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प्रकृति के आँचल में बसा नेपाल : प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

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हिमालिनी,अंक दिसम्बर, २०१८ | हिमालय, पर्वतीय और तराई क्षेत्र के रूप में प्रकृति द्वारा विभाजित नेपाल एक ऐसी भूमि है जहाँ आने पर हर पर्यटक इसकी सुंदरता से मोहित हो उठता है । नेपाल की राजधानी काठमांडू की तो अपनी ही खास विशेषताएँ हैं । चारों ओर पहाड़ों से घिरे और हिमशिखरों की आभा से अलंकृत काठमांडू की प्राकृतिक सुंदरता, मठ–मंदिरों और स्तूपों के वास्तु शिल्प और विभिन्न कालखंडों में विभिन्न शासकों द्वारा निर्मित कलापूर्ण भवनों (राजप्रासादों) के कारण काठमांडू एक दर्शनीय स्थल बन जाता है । यहाँ के लोगों की धार्मिक, सामाजिक र्आर सांस्कृतिक परंपराओं में विद्यमान विभिन्नताओं में हमेशा एकता की झलक पायी जाती है, जिसे इस देश की विशेषता के रूप में देखा जाता है ।

विभिन्न मठ–मंदिरों से भरे इस नगर को देवभूमि के रूप में भी देखा जाता है । यहाँ के धार्मिक एवं दर्शनीय स्थलों में देवाधिदेव पशुपतिनाथ का मंदिर, गुह्येश्वरी का मंदिर, स्वयंभुनाथ का स्तूप, बौद्धनाथ का स्तूप और चारुमति के स्तूप के अलावा प्रथम पूज्य श्री गणेश एवं भगवान श्री विष्णु के मंदिर प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त ये स्थल विदेशी पर्यटकों के लिए भी आकर्षण के प्रमुख स्थल हैं । उपत्यका के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मंदिरों में उपत्यका के चारों कोनों में स्थापित भगवान् विष्णु के मंदिर भी पर्यटकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये प्राचीन काल की धरोहर हैं । इन मंदिरों में कई लिच्छवी काल के हैं तो कई मल्ल काल के । इन मंदिरों में उन कालखंडों के स्थापत्यकला की छाप पायी जाती है । वैष्णव संप्रदाय के लोगों के अतिरिक्त शैव और शाक्त संप्रदायों के लोगों के लिए भी समान आस्था के केंद्र बने ये मंदिर हैं–चाँगु नारायण, जो विश्व संपदा सूची में सम्मिलित है, शिखर नारायण, इचंखु नारायण और विशंखु नारायण ।
भगवान गणेश की महिमा तो सर्वविदित ही है । हिंदू धर्मावलंबी ही नही बौद्ध संप्रदाय में भी गणेश अत्यंत पूजनीय हैं । नेवार संप्रदाय के लोग, जो मुख्यतः बौद्ध धर्म के अनुयायी होते हैं, गणेश की पूजा किए बिना कोई कार्य आरंभ नही करते । हिंदूओं में भी शादी हो या कोई धार्मिक अनुष्ठान, सभी पावन कार्यों का प्रारंभ गणेश की पूजा और उनकी स्तुति के साथ होता है । क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं, दुःखहर्ता हैं । कहा जाता है कि उनकी साधना के बिना किसी कार्य को पूर्णता नही मिलती । काठमांडू उपत्यका में अवस्थित उनके चार धाम नेपाल और भारत के हिंदू धर्मावलंबियों के लिए श्रद्धा और आस्था के पावन स्थल हैं । काठमांडू के अंदर दरबार क्षेत्र के निकट अशोक विनायक (मरुगणेश), चाबहिल क्षेत्र में चन्द्रविनायक (चाभेलगणेश), भक्तपुर में सूर्यविनायक और दक्षिणकाली तीर्थ के मार्ग में चोभार निकट अवस्थित जलविनायक नेपाल और भारत के तीर्थयात्रियों के लिए समान रूप से पूजनीय है ं । नक्खू जेल के पास अवस्थित कार्यविनायक गणेश का मंदिर है । इसके संबंध में यह मान्यता है कि विभिन्न समस्याओं में उलझा कोई व्यक्ति यहाँ आकर यदि मन्नत मागता है और उसकी समस्या हल हो जाती है तो वह यहाँ कार्यविनायक के प्रति आभार व्यक्त करने हेतु पुनः आता है ।
