Sat. Oct 20th, 2018

नेपाल के जनमानस पर “राम चरित मानस” का प्रभाव

नेपाल और भारत हिन्दू बहुल राष्ट्र हैं। यहाँ के अधिसंख्यक लोग हिन्दुत्व में विश्वास रखते हंै। हिन्दुत्व और हिन्दी में नख और मांस जैसा सम्बन्ध रहते आया है। हिन्दी भाषा की जननी संस्कृतभाषा होने के कारण रामचरितमानस पर बाल्मिकी रामायण का अमिट छाप पडÞना स्वाभाविक है। हिन्दी का भक्ति-काव्य विश्व साहित्य की अमूल्य निधि है। गोस्वामी तुलसी दास सन्त थे। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी उन्होंने लोक भाषा अवधि में रामचरितमानस की रचना की। नेपाल में प्रथम सिद्ध सन्त कुक्कुरीपा का जन्म ८४र्०र् इ. में कपिलबस्तु में हुआ था। उनके द्वारा रचित कुछ रचनाओं का जिक्र आया है। दाङ में साढे ६ सौ वर्षपहले राजा रत्नसेन हुए, जो बाद में रत्ननाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। उनकी कृति ‘रत्नबोध’ के नाम से प्रसिद्ध है। जनकपुरधाम स्थित जानकी मन्दिर के संस्थापक महंत महात्मा सूर किशोर दास जी ने सवा तीन सौं वर्षपर्ूव ‘मिथिला विलास’ की रचना की थी। नेपाल राज्य के संस्थापक पृथ्वीनारयाण शाह द्वारा रचित हिन्दी में लिखित पद्य यत्र-तत्र पाए जाते हैं। पर्ूर्वी नेपाल में पहाडी इलाके में दो सौ वर्षपहले जोशमणि नाम के सन्त सम्प्रदाय की श्रेष्ठ हिन्दी रचनाएँ बडÞी मात्रा में उपलब्ध हर्ुइ है। नेपाल के शाह वंशी अनेक राजाओं ने स्वयं हिन्दी भाषा में अनेक पद्य रचनाएं की हैं।

नेपाल के जनमानस पर “राम चरित मानस” का प्रभाव

आधुनिक काल में भी मोतीराम भट्ट से लेकर लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, केदारमान व्यथित, विश्वेश्वरप्रसाद कोईराला, धुस्वां सायमी, भवानी भिक्षु, डा. शिवशंकर यादव आदि की हिन्दी रचनाएं गुण और परिमाण से भी नेपाल को सदा हिन्दी साहित्य के लिए उर्बर भूमि सिद्ध करते हैं। ललित साहित्य के अतिरिक्त वैचारिक साहित्य, अभिलेख, समाचार पत्र, व्यापार, मनोरंजन तथा समाचार पत्रों के क्षेत्र में नेपाल में हिन्दी का व्यापार खूब हुआ और आज भी हो रहा है। क्योंकि हिन्दी नेपाल तर्राई के सभी क्षेत्रों में सामान्य मातृ भाषा की भाँति व्यवहार में आती है। साथ ही पहाडÞी क्षेत्र के साथ-साथ तर्राई तथा भारत एवं अन्य र्सार्क देशों के साथ सर्म्पर्क भाषा का काम कर रही है। नेपाल में शिक्षा के विकास तथा प्रजातान्त्रिक पुनर्जागरण में हिन्दी भाषा साहित्य का योगदान महत्त्वपर्ूण्ा रहा है। पुरानी पिढी के साहित्यकारों, नेताओं के साथ साथ आधुनिक शिक्षा के प्रमुख स्रोत वाराणसी, पटना, लाहोर, लखनऊ, दिल्ली और कलकत्ता के विश्व विद्यालय रहे हैं। बनारस तो एक प्रकार से नेपाल का शैक्षिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक मातृ विद्यापीठ ही रहा है। हिन्दी भाषा और साहित्य का प्रभाव नेपाल के जनमानस के संस्कार में गहर्राई तक पैठ रखता था और वह स्थिति अभी तक बरकरार है।
