Tue. Oct 23rd, 2018

नेपाली भाषा से अनूदित ‘अन्तिम भोज’

विजय मल्ल:अंधकार, निर्जन, डरावना और एकान्त जंगल को पार करते-करते अकस्मात मैं एक ऐसी जगह पहुँचा, जहाँ उजाला ही उजाला था । मैं आनन्द से एकदम प्रफुल्लित हो उठा । सारे दुख दर्द को भुलाकर मैं दौडÞते हाँफते उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ मनुष्य का मक्खन जैसा स्नेह मेरा इंतजार कर रहा था । मुझे मनुष्य का चेहरा देखे काफी वक्त हो गया था, इसलिए मैं बैचेन था ।
वह स्थान बहुत रमणीक था । एक बडÞे भोज का वहाँ आयोजन था । यत्र तत्र रंग बिरंगी, नीली पीली, लाल हरी बत्तियाँ जल रही थीं । बहुत बडÞा मैदान जिसके चारो ओर कलापर्ूण्ा बगीचा उस उजाले में जगमगा रहा था । विभिन्न प्रकार के रंगबिरंगे फूल खुश्बू फैलाते हुए खिले थे और उससे भी बढÞकर विभिन्न रंगों की पोशाक में पुरुष और महिलाओं की बडÞी जमात उस स्थान पर इधर-उधर कर रही थी । वे उन सुगन्धित फूलों से भी अधिक आकर्ष लग रहे थे । मुझे ऐसा लगा मानो र्स्वर्ग का ही एक टुकडÞा धरती पर आ गिरा हो । मैं विमोहित होकर नजदीक पहुँचा ।
हरी कोमल दूब बिछे चौडÞे क्षेत्र में श्रेणीबद्ध रूप में टेबुल, बेंच और कर्ुर्सियाँ बिछी थीं और प्रत्येक टेबुल के मध्य में गुलदस्ते में रखे फूल मुस्कुरा रहे थे । हर टेबुल के नजदीक सादी पोशाक में एक दो बैरे ट्रे में खाने की चीजें लेकर खडÞे थे । कुछ इधर-उधर घूम रहे थे । मुझे अत्यन्त भूख लगी थी ।
इसलिए भोज होने की बात का ज्ञान होते ही मैंने लाज शर्म छोडÞकर उस परिसर में प्रवेश किया । नजदीक जाने पर मुझे पता चला कि ये लोग लम्बाई, भाषा बोली, रंग रूप के आधार पर एक ही प्रकार के नहीं हैं । कोई अमेरिकन जैसा लगा तो कोई रूसी जैसा, कोई जर्मन, कोई चीनी, कोई भारतीय, कोई अप|mीकन न्रि्रो, कोई इजीप्सियन, कोईर् इरानी, कोई आइसलैंडियन तो कोई ब्रिटिश जैसा । समस्त संसार के जातियों के मनुष्य म्यूजियम में सजाकर रखे जाने की तरह वहाँ मौजूद थे । मैंने उन्हें विहंगम दृष्टि से देखा और चकित होकर उनके बीच पहुँचा । विश्व के सम्पर्ूण्ा राष्ट्रों के मनुष्यों के इस जमघट में मुझ जैसे लोगों का पहुँचना तो एक बडÞा त्योहार की ही तरह था । इसलिए भोज में निमंत्रण न होने के बावजूद भी मैंने संकोच नहीं माना और उसमें सहभागी हो गया ।
यही कारण था कि मेहमानों के बीच सहज होने में मुझे कठिनाई हो रही थी । एक सुन्दर महिला जिसका आधे वक्ष नग्न थे, मेरा हाथ पकडÞकर दूसरी ओर मुझे खींचते अँग्रेजी भाषा में बोली, ‘लो एक नए देश से एक नवागन्तुक आ पहुँचा ।’ फिर मुझसे पूछा कि ‘तुम किस देश से हो -‘
मैंने कहा, ‘नेपाल से ।’
वह मुझे प्रत्येक टेबुल पर ले गई और विभिन्न भाषाओं में मेरा परिचय कराया । मैंने सबसे हाथ मिलाया और उनका अभिवादन किया । कहना नहीं होगा कि वहाँ समूचे राष्ट्र के विशिष्ट और प्रसिद्ध लोग जमा हुए थे । बडÞे बडÞे नेता, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कवि, लेखक, गायक, नर्तकी, कुलपति, वैज्ञानिक, प्राध्यापक, उद्योगपति, प्रबन्धक आदि । उनके बीच मैं स्वयं को बौना महसूस कर रहा था । इसके बावजूद मैं खडÞा था ।