इन सभी धामों के अलावा प्रथमपूज्य गणेश के कई मंदिर काठमांडू नगर के अंदर विभिन्न कोणों में अवस्थित हैं जिन्हें विश्व संपदा सूची में समाविष्ट होने का सौभाग्य प्राप्त न होने के बावजूद इन्हें समान धार्मिक और सामाजिक मान्यता प्राप्त है । इनमे प्रमुख हैं –रानी पोखरी के पूर्वी तट के पास अवस्थित कमलादिगणेश और नक्साल के पास अवस्थित गोमा गणेश । इतना ही नही काठमांडू के हर मोहल्ले और बस्ती में गणेश मंदिर का होना इन मंगलमूर्ति के प्रति नेपाली जनमानस में विद्यमान श्रद्धा और आस्था के भाव ही प्रदर्शित करते हैं ।
काठमांडू उपत्यका के सात और इसके बाहर लुम्बिनी, जो भगवान गौतम बुद्ध का जन्मस्थल है, और सगरमाथा एवं चितवन राष्ट्रीय निकुंज संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व संपदा सूची में समाविष्ट कर दिये जाने पर नेपाल अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र में एक महत्वपूर्ण पर्यटकीय स्थल के रूप में अंकित हो उठा है । नेपाल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाने में विश्व का सर्वोच्च शिखर माउण्ट एवरेष्ट और लुम्बिनी का भी प्रमुख स्थान है । यहाँ के अन्य उच्च हिमशिखरों मेंं ८, ४६३ ऊँचा मकालु हिमाल विश्व के सबसे ऊँचे हिमशिखरों में पाँचवाँ माना जाता है । इसके अलावा सूर्य की रोशनी में चमकते कंचनजंघा, गौरीशंकर, धौलागिरी, लामटांग, नागार्जून, अन्नपूर्ण, स्वर्गद्वारी, माछापुच्छ्रे जैसे हिमशिखरें सभी वर्ग के पर्यटकों को मंत्रमुग्ध करते हैं । इसके अलावा पर्वतारोहण में रुचि रखने वाले पर्यटकों को तो ये हिमशिखरें सदैव आकर्षित करते रहते हैं । फलस्वरुप युवा, वृद्ध, अपंग, महिला हर वर्ग के लोग एवरेष्ट से लेकर अन्य हिमशिखरों पर आरोहण कर विजय पताका फहराने और पर्वतारोहण के इतिहास में अपना नाम अंकित करने और नया कीर्तिमान कायम करने अग्रसर होते हैं ।
पशुपतिनाथ का मंदिर

नेपाल के आराध्य देव भगवान् श्री पशुपतिनाथ का मंदिर और इसके आसपास का क्षेत्र विश्व संपदा सूची में समाविष्ट है । यह विश्व भर के हिंदू धर्मावलंबियों के लिए जहाँ आस्था का प्रमुख तीर्थस्थल है, वही विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्रविंदु भी है । फलस्वरूप काठमाडू की यात्रा में आने वाला हर पर्यटक के लिए यह एक अनिवार्य दर्शनीय स्थल बना हुआ है । धूप में चमकता इसका सुनहरा गुंबद एक ओर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है तो वहीं धर्मावलंबियों को ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजनीय भगवान शिव का दर्शन करने के लिए प्रेरित करता है । इस मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है । नेपाल के हरेक मंदिर के साथ कोई न कोई कथा संबद्ध पाया जाता है । समान रूप से इस मंदिर के संबंध में भी कई कथाएँ हैं । एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में यह ज्योतिर्लिंग प्राकृतिक विपदा के कारण मिट्टी की ढेर के नीचे दबा पड़ा था । एक खश गोपालक को मिट्टी के उस ढूह के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हुई जहाँ उसकी एक गाय नित्य अपने थन से दूध प्रवाहित करती थी । उसने