Sat. Sep 22nd, 2018

पप्पु और गप्पू (व्यग्ंय) : बिम्मीकालिंदी शर्मा

जमाना पप्पु का है, चाराें तरफ पप्पु ही पप्पु छाया हुआ है । पप्पु इतना बडा है कि उस के नीचे पुल बेचारा दब गया पर पप्पु पुल के नीचे नहीं आया । पप्पु ने खुद को पुल जैसा मजवुत बना लिया है पर बेचारा पुल रेत की मानिदं भरभरा कर ढह गया । आखिर में उस पुल में कमिशन का रेत ही तो था जिस ने पुल और पप्पु दोनों को चारों खाने चित्त कर दिया । पप्पु का काम है पुल बनाना और पुल का काम है ढहना या गिर जाना । दुष्यन्तकुमार की कविता की तरह जब पप्पु रेल की तरह कमिशन की मोटी रकम डकार कर गुजरता है तब पुल के अदंर छूपा रेत थर्रा कर गिरने लगता है । पप्पु ने जितने भी भौतिक निर्माण के ठेके लिए उन सभी में अपनी पप्पु गिरी दिखा दी । क्यों कि पप्पु और कमीशन का चोली दामन का साथ है । वैसे सभी ठेकेदार कमीशनखोर होते हैं, मात्रा कम ज्यादा हो सकती है । सिमेंट और लोहा को खुद हजम कर के रेत के ढेर में खडा कर के बनाया गया पुल बेचारा कितना दिन जिदां रहता ? पप्पु ने पुल बनाई और पुल ने पप्पु की पोल खोल दी । पप्पु भले ही बडा नाम हो । बहुत से जिलों में उस के ठेकेदारी का काम चलता हो पर पुल को तो यह नहीं मालूम की पप्पु सभासद भी है, राजनीतिक हस्ती है । पुल को न आंख है न दिमाग इसी लिए तो ढह गया । अब पुल तो ढह गया वह भी अपने ही गृह जिला का । पप्पु करे भी तो क्या ? पुल के हिस्से का लोहा और सिमेंट हजम नहीं करता तो पुल मजबूत होता और पप्पु की ही ईज्जत की रक्षा करता । पर “अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत” वाली बात हो गई है । पर पप्पु ने जानबुझ कर ही चिडि़या को खेत चुगने के लिए छोड़ दिया था । पप्पु को लगा था कि मै खुद सभासद हुं तो मैं जो चाहे कर सकता हूँ । मुझे कौन रोकेगा और कौन मेरा विरोध करेगा । पर हुआ उल्टा और पप्पु का भांडा फूट गया । भांडा किसी और ने नहीं फोडा खुद पुल ने ढह कर भांडा फोड दिया पप्पु का । अब पप्पु उसी पुल के लिए पत्रकारों के साथ पप्लु खेल रहा है । क्योंकि पप्पु मालुम है कि उस के तारणहार खेवैया पत्रकार ही है । इसी लिए पप्लु खेलने के बहाने पप्पु पत्रकारों को पैग बना कर पिला रहा है । यह तो दुनिया जानती है कि सब जगह बैर भाव हो सकता है पर मधूशाला में दुश्मन भी अपने हो जाते हैं । बाहर जितने भी गैर हों मधुशाला में सभी अपने हो जाते हैं । फिर पत्रकार तो सभी के अपने हैं जब माल मिले तब तक । पप्पु को मालुम है पत्रकारों को क्या पसंद है ईसी लिए पप्लु खेल और खिला रहा है । दूर खडा पुल लकवा ग्रस्त मरीज की तरह पप्पु और पप्लु को देख रहा है । इस देश में कितने ही पप्पु हैं जिनका कोई ईमान धरम नहीं है । ठगना ही जिनका धरम और झूठ बोलना ही जिनका ईमान है उन पप्पुओं से सत्ता का गलियारा “महक” रहा है ।

देश कें सत्ता में जब पप्पु ही काविज है तो कितने पप्पुओं से कहां तब कोई बच सकता है भला ? पप्पु नाम सुन कर भले ही सीधा सादा, भोलाभाला या मुर्ख जैसा लगे पर यह होतें हैं बहुत चतुर । इसी लिए तो बिहार में लालु यादव चारा घोटाला करते है और उसी आरोंप में भारतीय पुलिस द्धारा खोज किए जा रहे कोई एक पप्पु नेपाल में छूप कर बैठ जाता है । और मजे की बात तो यह है वह यहां की नागरिकता भी ले लेता है और मूंछ मुड़ा कर शान से रहता है । अब बताइए पप्पु कौन बना ? भारतीय पुलिस, नेपाल सरकार या खुद पप्पु ? पर यहां किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता । दूसरों के काले धन के बारे में बढ़ा, चढ़ा कर बताने वाले खुद के चारा हजम करने वाली बात को ऐसे छुपाते हैं जैसे दांत में कोई तिनका अटक गया हो जैसे । देखा पप्पु गिरी का कमाल ? हर गली में और हर नुक्कड़ में पप्पुओं का राज है । इसी लिए आज के जमाने में पप्पुओं से बच पाना नामुमकिन है । या तो आप खुद भी पप्पु बनिए नहीं तो पप्पुओं से बचना है तो पापकर्न खाते हुए जगंल चले जाईए, क्यों कि आप वहीं रहने लायक है । नहीं तो कवि दुष्यन्तकुमार की कविता की यह दो पक्तियां पढिए……. तू (पप्पु) किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता (या ढह जाता) हूँ ।

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