गहर्राई से देखा जाए तो कवि हृदय के लिए हिन्दी, नेपाली और मैथिली तीनों भाषाएं अपनी कोमल कान्त पदवाली न्यौछावर करती आ रही है। हिन्दी बडÞी बहन है तो नेपाली छोटी बहन। गोस्वामी तुलसी दास विरचित रामचरितमानस पिछले ५-६ सौ वर्षों से भारतीय जन मानस को तो प्रेरित और प्रभावित करती ही रही है तो उसके पडÞोसी देश नेपाल के जनमानस को भी उसी रूप से प्रभावित करती आ रही है। तुलसी दास के समय में भारतीय उपमहाद्वीप मुस्लिम आक्रमणों से आक्रान्त था। धर्म परिवर्तन कराए जा रहे थे, धर्मग्रन्थ जलाया जा रहा था, मन्दिर तोडेÞ जा रहे थे। चारों तरफ भय का वातावरण था। उस समय में नेपाल भी अनेक छोटे-छोटे राज्य खण्डों में विखरा हुआ था। बाहृय आक्रमण और आन्तरिक द्वन्द्व के कारण हिन्दुत्व पर खतरा उत्पन्न हो गया था। स्व्ााभिमानी राजपूत युद्ध में मारे गए या पलायन कर गए। उनकी स्त्रियां जौहर को प्राप्त हर्ुइ तो शेष राजपूत विजेताओं के साथ घुल मिलकर रहने में ही अपनी भलाई समझकर उनके साथ हो लिए। संरक्षण के अभाव में आम जनमानस में बेचैनी फैलने लगी। उसी समय में भक्ति साहित्य का प्रार्दुभाव हुआ। उसी समय में तुलसी दास ने लोक रक्षक के रूप में अवतारी पुरुष श्रीराम को आराध्य देव स्वीकार कर रामचरितमानस की रचना की। अपने समकक्षी सूरदास के आग्रह पर वे एक बार वृन्दावन गए और वहाँ के एक मन्दिर में अद्भुत छवियुक्त भगवान श्रीकृष्ण की मर्ूर्ति के सामने खडेÞ हो गए। श्रीकृष्ण के लोकरञ्जक रूप को देखकर उनके मुख से उनके हृदयगत भाव सामने आयाः-
कहा कहौं छवि आपकी बडेÞ सजे हो नाथ।
तुलसी मस्तक तब नवे जब धनुष वाण लो हाथ।।
हे ! भगवान् अभी वाँसुरी बजाने और रास रचाने का समय नहीं है। अभी तो भयाक्रान्त लोगों के रक्षार्थ हाथ में धनुषवाण लेने का समय है। आप गरीब निवाज हो। दीननाथ हो। दीनबन्धु हो। इस नाम को र्सार्थक करो।
भगवान शिव की क्रीडÞा स्थली ऋषिमुनियों की तपोभूमि, प्रकृति का अनुपम सौर्न्दर्य कवित्व का स्वतः स्फुरण, देवात्मा हिमालय की सुन्दर गोद में अवस्थित नेपाल अपने को एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता आ रहा है। उसे यह मर्यादा और गरिमा प्रदान करने में वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारतादि ग्रन्थों को श्रेय जाता है। जितने भी रामायण लिखे गए हैं, उन सबों पर वाल्मीकीय रामायण का स्पष्ट छाप दिखाई पडÞता है। इसीलिए वाल्मीकि कवि को आदिकवि और उनके द्वारा रचित रामायण को आदिकाव्य के रूप मे देखा जाता है। नेपाली भाषा में नेपाली रामायण के रचयिता भानुभक्त वाल्मीकि कवि को अपना आदर्श कवि के रूप में स्वीकार करते हुए भी राम चरित्र मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास जी को अपना आदर्श और प्रेरणा के स्रोत के रूप में स्वीकार करने की बात उनके द्वारा रचित भानुभक्तीय रामायण के अध्ययन से अनुभव किया जा सकता है। भानुभक्त संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे, क्योंकि यह उन्हें विरासत में मिली थी। उनके द्वारा रचित कुछ पद्यों, दोहों और चौपाई को देखने से यह यथार्थ सामने आता है कि भानुभक्त हिन्दी भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। रामायण लिखने से पर्ूव उन्होंने लिखित रामायण ग्रन्थों का अध्ययन-मनन अवश्य किया होगा। हिन्दी और नेपाली दोनों भोरोपीय परिवार की भाषा है। जिसकी जननी संस्कृत भाषा है। यही कारण है कि