी नहीं होती…नेपाली भाषा का भी अपनी समृद्ध साहित्य है… !’ उस आदमी को देखकर मैं चुपचाप मुस्कुराता रहा । मेरी तरफ से ब्रजेंद्र जी ने ही जवाब दे दिया था । जो भी हो, अनुवाद सबसे बड़ा माध्यम है एक–दूसरे के साहित्य और संस्कृति को जानने व समझने के लिए । नेपाली साहित्य, चाहे वो नेपाल का हो या भारत के नेपाली भाषियों का हो, उनका पर्याप्त अनुवाद हिन्दी में होना अत्यन्त आवश्यक है जिससे हम एक–दूसरे के और भी करीब आ सकते हैं ।
मनप्रसाद सुब्बा, (दार्जिलिंग भारत, लेखक साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि हैं)

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