इस स्थल के रहस्य को जानना चाहा और खुदाई करने लगा । खोदने पर यह ज्योतिर्लिंग निकला । इसके बाद एक झोपड़ी बनाकर इसकी स्थापना की गयी और इसकी पूजा होने लगी । कालांतर में इस मंदिर का जीर्णाेद्धार होने लगा । इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराने वालों में आदि शंकराचार्य के अतिरिक्त लिच्छवीकालीन और मल्लकालीन राजाओं ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं । यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराने के काम में काठमांडू के राजा भूपतिन्द्र मल्ल को सात महीने लगे थे । भक्तजनों को इस ज्योतिर्लिंग की चारों दिशाआं से दर्शन सुलभ कराने के उद्देश्य से मंदिर में चार दरवाजे बनाई गयी है । श्री पशुपतिनाथ के ज्योतिर्लिंग में पाँच मुख स्थापित है । वे भगवान शिव के वामदेव रूप, अघोर रूप, तत्पुरुष रूप और ईशान रूप को दर्शाते हैं । चारों दिशाओं से ज्योतिर्लिंग के इन चार विभिन्न मुख, जो सद्योजात, अघोर, वामदेव और तत्पुरुष के नाम से प्रसिद्ध हैं, का दर्शन पाया जाता है । शिवलिंग का एक अन्य मुख ईशान मुख कहलाता है । उन्हें ईशान इसलिए कहा जाता है कि वे ईशानी शक्ति से युक्त होकर शासन करते है । शिव की आराधना में शिवलिंग को प्रमुखता दी जाती है क्योंकि लिंग साक्षात शिव है । लिंग शिव का वाह्य चिह्न मात्र नही है । पौराणिक कथा अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के विवाद में जो ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था, वह भगवान शिव का ही था ।

नेपाल स्थित भगवान शिव का यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर बागमती नदी के तट पर अवस्थित है । इस मंदिर की पूर्व और दक्षिण दिशा में आर्यघाट विद्यमान है, जो उन देशों के पर्यटकों के लिए कौतूहलता से भरा स्थल है, जहाँ मृतकों को जमीन के अंदर दफना दिया जाता है । एक श्मसान के रूप में अवस्थित इस स्थल पर आग की लपटों के बीच जलते शवों को आश्चर्यविस्मित नजरों से देखने के अलावा वे इस दृश्य को अपने कैमरों में कैद करते हुए भी पाये जाते है । काठमांडू उपत्यका की विविध सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएँ, यहाँ के जन–जीवन में धार्मिक पर्वों, सांस्कृतिक रीति–रिवाजों और पौराणिक गाथाओं के प्रभाव को देखकर हर पर्यटक विस्मित हो उठता है ।
स्वयम्भुनाथ का स्तूप
नेपाल मेंं हिंदू धर्मावलंबियों के बाद सबसे अधिक संख्या बौद्धों की है । काठमांडू उपत्यका में बौद्ध धर्मावलंबियों के विभिन्न चैत्य, मठ, स्तूप और विहारें हैं पर इन सबों में स्वयम्भुनाथ, बौद्धनाथ और चारुमति स्तूप प्रमुख हैं । बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर इन स्थलों पर हिंदू और बौद्ध धर्मावलंबी समान श्रद्धा और भक्तिभाव से उपस्थित होते हैं और भगवान बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष शिर नवाते हैं । एक टीले पर अवस्थित स्वयम्भुनाथ का स्तूप दक्षिण दिशा से काठमांडू प्रवेश करने वाले हर पर्यटक का ध्यान दूर से ही आकर्षित करता है । इसे देखकर लगता है मानो वह उपत्यका की चारों ओर से निगरानी कर रहा है । स्वयम्भुनाथ का यह स्तूप महायानी बौद्ध स्थलों में अत्यंत प्राचीन है । स्वयम्भु का अर्थ होता है–स्वयं उत्पन्न होने वाला । स्वयम्भु पुराण, नेपाल महात्म्य हिमवतखण्ड और वंशावली आदि में इस स्तूप का उल्लेख पाया जाना इसके मह्व को दर्शाता है । विभिन्न कालखण्ड में इस टीले का नाम भी बदलता रहा । यहाँ कमल के सहस्र दल खिलने के कारण यह टीला प्रारंभ में ‘पद्मगिरी’ कहलाया तो त्रेतायुग में ‘वज्रकूट गिरी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । द्वापर में ‘गोश्रृंग गिरि’ और कलियुग के प्रारंभ में ‘गोपुच्छ गिरि’ कहलाने लगा । वर्तमान समय में यह स्वयम्भु डाँड़ा के नाम से सुविदित है ।
