Sat. Nov 17th, 2018

पाकिस्तान के चुनावी समर का ताना-बाना : प्रेमचंद्र सिंह

पाकिस्तान की फौज और आईएसआई द्वारा प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी कथानक एक सोची-समझी रणनीति है। इसका संदेश पाकिस्तान के उन लोगों के दिलोदिमाग में स्थान बनाने में कामयाब हो सकता है जिनको विश्वास है कि बड़ी परियोजनायों से मिलने वाली रिश्वत और भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये तो पाकिस्तान स्वर्ग बन जायेगा।

प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ | पाकिस्तान में 25 जुलाई,2018 को नेशनल असेंबली ( पाकिस्तान की पार्लियामेंट) तथा चार राज्यों– पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान तथा खैबर-पख्तूनख्वा–की असेम्बलियों ( राज्य विधान सभाओं) का चुनाव होने जा रहा है। पाकिस्तान के इतिहास में अब तक केवल दो बार ही निर्वाचित प्रजातांत्रिक सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) वर्ष 2008-13 तक तथा पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) वर्ष 2013-18 तक सत्तासीन रही है। वर्तमान चुनावी समर में मुख्य रूप से पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान दो प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वन्दी ही आमने-सामने दिखते हैं। इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) तथा नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) इस चुनावी दंगल के मुख्य प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियां हैं। पाकिस्तान नेशनल असेम्बली में कुल 342 सीट है जिसमे 272 सीटों पर चुनाव होता है और शेष 70 सीटों पर उम्मीदवार नामित किये जाते है। वर्ष 2013 के चुनाव में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन को नेशनल असेम्बली के 272 सीटों में से 166 सीट मिला था तथा पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को 35 सीटें मिली थी। पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) मात्र 15 सीटों के साथ केवल सिंध प्रान्त तक सिमट गई।

                  जनसंख्या की दृष्टि से पाकिस्तान विश्व का छठा देश है। इसके पास विश्व की छठी बड़ी सेना है तथा विश्व की बड़ी न्यूक्लियर शस्त्रागारों में से एक पाकिस्तान के पास है। दूसरी ओर विश्वबैंक की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में शिशु मृत्यु दर सबसे अधिक है तथा 5 वर्ष से 15 वर्ष के बीच के बच्चों की जनसंख्या का दो तिहाई से अधिक बच्चे स्कूली शिक्षा से बंचित हैं। नॉमिनल बेसिस पर पाकिस्तान की जीडीपी विश्व में चालीसवाँ स्थान पर है और प्रतिव्यक्ति जीडीपी विश्व में 158 वाँ स्थान पर है। इनमे से कोई भी मुद्दा पाकिस्तान के चुनाव में किसी भी राजनीतिक पार्टी के मैनिफेस्टो में स्थान नही पा सका है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज पार्टी तथा पाकिस्तान पीपल्स पार्टी द्वारा कम-से-कम अपना राजनीतिक मैनिफेस्टो समय से जारी कर दिया गया। इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी का मैनिफेस्टो तो चुनाव से मात्र 16 दिन पूर्व 9 जुलाई, 2018 को सार्वजनिक हुआ। इमरान खान के समर्थकों को विश्वास है कि मैनिफेस्टो से अधिक इमरान खान की करिश्मा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध हल्ला-बोल चुनाव में वोटरों को प्रभावित करेगा। इतना जरूर है कि इस चुनाव में पाकिस्तान की अधिकांश राजनीतिक पार्टियाँ भारत की विकास और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि की प्रतिस्पर्धी दिखती है और चुनावी सभाओं में इनका खुलकर जिक्र होता है। पूर्व के चुनावों में तो कश्मीर ही मुख्य मुद्दा हुआ करता था।