नेपाली भाषा और हिन्दी भाषा के बीच सहज समीपता का सम्बन्ध हमें देखने को मिल जाता है। भानुभक्त रामायण के अनेक स्थल और प्रसंग का सूक्ष्म निरीक्षण किया जाए तो हमें स्वतः देखने को मिलेगा कि वे रामचरितमानस से कितना प्रभावित थे। भानुभक्त द्वारा लिखित रामायण आने से पहले वैष्णव धर्मावलम्बी द्वारा नेपाल के जनमानस में रामचरितमानस का प्रभाव जम चुका था। रामचरितमानस की लोकप्रियता जैसे-जैसे भारत में बढÞती गई, वैसे वैसे नेपाल में भी बढÞती गई। रामचरितमानस की लोकप्रियता से मुग्ध होकर भानुभक्त ने भी नेपाली भाषा में रामायण लिखकर घर-आँगन में पहुँचाने का संकल्प लिया होगा। यही कारण है कि आज नेपाल के पहाडÞी प्रदेश के घर आंगन में भी राम कथा का प्रचार सम्भव हो सका है। राम कथा के द्वारा राम के चरित को पावन गंगा के रूप में लोक ने स्वीकार कर लिया है। इसका श्रेय भानुभक्त को मिलना स्वाभाविक है। इसी रामायण के चलते आज वे नेपाली भाषा के आदिकवि के रूप में प्रतिष्ठा पा रहे हैं। भानुभक्त की जीवनी और उनके द्वारा रचित पद्यों के आधार पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि इनकी रामायण के प्रेरणा स्रोत रामचरितमानस और गोस्व्ाामी तुलसी दास रहे हैं। रामचरितमानस का पावन किरण भारत के साथ-साथ नेपाल में भी फैलने लगी थी। तुलसी दास संत थे-
संत न वाँधे गाँठरी पेट समाता लर्ेइ।
आगे पाछे हरि खडÞा जब माँगे तब दर्ेइ।।
पर उन्हें पर्ूण्ा विश्वास था। उन्होंने रामचरितमानस का नायक ऐसे व्यक्तित्व को बनाया है, जो आद्योपान्त अपने आदर्श को बनाए रखने में सफल रहा है। इसीलिए राम को मर्यादापुरुषोत्तम की संज्ञा दी गई है। राम ऐसे एक मर्यादा पुरुष थे, जिन्होंने माता-पिता, गुरु-पुरोहित, भाई-बन्धु, सखा-अनुचर तथा राजा-प्रजा एवं पति-पत्नी के के प्रति कर्तव्य भाव को अच्छी तरह निभाया। वे आदर्श पुरुष के रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं। तलुसी दास गुणग्राही थे। अतः उन्होंने बडÞी र्सतर्कता के साथ अपने पात्रों के द्वारा सही, वक्त पर सही चित्र उपस्थित किया है। हमारा आदर्श त्याग में है न कि प्राप्ति में। रामचरितमानस का पात्र राम और सीता त्याग की साक्षात मर्ूर्ति ही तो हैं। रामचरितमानस ने श्रीराम के अगाध चरित्र को लग-भग सभी बारीकियों के साथ समेटा है। उनकी चारित्रिक विशेषता ही भारत, नेपाल तथा विश्वजन के हृदय के प्रत्येक तार को झंकृत करने की क्षमता रखती है। क्यों न रखे, उनका स्वान्तःसुखाय विश्व हिताय के रूप में जो प्रतिष्ठित हो चुका है-
नाना पुराण गिगमागम सम्मतं यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतो ˜पि।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा-
भाषा निबन्ध यति मञ्जुलमा तनोति।।
रामचरितमानस की रचना भले ही तुलसी दास ने स्वान्तः सुखाय के हेतु किया हो लेकिन तुलसी का वह स्वान्तः सुखाय विश्व साहित्य तथा विश्व जन का ही स्वान्तः सुखाय के रूप में देखा जाता है। जो उनके अन्तस्करण में निरन्तर निवास करने वाले प्रभु श्रीराम के अन्तस्करण के साथ एकाकार हो गया है।