बौद्धनाथ एक चैत्य है जो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है । यह भी विश्व संपदा सूची में समाविष्ट है । कयहाँ भी बुद्ध पूर्णिमा के अवसर परहिंदू और बौद्ध धर्मावलंबी भगवान बुद्ध के विशाल मूर्ति के समक्ष समान श्रद्धा और भक्तिभाव से उपस्थित होते हैं और प्रतिमा के समक्ष शिर झुकाते हैं ।
चारुमति स्तूप मगध के सम्राट अशोक की काठमांडू यात्रा का स्मरण कराता है । काठमांडू के मध्य में अवस्थित चाबहिल में विद्यमान यह स्तूप उनकी पुत्री चारुमति का है, जिनकी शादी नेपाल के एक युवक से हुई थी । चारुमति के निधन के बाद उनके अस्तुओं को इसी स्तूप के गर्भ में रखा गया है । यह स्तूप भी हिंदू और बौद्ध धर्मावलबियों की आस्था और धर्म का प्रतीक और पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल है ।
लुम्बिनी
यह सिद्धार्थ गौतम, जो अपने तप, साधना और बोधिप्राप्ति के कारण भगवान बुद्ध कहलाये और विश्वभर पूजनीय हैं, का जन्मस्थल है । भगवान बुद्ध के जन्म के समय लुम्बिनी एक जंगल था । माया देवी अपने राजा शुद्धोदन की राजधानी तिलौराकोट से प्रसूति के लिए अपने मायके देवदह जा रहीं थी, पर रास्ते में ही उन्हें प्रसव वेदना हुई । माया देवी ने एक पीपल के जिस पेड़ के नीचे जिस स्थान पर शिशु को जन्म दिया वहाँ अब माया देवी के नाम से एक मंदिर का निर्माण किया गया है । यह मंदिर इस जगह का प्रमुख आकर्षण स्थल है और मायादेवी मंदिर के नाम से जाना जाता है । लुम्बिनी की पावन भूमि भी विश्व संपदा सूची में समाविष्ट है । सयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव उ थाँट, जो स्वयं बौद्ध धर्मावलंबी थे, की लुंबिनी यात्रा के बाद इसके विकास के कई कार्य हुए । काठमांडू से ३००कि.मी. दूर अवस्थित लुम्बिनी सार्वजनिक यातायात और हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है । हवाई मार्ग से यात्रा करने वालो को सबसे पहले भैरहवा नामक स्थान पर उतरना पड़ता है । फिर वहाँ से २२कि.मी. बस या मोटर गाड़ी से यात्रा करनी पड़ती है । चूँकि यह पर्यटकीय नगरी है, अतः यहाँ विभिन्न वर्गो के पर्यटकों के रहने के लिए विभिन्न किस्म की आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध हैं । यहाँ के दर्शनीय स्थलों में भगवान बुद्ध के जन्म से संबंधित कई स्थल हैं, पर इस स्थल पर, जो लुम्बिनी उद्यान के नाम से भी जाना जाता है, अवस्थित १६फीट ७ईंच ऊँचा एक लौह स्तंभ पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है । इस स्तंभ को मगध के सम्राट प्रियदर्शी अशोक ने अपनी लुम्बिनी यात्रा की स्मृति में स्थापित करायी थी । शांति, मित्रता और सद्भाव के संदेश को प्रचारित करने के उद्देश्य से निर्मित विश्व शांति स्तूप भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का स्थल है ।
मुक्तिनाथ 