पाकिस्तानी राजनीति की हकीकत :–

                   पाकिस्तानी चुनाव का परिणाम चाहे जो हो लेकिन इतना जरूर है कि 25 जुलाई, 2018 को होने वाली चुनाव से पाकिस्तान की राजनीति की चार मौलिक जमीनी हकीकत के रुख में बदलाव मुश्किल है। पहली वास्तविकता है कि पाकिस्तान के सैन्य अधिष्ठान के पास ही सत्ता का चाभी है और इसे बरकरार रखने के लिए सैन्य प्रतिष्ठान असैन्य राजनीतिज्ञों पर भ्रष्टाचार तथा अक्षमता का आरोप लगाती रहती है जिससे सिविल राजनीतिज्ञगण पाकिस्तानी अवाम के समक्ष अयोग्य बने रहें। दूसरी वास्तविकता है कि असैन्य राजनीतिज्ञों द्वारा देश की राजनीति में सैन्य दखल का डर अवाम को दिखाया जाता है ताकि इससे इन राजनीतिज्ञों को अपनी कमजोरी तथा भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में मदद मिल सके। तीसरी वास्तविकता है कि जिहादियों, धार्मिक कट्टरपंथियों तथा धार्मिक अतिवादियों के प्रति सैन्य प्रतिष्ठान और न्यायपालिका की अनिच्छा, उदासीनता तथा परोक्ष समर्थन है। इन आतंकी संगठनों से राजनीतिज्ञों को मिल रहे सहयोग के कारण ही पाकिस्तान के आतंकी फिरके लाभ की स्थिति में है। अंतिम वास्तविकता है कि पाकिस्तान की इस विचारधारा तथा आतंकियों को राजनीति की मुख्यधारा में आने के कारण पाकिस्तान की आर्थिक समस्या तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पृथकीकरण का अंत दिखाई नही दे रहा है।

                नवाज शरीफ के समर्थक इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि नवाज शरीफ को राजनीति में लाने वाला पाकिस्तान की मिलिट्री और आईएसआई ( इण्टर सर्विस इंटेलिजेंस) ही है। नवाज शरीफ के भाग्य एवं ऐश्वर्य का विस्तार उनके राजनीति में आने के बाद ही हुआ है। तीन दशक पूर्व पाकिस्तान की मिलिट्री तथा आईएसआई ने नवाज शरीफ की राजनीतिक जीवन को यह कहकर आगे बढ़ाया कि पूर्व प्रधानमंत्री वेनजीर भुट्टो के पति आसिफ जरदारी भ्रष्ट हैं। अबकी बार पाकिस्तान की अदृश्य सत्ता संस्थान का चहेता इमरान खान हैं और नवाज शरीफ की कथित भ्रष्टाचार को देशव्यापी मुद्दा बनाया जा रहा है।

                    वर्णित स्थिति में इस बात की संभावना बहुत कम है कि पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों को सत्ता संचालन का कभी ज्ञान एवं कौशल प्राप्त भी हो सकेगा अगर उन्हें इसी तरह लगातार अनिर्वाचित फौजी जनरलों तथा जजों द्वारा निर्धारित तथाकथित सुधार की प्रक्रिया की अग्निपरीक्षा से गुजरते रहना पड़ेगा। इस संदर्भ में अभी दो-चार दिन पूर्व इस्लामावाद की हाइकोर्ट द्वारा पाकिस्तान की फौज को हिदायत दी गयी है कि वह  उन मंत्रालयों और सिविल प्रशासन के कार्यों में हस्तक्षेप न करे जिनका कोई संबंध रक्षा तथा घरेलू सुरक्षा से नही है। पाकिस्तानी फौज को सचेत करते हुए कहा है कि वह संबिधान एवं विधि द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का ही वहन करें, संविधान की मर्यादा का अतिक्रमण न करें। इसका असर पाकिस्तानी फौज और आईएसआई पर पड़ेगा, इसकी संभावना क्षीण ही है।

