Thu. Nov 15th, 2018

नेपाल में भी अन्ना चाहिए:
राजेन्द्र उपचारक

उन्नत फल की आशा करने वालों के लिए अधिक बीज रोपने की जरुरत नहीं होती। यद्यपि जिस फल को खाने की अपेक्षा या जिस फल की चाह हमें होती है उसी का बीज अनिवार्य रूप से लगाना ही पडता है। करेले की झाड पर आम की अपेक्षा करना मर्खता होगी। इसलिए आम खाने के लिए आम का ही बीज लगाना होगा। अन्यथा आम की आशा में करेला का झाड उगाने वालों की हालत नेपाल की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था जैसी ही होगी।
सर्दर्भ भारत में चल रहे अन्ना हजारे के अनशन से जोडना चाहता हूं। भ्रष्टाचार की नींव पर खडी हर्इ लोकतंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए जिस तरह से भारत में अन्ना के द्वारा आजादी की दूसरी लर्डाई लडी जा रही है उससे आम लोगों का ही यह लोकतंत्र है उसका आभास होने लगा है। लेकिन हमारे नेपाल में स्थिति इससे भी ज्यादा खराब है। यह इस देश का और इस देश की जनता का दर्ुभाग्य है कि यहां आज तक अन्ना जैसी कोई भी शख्सियत देखने को नहीं मिली है।
नेपाल में गणतंत्र की स्थापना हुए चार साल हो गए और इन चार सालों में नेपाल की जनता ने शान्ति और संविधान के लिए अपने नेताओं के हाथों में अपना भाग्य सौंप दिया था। अपना संविधान, अपने द्वारा बनाया गया संविधान, अपने लोगों के लिए संविधान ऐसी ना जाने कितनी ही लोक लुभावन नारा के भ्रम जाल में फंसकर नेपाल की जनता ने अपने खुन पसीने से संविधान सभा की स्थिति इस देश में बनाई। संविधान सभा का चुनाव भी हुआ। लेकिन दो साल में बनाने के बदले अभी चार साल होने जा रहे हैं लेकिन अभी तक संविधान बनना तो दूर उसकी एक झलक भी नेपाली जनता को देखने को नहीं मिली है।
हां इन चार वषर् की अवधि में नेपाल के नेता और यहां की राजनीतिक पार्टियों का भविष्य तो सुनहरा हो गया है। लेकिन आम नेपाली जनता को मिली है तो सिर्फमहंगाई, भ्रष्ट समाज, असुरक्षा की भावना जातीय और क्षेत्रीय द्वंद्व की दलदल। इससे निजात दिलाने के लिए नेपाल में भी अन्ना की सख्त और तुरन्त आवश्यक है।
भारत में जिस समय अन्ना का आन्दोलन अपने चरम पर है ऐसे में नेपाल में भी इसका प्रभाव पडना लाजिमी है। नेपाली मीडिया ने भी अन्ना के आन्दोलन पर अच्छा खासा कवरेज दिया है। लेकिन आज जरूरत है नेपाल में ही एक अन्ना की जो कि भ्रष्टाचार के दलदल में फंस चुकी हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए नेपाल में एक अन्ना को तो आना ही होगा। भारत में चल रहे अन्ना के आन्दोलन को सिर्फमजे लेने के लिए देखना हमारी मर्ूखता होगी। नेपाल में भी इस तरह की कोई ना कोई शुरूआत करनी ही होगी। नेपाली जनता को अन्ना से कोई पाठ अवश्य सिखनी चाहिए।
भारत के जैसे ही नेपाल में भी संगठित तथा स्थाई रूप से भ्रष्टाचार विरोधी आवाज ना उठने से नेपाल में अन्ना की तरह अभियान की शुरूआत नहीं हो पा रही है। मजे की बात यह है कि नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच की जिम्मेवारी मिली संस्थाओं में ही भ्रष्टाचार इस कदर व्याप्त है कि उनसे निष्पक्ष जांच की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती है। नेपाल में अब तक के सबसे भ्रष्टाचार की घटना सुडान घोटाला से उजागर हो गई। लेकिन इस घोटाला में असली गुनहगार यानि कि जिनके संरक्षण में यह घोटाला हुआ उसे अदालत और अख्तियार भी कुछ नहीं कर पाई। ऐसे ही नेपाल में वषर्ाें पुरानी ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक महत्वों वाली हथियार की अवैध बिक्री का मामला भी उजागर हुआ है। लेकिन राजनीतिक संरक्षण में ही हुए इस घोटाले में भी जांच सही तरीके से नहीं हो पायेगी।
ऐसे भ्रष्टाचार और आपराधिक मामले ना जाने कितने ही हैं। लेकिन इसके विरूद्ध यहां कुछ भी नहीं हो रहा है। ऐसे में नेपाल में भी अन्ना के आन्दोलन की तरह एक जबर्दस्त आन्दोलन की आवश्यकता है। नेपाल में भी किसी ना किसी को अन्ना बनना ही पडेगा। अन्यथा नेपाल में हजारों बलिदान के बाद मिला लोकतंत्र और गणतंत्र को भ्रष्टाचार रूपी दीमक के रूप में रहे हमारे नेता और सरकारी बाबू इसे अन्दर ही अन्दर खोखला कर देंगे।

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