हिंदू, बौद्ध, जैन और वैष्णव संप्रदाय के धर्मावलंबियों के समान आस्था का एक अन्य स्थल है–समुद्री सतह से ३,७५०मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित मुक्तिनाथ का मंदिर । नेपाल के एक दुर्गम जिले मुस्तांग में अवस्थित है यह मंदिर । इसमें भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और उनके वाहन गरुड़ की मूर्ति स्थापित है । हिंदू संप्रदाय के लोग इसे अपने ५ प्रमुख पावन धामों के रूप में पूजते हैं । काठमांडू से यहाँ के लिए सबसे पहले पोखरा पहुँचना आवश्यक है, जो हवाई मार्ग से जुड़े होने के अतिरिक्त बस, माइक्रोबस और सार्वजनिक यातायात के अन्य साधनों से भी जुड़ा है । पोखरा से १९० कि.मी की दूरी पर अवस्थित मुक्तिनाथ मंदिर के लिए जोमसोम तक विमान द्वारा यात्रा की जा सकती है । बसों से यात्रा की चाह रखने वालों को पहले ८५ कि.मी. की यात्रा करते हुए बेनी और बेनी से जीपों से ८३कि.मी की यात्रा करते हुए जोमसोम तक पहुँचना पड़ता है । ऊँची चट्टानी पर्वतों के बीच से की जाने वाली जीप यात्रा कई बार दिल दहला देती है । जोमसोम मुक्तिनाथ क्षेत्र का प्रवेश द्वार है, अतः वहाँ ठहरने के लिए कई प्रकार के होटलें हैं । पहाड़ी सुंदरता का अवलोकन करने में रुचि रखने वालों के लिए बेनी होते हुए जोमसोम तक की जाने वाली जीप यात्रा मनोरंजक होती है । जोमसोम से मनांग की भी यात्रा की जा सकती है । मुक्तिनाथ पहुँचने से पहले राह में एक तीर्थस्थल आता है–कागबेनी, जहाँ पितरों को तर्पण देने की प्रथा है । इस यात्रा काल में पर्यटक धौलागिरि, निलगिरि और अन्नपूर्ण पर्वत श्रृंखलाओं की सुंदरता का अवलोकन कर पाते हैं । चूँकि यह पर्वतीय क्षेत्र है, अतः कई लोग विशेषतः हृदय के रोगियों को स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है और कोई समस्या महसूस होने पर स्थानीय स्तर उपलब्ध स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करने में नही हिचकिचाना चाहिए ।
पोखरा
नेपाल की यात्रा में आने वाले पर्यटकों की यात्रा तब तक पूरी नही मानी जाती है जब तक वे काठमांडू से २००कि.मी.दूर अवस्थित पोखरा की प्राकृतिक सुंदरता का अवलोकन नही कर लेते । प्रकृति द्वारा सुशोभित एक मनोरम पर्यटकीय स्थल है यह । समुद्री सतह से १५००मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह नगर नेपाल के पश्चिमी क्षेत्र का प्रवेश द्वार भी है । विभिन्न ताल–तलैयों से भरा, हिमशिखरों से आलोकित और धार्मिक महत्व के स्थलों से युक्त यह नगर विभिन्न वर्ग के पर्यटकों की रुचि अनुकूल है । पर्वतीय क्षेत्रों की पदयात्रा करने या झीलों मै नौकावहन की चाह रखने वालों के लिए भी यह एक उपयुक्त नगर है । यहाँ के प्रसिद्ध फेवाताल के निकट बने कई होटलें पर्यटकों को आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध कराती हैं । रात्रि के प्रहर झील के पानी में बिजली की चमक की झिलमिलाहट पर्यटक का मन मोह लेती है । पोखरा से लगभग २० किलोमीटर दूर तनहुँ जिला है जहाँ कृष्णद्वैपायन व्यास ऋषि की गुफा है, जहाँ बैठकर उन्होंने पुराणों की रचना की थी । इसके अलावा यह नेपाल के आदिकवि भानुभक्त आचार्य, जिन्होंने नेपाली भाषा में आधात्म रामायण की रचना की थी, की जन्मभूमि भी है ।