चुनाव को प्रभावित करने वाले कारक :–

             पाकिस्तान चुनाव की समीकरण एवं ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव को प्रभावित करने वाली मुख्यतः चार कारको की संभावनायें हैं। पहली संभावना है कि नवाज शरीफ तथा उनकी बेटी एवं राजनीतिक उत्तराधिकारी मरियम को पाकिस्तान की सुप्रीमकोर्ट द्वारा चुनाव लड़ने और उच्च पद ग्रहण करने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री को दस वर्ष तथा उनकी बेटी मरियम को सात वर्ष की सजा भी दी गयी है। तदनुसार अभी दोनो रावलपिंडी की जेल में बन्द हैं। फलस्वरूप इस चुनाव में उनकी पार्टी पीएमएल-इन की ओर से प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में किसी को पेश नही किया गया है। चुनाव में सहानुभूति के आधार पर वोट प्राप्त करने के लिये शरीफ की पत्नी की बीमारी तथा उनके इलाज की कहानी सोशल-मीडिया में उनकी पार्टी की ओर से जोरशोर से चलाया जा रहा है।

दूसरी संभावना वर्तमान चुनाव में पाकिस्तान की धार्मिक-राजनीतिक ताकतों की धमाकेदार प्रवेश है। बिगत सात दशकों में वहां की आवाम ने इन तन्जिमों को पसन्द नही किया और न ही वहाँ के वोटरों ने उन्हें सत्तासीन होने का अवसर ही दिया। इनमे से भारत विरोधी तथा हिन्दू विरोधी जमात-ए-इस्लामी ने कभी भी चुनाव में दो-चार सीट से ज्यादा नही पाया। वर्ष 2013 के चुनाव में इस पार्टी को 2% वोट प्राप्त हुआ। इससे थोड़ा ही बेहतर प्रदर्शन जमात-उल-उलेमा का था। सामान्यतया पाकिस्तान के लोग धार्मिक रूप से कट्टर हैं, फिर भी कभी भी वे मौलानाओं, मौलवियों तथा मुल्लाओं को राजनीतिक सत्ता की कमान नही सौपी। इस बार चुनाव में इन धार्मिक अतिवादी पार्टियों में से कई ने आपस मे गठजोड़ भी किया है। खैबर-पख्तूनख्वा के मौलाना फजलुर रहमान के नेतृत्व में मताहिदा मजलिस-ए-अमल (एएमए) एक गठजोड़ राजनीतिक पार्टी है। पहले से ही मौलाना रहमान भारत के प्रति नरम रबैया के लिये जाने जाते हैं। यद्यपि एएमए द्वारा इस चुनाव में पीएमएल-एन तथा पीटीआई के वोटबैंक में सेंध मारने के कयास लगाये जा रहे हैं, फिर भी उसे सरकार बनाने की संभावना नही है। एएमए के वोटबैंक में दूसरी आतंकी राजनीतिक पार्टियों द्वारा सेंध लगाने की संभावना है। इनमे हाफिज सईद की अल्ला-ओ-अकबर (एओए) मुख्यरूप से सुन्नी पार्टी है तथा मौलाना खादिम हुसैन रिज़वी की नेतृत्व वाली तहरीक-ए-लाबाइक-इ-पाकिस्तान (टीएलपी) मुख्यरूप से शिया पार्टी है, महत्वपूर्ण है। टीएलपी से टूटकर एक दूसरी टीएलपी-आई (इस्लामी) पार्टी भी है जो मुख्य टीएलपी के वोटबैंक में सेंध मार सकती है। हाफिज सईद की पार्टी पंजाब में पचास सीटों तथा खैबर-पख्तूनख्वा में कुछ सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं। टीएलपी ने कुल 117 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं। अनुमान है कि धार्मिक-आतंकी पार्टियाँ आपस मे ही एक-दूसरे के वोटबैंक में सेंधमारी करेंगी और इसलिए चुनाव के परिणाम पर इन पार्टियों का कोई खास असर नही पड़ेगा। इसलिए मुख्य मुकाबला शरीफ और इमरान खान की पार्टियों के बीच ही दिखता है।