सृष्टि को बनाए रखने में नारी और पुरुष दोनों का आपसी सहयोग अपेक्षित है। नारी और पुरुष एक दूसरे के मर्म के अनुसार अनुसरण करते पाए गए है। मानस का राम नारी के अधिकार सुरक्षा के लिए जितना चिन्तित है, उसी तरह नारी सीता भी पुरुष के प्रति नारी कर्तव्य में जरा भी कंजूसी न कर स्वकर्तव्य प्रति सजग रहती है। नारी-पुरुष में जो आकर्षा है, उस आकर्षा को बडेÞ मर्यादित ढंग से गोस्वामी जी ने मानस के पुष्प वाटिका प्रसंग में सीता और राम के रूप में उपस्थित कराया है। राम अयोध्या के राजकुमार थे, सीता मिथिला की राजकुमारी। नेपाल की तर्राई में आज भी वैवाहिक प्रसंग में सीताराम से सम्बन्धित वैवाहिक गीत गए जाते हैं और नारी-पुरुष एक आपस में मधुर आनन्द का अनुभव करते हैं।
आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य तडÞक-भडÞक के साथ रहना पसन्द करता है। वह दिन रात अर्थोपार्जन की चिन्ता में पडÞकर मशीनी जीवन जीने का आदी हो गया है। उसे इतनी फर्ुसत कहाँ, जो सत्संग में भी कुछ समय देकर अपने जीवन को अमृतमय बनावें। सत्संग के द्वारा भौतिकवादी युग की यातनाओं से मनुष्य निदान पा सकता है। यह भौतिक आकर्षा ही आज के मनुष्य के सारे दुःखों की जडÞ है। मानवीय त्रासदी की पहचान रामचरितमानस में बहुत पहले ही कर ली गई थी। तुलसी दास ने उसके निराकरण का सहज उपाय बताया था। सत्संगति -साधु समागम) इस चिन्ता के युग में राम नाम ही एक आधार है। आध्यात्मवाद के चिन्तन से भौतिकजन्य कष्ट मिट जाता हैं और समाज में शान्ति वातवारण का माहौल उपस्थित होता है। प्रभु श्रीराम तो गुणो के भण्डार हैं, दया, करुणा, त्याग, निर्लोभ और शरणागतरक्षा भाव विशेष रूप से उनके व्यक्तित्व में दर्शनीय है। उनका व्यक्तित्व कल्पवृक्ष के समान है, जहाँ से कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटता। रामचरितमानस एक ऐसा सद्ग्रन्थ है, जिसे ज्ञाननिधि कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। मानव जीवन अनेक विसंगतियों से भरा है। इष्र्या, द्वेष, लोभ, मोह, पाखण्ड तथा मार्त्र्सय इसके विषादि पक्ष हैं, जो इसे लडर्Þाई-झगडÞा तथा कलह रूपी अशान्ति में डÞाल कर समूल रूप से नाश करना चाहता है।
इसके कुप्रभाव को कमजोर करने के लिए सद्गुरु की आवश्यकता होती है। सद्गुरु ही अपने ज्ञान से शिष्य को उबार सकते हैं। यह संसार माया जाल है। इससे निकल पाना बडÞा कठिन  काम है। धर्मपथ पर चलकर ही हम अपना कल्याण कर सकते हैं। ‘असारे खलु संसारें, धर्म एको हि निश्चलः’ रामचरितमानस कर्तव्य सेतु के रूप में उपस्थित है। वह मानव समाज में आध्यात्मिक चेतना जगा कर तथा श्री सीताराम के आदर्श कर्तव्य का ज्ञान करा कर सबों को एक सूत्र में बाँधकर आशान्ति रूपी अन्धकार को भगाकर शान्ति रूपी चन्द्रकिरण से सराबोर कर देगा।