सुदूर पश्चिम क्षेत्र, जहाँ प्रकृति ने इसे उदारता से सजाया है, में नैसर्गिक सुंदरता से भरे कई दर्शनीय स्थल मिलते हैं । इस ओर जाने का मार्ग भी पोखरा ही है । सुदुर पश्चिम को सुशोभित करने वाले हिमशिखरों में सैपल हिमाल, आपी हिमाल, बेच चुचुरो प्रसिद्ध हैं तो कर्णाली और महाकाली यहाँ की प्रसिद्ध नदियाँ हैं ।
काठमांडू के अन्य धर्मावलंबियों के पूजा स्थलों में नगर के मध्य में स्थित दरबार मार्ग में इस्लाम धर्मावलंबियों का मस्जिद है तो दक्षिण की ओर बागमती नदी के उस पार सिख धर्मावलंबियों का गुरुद्वारा विद्यमान है । धर्मनिरपेक्ष होने के बाद तो नेपाल में भी गिर्जाघरों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है ।
नेपाल के पूर्वी क्षेत्र भी पर्यटकीय दृष्टि से उल्लेखनीय और दर्शनीय हैं । इनमें प्रमुख हैं–इलाम, धनकुटा, धरान, जनकपुर और ताप्लेजुंग । ये सभी प्राकृतिक सुंदरता, पर्यटकीय महत्व और पौराणिक गाथाओं से संबद्ध दर्शनीय स्थल हैं । स्थानाभाव के कारण इस लेख में नेपाल के इन प्रमुख पर्यटकीय नगरों और स्थलों की सविस्तार चर्चा कर पाना संभव नही रहा । पर संक्षेप में अंत में यही कहा जा सकता है कि प्रकृतिक सुंदरता और स्वर्गिम छटा का आनंद उठाना हो तो एक बार नेपाल यात्रा का लंबा कार्यक्रम जरुर बनायें । पर २–४ दिनों की यात्रा में नेपाल की अलौकिक और पृथ्वी में स्वर्ग की सुंदरता का भरपूर अवलोकन नही किया जा सकता है ।
अब हम देश के तराई और पूर्वी क्षेत्र के पर्यटकीय और धार्मिक महत्व के दर्शनीय स्थलों की ओर चलते हैं । इनमे प्रमुख हैं–जनकपुर, इलाम, धरान और ताप्लेजुंग आदि ।
जनकपुर
यह नगर जनकपुरधाम के नाम से भी प्रसिद्ध है, क्योंकि इसका इतिहास त्रेतायुग और रामायण से संबद्ध है । भारतीय सीमा से जुड़ा यह नगर यहाँ के त्रेतायुगीन राजा जनक की पुत्री देवी सीता की पावन जन्मभूमि है । इसी स्थल पर देवी सीता के स्वयंवर के अवसर पर भगवान श्रीराम ने राजा जनक की महिमाशाली धनुष को तोड़ा था, जिसका एक टुकड़ा यहाँ से कुछ कोश दूर धनुषा नामक स्थल पर गिरा । अतः यह धनुषा जिला के नाम से भी जाना जाता है । इसके बाद देवी सीता और भगवान श्रीराम की शादी हुई । जिस स्थल पर पावन शादी सुसंपन्न हुई वहाँ एक एक भव्य मंदिर, मंदिर के प्रांगण में भव्य विवाह मंडप और विभिन्न मंदिरों को निर्माण हुआ, जो आज पर्यटकीय महत्व के स्थल के रूप में विद्यमान हैं । विवाह पंचमी, जो भगवान राम और देवी सीता की शादी का पावन दिन था, और रामनवमी के दिन यहाँ विशेष अनुष्ठान और मेला का आयोजन होता है । प्रतीकात्मक रूप में आज भी भारत से भगवान श्रीराम की बारात आती है । जानकी मंदिर, राम मंदिर, हनुमान मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और विशाल–विशाल सरोवर यहाँ के दर्शनीय स्थल हैं ।
काठमांडू से ३७५ कि.मी.दूर अवस्थित और विमान और सड़क परिवहन की अनेक सुविधाओं से युक्त इस नगर की महिमा इस बात से भी स्पष्ट होती है कि नेपाल यात्रा में आने वाले भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की यात्रा सूूची में भी यह यदाकदा शामिल हो जाती है । इस पावन धर्मस्थल से आगे बढ़ने पर आता है पर्यटकीय महत्व का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्वतीय स्थल इलाम ।
इलाम 