           तीसरी संभावना इस बार के चुनाव में अप्रत्याशित 160 स्वतंत्र उम्मीदवार के कारण है। इन सबको जीप चिन्ह आवंटित है। बहुतों का मानना है कि पाकिस्तान सैन्य संस्थान के इशारे पर ही इतनी बड़ी संख्या में स्वतंत्र उम्मीदवार चुनाव में खड़े हैं। इससे किसी एक पार्टी के बहुमत मिलने के रास्ते मे रोड़ा की तरह देखा जा रहा है, जिससे फौज को सत्तासीन होने का बहाना मिल जाय। चुनाव बाद इनमे से निर्वाचित उम्मीदवारों की बड़ी पार्टियों में जाने के आसार है।

             चौथी संभावना पाकिस्तान की अदृश्य ताकतों की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण है। पाकिस्तान की फौज और आईएसआई ही पाकिस्तानी सत्ता की अदृश्य ताकत है। पाकिस्तान की बजट का 70% धनराशि पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के अधीन है। पाकिस्तान की रक्षा तथा आंतरिक सुरक्षा के मामलों में अंतिम फैसला फौज और आईएसआई के पास ही है। इस दबदबा को बनाय रखने के लिए पाकिस्तानी फौज और आईएसआई इस चुनाव में तरह-तरह के पैतरेवाजी को अन्जाम देंगे।

न्यायपालिका की रुझान :–  

              शरीफ के विरुद्ध उल्टी दिशा में मुकदमा चलाया गया। सामान्यतः मुकदमा ट्रायल कोर्ट से शुरू होता है जहाँ आरोपों की पुष्टि के लिए साक्ष्यों एवं गबाहों की सत्यता प्रमाणित की जाती है, लेकिन नवाज शरीफ को पहले सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव एवं उच्च पदों के लिए अयोग्य घोषित किया गया और उसके बाद उनपर ट्रायल कोर्ट में मुकदमा शुरू किया गया। मात्र राजनीतिक भ्रष्टाचार की अभिज्ञता एवं जानकारी किसी भी परिस्थिति में विधिक सिद्धान्त एवं न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नही हो सकता है। पाकिस्तान की इस न्यायिक प्रक्रिया को विश्व के सभी देशों में अन्यायपूर्ण ही माना जायेगा कि पहले उच्चतम न्यायालय में किसी को दोषी ठहराया जाए और बाद में उसे कहा जाए कि निचली न्यायालय में अपनी बेगुनाही साबित करो। इस तरह के वाकया से इस तथ्य को बल मिलता है कि ऐसे अभियोगों के केंद्र में राजनीति है, न कि भ्रष्टाचार।

                  इतना ही नही नवाज शरीफ के लंदन स्थित आवास को अर्जित करने में कथित भ्रष्टाचार की जांच में मदद के लिये सुप्रीमकोर्ट ने सेना तथा आईएसआई को आमंत्रित किया। इस असामान्य प्रक्रिया के कारण ही लोगों को पूर्व प्रधानमंत्री शरीफ के विरुद्ध इस मुकदमा के वास्तविक मकसद के संबंध में शंकायें होने लगी।