रामचरितमानस एक अथाह सागर है, इस में विभिन्न प्रकार के ज्ञान-विज्ञान तथा आध्यात्मिक भक्ति रूपी रत्न छिपे हैं। इस रत्न को पाने के लिए हमें अपनी सद्बुद्धि का प्रयोग करना पडेÞगा। यहाँ हर वर्ग, हर क्षेत्र असन्तुलित है। सामाजिक वातावरण प्रदूषित है। परोपकार का दायरा संकर्ीण्ाता से भर गया है। उसकी अपव्याख्या हो रही है। मित्र-शत्रु हो गए हैं। नर-नारी अपना कर्तव्य भूल गए हैं। पिता-पुत्र का सम्बन्ध विगडÞ गया है। सास-बहू में कलह छा गया है। गुरु-शिष्य में अर्न्तर्द्वन्द्व है। भाई-भाई अपास में लडÞ रहे हैं। पति-पत्नी का सम्बन्ध स्वार्थ में बदल गया है। सेवक-सेव्य का सम्बन्ध धुमिल पडÞ गया है। राज्य पक्ष और जनता में खटास उत्पन्न हो गया है। गुरुकुल परम्परा विगडÞ गई है। राज नेता गुरु उत्पादन करने लगे है। नदियाँ प्रदूषित हो गई है। अनाधिकार क्षेत्र बढÞ गया है। कर्तव्य पथ घांस-फूस से ढंक गया है। अखाद्य बस्तु खाद्य बन गया है। हत्या-हिंसा सरेआम हो रहे है। असुरक्षा बढÞ गई है। देवत्व प्रायः लुप्त हो चला है। विद्वद् वर्ग ने चुप्पी साध ली है।
तुलसी पावस के समय धरी कोकिला मौन।
अब दादुर वक्ता भए हम को पूछत कौन।।
सभ्य समाज प्रतिष्ठा बचाने में लगा है। मांस-मदिरा और ललनाओं का व्यापार बढÞ गया है। साधु सन्त सताये जा रहे हैं। आम जन समुदाय त्राहिमाम् त्राहिमाम् करते नजर आ रहे हैं। इस तरह की विषम परिस्थिति में रामचरितमानस ही उद्धारकर्ता के रूप में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। असहाय की स्थिति में लोग प्रभु शरण में ही जाते हैं। हारे को हरिनाम !
रामचरितमानस की उपयोगिता जितनी भारत में है, उससे कम नेपाल में नहीं है। शहर हो वा गाँव हर जगह भक्तगण रामायण पारायण वा हनुमत आराधना करते दिखाई पडÞते हैं। प्रवचनादि आयोजन किए जाते हैं। रामनामसंकर्ीतन किया जाता है। रामचरितमानस कर्तव्य बोध का एक संगम उपस्थित करता है। यर्सथ अनेकों ऐसे संवाद स्थल हैं, जो आप के मर्मस्थल को सहज ही छू लेंगे। ऐसे में कुछ मनोहर संवाद के बारे में चर्चा आवश्यक है।
राम वन गमन का समय है। सीता भी साथ चलने को आतुर दिखती हैं। परन्तु स्वयं राम से कहें तो कैसे – परम्परागत मर्यादाओं का ख्याल कर सास की ओर विहृवल हो देखती हैं। माता कौशल्या कर्तव्य निर्वाह करती हर्ुइ राम से सीता के मन की बात कहती है। मर्यादा का निर्वाह करते हुए राम भी सीता से घर में रहने को सलाह देते हैं। वन की दर्ुगमता और कष्ट के बारे में खुलस्त रूप से बताते हैं। तुम तो कोमल हृदयवाली सुकुमारी हो। इस पर सीता कहती है- ‘मैं सुकुमारी नाथ बन जोगू, तुम्हहि उचित तप मो कह भोगू।’ अयोध्याकाण्ड वन गमन समय का यह संवाद किसी को भी विचलित कर देता है। नारी धर्म का यह प्रसंग अन्यत्र दर्ुलभ है। सीता मैथिला पुत्री है। मिथिला के रीति-रिवाज को भलीभाँति जानती है। मिथिला में पति सेवा धर्म से बढÞकर नारी के लिए और कुछ नहीं है। इसीलिए वह राम के साथ वन के कष्टों का कुछ भी परवाह नहीं करती है। हँसती-हँसती वन गमन में राम के साथ हो लेती हैं। क्यों न साथ हो ले, नारी धर्म का जो निर्वाह करना है। सीता अवनी पुत्री है। माता के अनुकूल अनुसरण करती है। इसी से तो वह नारी जगत के आदर्श पात्र है, अपनी सारी अभिलाषा, मनोरथ, भोग, उपभोग को त्याग कर जंगल में मंगल मनाती हर्ुइ राम के कर्तव्य पथ को सुरक्षित करती है। अतः रामचरितमानस नेपाल और भारत के जनमानस के लिए समान रूप से उपयोगी है, सांस्कृतिक और धार्मिक एकता को बढÞाने में संजीवनी बूटी है। अस्तु।
या.ल.मा.वि., मटिहानी।

-प्रो. ताराकान्त झा

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