इलाम को स्वदेशी और विदेशी पर्यटक ‘पृथ्वी पर स्वर्ग’ के रूप में पाते है, क्योंकि यहाँ के हरे–भरे चाय बागान और पर्वतीय और प्राकृतिक सुंदरता पर्यटकों का मन मोह लेते हैं । फलस्वरूप यह ‘पर्वतों की रानी’ के नाम से भी जानी जाती है । समुद्री सतह से २,३२० मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित यहाँ के श्रीअंतुडाँडाÞ से सूर्योदय के मनमोहक दृश्य का अवलोकन करने के लिए पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है । इसके अतिरिक्त यहाँ से विश्व का तीसरा सर्वोच्च हिमालय पहाड़ कंचनजंघा का भी अवलोकन किया जा सकता है । यहाँ के अन्य दर्शनीय स्थलों में श्रीअंतु ताल, कण्यम, फिक्कल और पशुपतिनगर है । पर्यटकीय नगर होने के कारण यह स्थल विमान और सड़क परिवहन की सुविधाओं से युक्त है । इसके अलावा आवास के लिए भी विभिन्न प्रकार के होटलें पर्यटको की यात्रा को सुखमय बनाते है । पूर्वांचल का पर्वतीय महत्व का दूसरा स्थल है धरान ।
धरान
काठमांडू से ५४०कि.मी. की दूरी पर अवस्थित और पर्यटकीय महत्व के धार्मिक स्थलों से भरा और प्रकृति द्वारा सजाया हुआ यह नगर विभिन्न वर्गों के पर्यटकों के लिए मनोरम है । सेवानिवृत्त वीर गोरखा जाति के निवास स्थल के रूप में सुविदित इस नगर की जलवायु, स्वच्छ वातावरण, हरा–भरा क्षेत्र, व्यस्त जन जीवन, विभिन्न जन–जातियों की सांस्कृतिक और धार्मिक तीज–त्योहारों के अवसर पर दिखने वाले परंपरागत वेषभूषाएँ, लोकनृत्य, विद्वतजनों की सभा–गोष्ठियाँ पर्यटकों को अपने–अपने किस्म से मंत्रमुग्ध करते हैं । यहाँ के प्रसिद्ध और दर्शनीय धार्मिक स्थलों में प्रमुख है–दंतकाली मंदिर, जो एक शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है, बुढ़ासुब्बा मंदिर, पिण्डेश्वर मंदिर और विष्णुपादुका मंदिर । इन सभी मंदिरों के साथ पौराणिक गाथाएँ जुड़ी है, जिसकी चर्चा स्थानाभाव के कारण यहाँ कर पाना संभव नही हो रहा है । यह नगर भी विमान और सड़क परिवहन की सुविधाओं से युक्त है । पर इस नगर की यात्रा में आने वाले पर्यटकों को पहले काठमांडू से विमान की यात्रा करते हुए विराटनगर, जिसका भी अपना इतिहास है, और वहाँ से मोटर या बसों से यात्रा करनी पड़ती है । यह नगर पड़ोस के मनोरम पर्वतीय प्रदेश धनकुटा, ताप्लेजुंग, ते¥हथुम, पाँचथर औरसंखुआ सभा जैसे जिलों के क्षेत्रों की पदयात्रा या पर्यटन के लिए प्रवेशद्वार भी है ।
ताप्लेजुंग
समुद्री सतह से ३,८०० मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित यह जिला जहाँ अपनी पर्वतीय सुंदरता के लिए पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है, वहीं यह भूमि पावन पाथीभरा मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है । अतः यहाँ पर्यटकों की हमेशा भीड़ लगी रहती है । कोई पर्वतीय सुंदरता का अवलोकन के साथ देवी के सामने सिर नवाने आते हैं तो कोई मन्नत माँगने । इस मंदिर के संबंध में यह मान्यता है कि जो भी भक्त यहाँ आते हैं और पाथीभरा देवी के समक्ष अपनी मन्नत रखते हैं, पाथीभरा देवी उनकी मनोकामना पूरी करती हैं । पाथीभरा देवी के संबंध में भी पौराणिक गाथाएँ हैं जिसकी चर्चा इस अंक में संभव नही हो पा रहा है । समान रूप से अन्य जिलों और स्थलों के संबंध में आगामी अंकों में चर्चा होती रहेगी । अस्तु ।
संदर्भ सामग्रीः–
– नेपालका आराध्य देव भगवान् श्रीपशुपतिनाथ कुलचन्द्र कोइराला ।
– नेपालको इतिहास ढुण्डीराज भण्डारी ।

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