आर्थिक समस्या की सघनता :–

                 पाकिस्तान की आर्थिक समस्या की गहनता को बढ़ाने में भ्रष्टाचार- विरोधी उन्माद का योगदान है। पाकिस्तान प्रशासन द्वारा बहुत सी कम्पनियों को भिन्न-भिन्न कार्य हेतु कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था। इन संविदाओं को देने में पाकिस्तान के अधिकारियों की कथित भ्रष्टाचार की जांच बिभिन्न स्तरों पर चल रही है। इन जांचों के परिणामस्वरूप जिन-जिन कम्पनियों की संविदायें निरस्त हुई हैं उन कंपनियों को क्षतिपूर्ति ( मुआवजा) की अरबों रुपये की रकम देने का बोझ पाकिस्तान की सरकारी खजाने पर बढ़ा है। पाकिस्तान की अदृश्य सत्ता ( फौज तथा आईएसआई) जिहादियों के विरुद्ध नही है और जिहादियों के रहते पाकिस्तान में देशी-विदेशी निवेश की सुरक्षा की कोई गारण्टी नही है। ऐसे में आर्थिक विकास के लिए आवश्यक निवेश एवं अन्य आधारभूत संरचनाओं की कमी बनी रहेगी।

              पाकिस्तान की फौज और आईएसआई द्वारा प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी कथानक एक सोची-समझी रणनीति है। इसका संदेश पाकिस्तान के उन लोगों के दिलोदिमाग में स्थान बनाने में कामयाब हो सकता है जिनको विश्वास है कि बड़ी परियोजनायों से मिलने वाली रिश्वत और भ्रष्टाचार समाप्त हो जाये तो पाकिस्तान स्वर्ग बन जायेगा।

उपसंहार :–    

            पाकिस्तान के चुनाव में भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना कोई गलत नही है। भ्रष्टाचार के लिए किसी बहाना और औचित्य की गुंजाइश भी नही होनी चाहिए, फिर भी पाकिस्तान की सभी समस्यायों का एक मात्र कारण भ्रष्टाचार है ऐसा कहना अतिसयोक्ति होगी। अगर विचार-विमर्श की सीमा को भ्रष्टाचार तक सीमित कर दिया जाय तो फिर इस विमर्श के लिये वास्तव में कोई गुंजाइश नही रह जाएगी कि वैश्विक समुदाय में पाकिस्तान का अलग-थलग होने का कारण आतंकवाद तथा धार्मिक अतिवाद है। इसी तरह पाकिस्तान की आर्थिक समस्या के जड़ में मानव-संसाधन के पर्याप्त विकास तथा विदेशी निवेश की कमी है जिससे उत्पादकता और मूल्य संवर्धन ( वैल्यू एडिशन) में कोई बढ़ोत्तरी नही हो रही है। पाकिस्तानी सेना की सोच कि पाकिस्तान की सभी समस्यायों का निदान केवल पाकिस्तानी राजनीति में फौज का हस्तक्षेप ही है, सर्वथा विवादास्पद है। पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों की दुराचरण की पृष्ठभूमि के बाबजूद भी राजनीति में फौज की हस्तक्षेप राजनीतिज्ञों को पाकिस्तानी अवाम के समक्ष अपनी बेगुनाही साबित करने का बहाना भी देती है और मौका भी देती है कि उनके राजनीतिक क्रियाकलाप ही उनके संकट का कारण है। यह भी तय माना जा रहा है कि चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, इससे पाकिस्तान की संकट के बुनियादी कारकों पर कोई प्रभाव नही पड़नेवाला है। अगर नवाज शरीफ की पार्टी चुनाव जीतती है और सत्ता में आती है, फिर भी उन पर भ्रष्टाचार की काली साया बनी रहेगी। इसके विपरीत अगर पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के मदद से इमरान खान चुनाव में विजयी होते है और सत्तासीन होते है फिर भी उनका फौज और आईएसआई के चंगुल से बाहर निकलना मुमकिन नही दिखता है।   दुर्भाग्यवश चुनाव के बाद भी एक मजबूत देश के रूप में पाकिस्तान को उभरने की संभावना नही दिखती है। इस चुनाव के विजेताओं में विश्वसनीयता की कमी और पराजितों में विजेताओं के विरोध की संभावना अधिक है। इस चुनाव के परिणाम से भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय सम्बन्ध की वर्तमान स्थिति में किसी बदलाव का संकेत नही है।

 

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