अन्त में उसने मुझे एक ऐसे टेबुल पर बिठाया जहाँ पहले ही से तीन चार लोग बैठे हुए थे । उसने कहा, ‘इसी टेबुल पर बैठ कर हम आज के अन्तिम भोज का आनन्द लें । लो यह ब्रान्डी से भरा गिलास ।’ मैंने हाथ में गिलास ले लिया और उसे आत्मीय समझ विना शर्म पूछ बैठा, ‘कृपया बताएँ आज यह किस उपलक्ष्य में भोज है -‘ आर्श्चर्यचकित होकर विस्फारित आँखों से मुझे देखते हुए हँसते हुए उसने दूसरे से कहा, ‘देखो यह कैसा अनूठा आदमी है । यह पूछ रहा है आज कैसा भोज है -‘ मेरी ओर आर्श्चर्यचकित निगाहों से देखते हुए उसने फिर पूछा, ‘क्या सच में तुम्हें नहीं पता कि आज किस लिए यह भोज है -‘ मैंने शरमाते हुए उत्तर दिया, ‘मैं तो घुमते घुमाते यहाँ आ पहुँचा, मेरे पास तो निमंत्रण पत्र भी नहीं है । क्या करुँ मैं चला जाउFm -‘ मैं शर्म से पानी पानी हो गया । क्योंकि रंगेहाथ पकडÞे गए चोर की तरह मेरी स्थिति थी ।
उसने झटपट कहा, ‘नहीं नहीं तुम्हें पता नहीं है तो क्या हुआ – सुनो मैं तुम्हें बताती हूँ,  आज यह विश्व का अन्तिम भोज है । इस तरह का भोज पृथ्वी पर कभी नहीं हो पाया । आज की रात के बाद पृथ्वी पर फिर कभी रात नहीं होगी । अब समझ में आया -‘
मैंने सिर हिलाकर हामी भरी । मेरे मस्तिष्क में मात्र निमंत्रणपत्र घूम रहा था । अगर निमंत्रणपत्र होता तो मुझे इस तरह लज्जित नहीं होना पडÞता ।
लेकिन वह उल्लसित होते हुए कहती चली गई, ‘इस पृथ्वी पर अब कभी रात नहीं होगी । यही अन्तिम रात है । यहाँ संसार के समस्त राष्ट्रों के पदाधिकारियों के साथ महान व्यक्तिगण एक अभियान और एक उद्देश्य को लेकर जमा हुए हैं । ऐसी सहमति विश्व के राष्ट्रों में इससे पहले कभी नहीं देखी गई । यह एक अनुपम घटना है । यह अनुपम घटना पृथ्वी पर फिर कभी नहीं दुहर्राई जाएगी । समझे – सुबह होने से पहले यहाँ उपस्थित बडÞे बडÞे राष्ट्रें के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अपने अपने देश में ऐसे परमादेश भेजेंगे कि उनके देशों के सम्पर्ूण्ा आणविक शस्त्रास्त्र और अणुबम एक ही समय में एक ही बार विस्फोट कर दिए जाएँगे और पृथ्वी के टुकडÞे-टुकडÞे कर दिए जाएँगे । इसका अन्त हो जाएगा । मनुष्य को पृथ्वी पर बडÞी विजय मिलेगी । इसलिए आज की एक मात्र अन्तिम रात में इस प्रीति भोज का आयोजन किया गया है । आज हम सब इस महान भोज में विजयोत्सव मनाएँ ।’
वह शराब का प्याला गर्व से अपने होठों तक ले गई और सबने गम्भीरतापर्ूवक ऐसा ही किया । लेकिन मैं गिलास नहीं उठा पाया । कैसे मैं पृथ्वी के अन्त पर विजयोत्सव मना सकता हूँ – अन्ततः मैं गिलास वहीं फेंक कर भागने लगता हूँ । कल सूर्योदय होने से पहले पृथ्वी का र्सवनाश होगा, यह बात मेरा पीछा कर रही है । मैं भूखा दौडÞ रहा हूँ । मेरी प्यारी धरती कल नहीं रहेगी ! उफ ! कल नहीं रहेगी ! मैं मिट्टी सूँघ कर भागता हूँ ।
-साभारः लोकप्रिय नेपाली कहानियाँ, अनुवाद ः कुमार सच्चिदानन्द सिंह)

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