Fri. Sep 21st, 2018

बदलते राजनैतिक मूल्य और मधेशमार्गी दल : कुमार सच्चिदानन्द


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पिछले दिनों मधेशी दलों में जो एकीकरण देखा गया, उसे इसी का परिणाम माना जा सकता है । दरअसल मधेश की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाने के लिए जिस तरह से सारे दलों ने राजनैतिक सहभाव की नीति का पालन किया था, उसी तरह नीतियों की ज्यादतियों का विरोध कर अपने वजूद के उद्घोष के लिए यह एकीकरण आवश्यक था और इससे आम लोगों में भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण बना है कि मधेश के दल अब धीरे–धीरे गम्भीर हो रहे हैं । एक समय था जब बहुत सीमित स्वार्थों के कारण ये दल टूटते–बिखरते रहे । वस्तुतः इसे अस्वाभाविक भी नहीं माना जा सकता क्योंकि प्रथम तराई आन्दोलन को तो मोटे तौर पर मधेश के मुद्दों का जन्मकाल ही माना जा सकता है । यह सच है कि इससे पूर्व भी ये मुद्दे थे लेकिन जिस रूप में थे और जैसा इनका विस्तार था, इस आधार पर इसे तो गर्भावस्था का ही काल माना जा सकता था । इसलिए विगत दस वर्ष तो इन मधेशमार्गी दलों के लिए एक बच्चे की तरह ही तरह खेलने–खाने का समय रहा है । लेकिन आखिर कब तक ? बालपन सब दिन अच्छा भी नहीं लगता । इसलिए यह एकीकरण संदेश देता है कि मधेश की राजनीति करने वाले दल अब परिपक्व हो रहे हैं । लेकिन यह भी सच है कि कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिन्हें बहुत बाद तक बुद्धि नहीं आती । मधेश में ऐसे भी राजनैतिक दल सक्रिय हैं । लेकिन जो राजनैतिक परिस्थितियाँ तैयार है उसमें उनके गालों पर जोरों की चपत लगने की संभावनाओं का आकलन तो किया जा सकता है ।
क्षेत्रीय राजनीति की यह विशेषता होती है कि यह क्षेत्रीय मुद्दों को आधार बनाकर चलती है । ऐसे दल क्षेत्रीय स्तर पर तो लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं । क्योंकि क्षेत्रीय मुद्दों की जमीन उनके पास होती है । लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसे स्थापित होने के उदाहरण कहीं नहीं मिलते । ऐसी स्थिति में यह बात और भी असंभव हो जाती है कि कोई क्षेत्र विशेष अगर किसी तरह के भेदभाव की अनुभूति करता है और इसके विरुद्ध राजनीति आकार लेती है और राष्ट्रीय स्तर पर इसके प्रति विमति रखते हैं तो राजनीति की इस जमीनी हकीकत को न समझकर अपने से सर्वथा विपरीत दलों से हाथ मिलाना एक तरह से आत्मघाती कदम है । क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर तो ऐसे दलों को तो नहीं ही स्वीकार किया जा सकता, क्षेत्रीय स्तर पर भी उसकी विश्वसनीयता गुमने लगती है । कोई भी दल या नेता अपने दल के समर्थकों को केन्द्र में रखकर जब नीतियाँ बनाती है तो उसके अनुसार समर्थकों की मनःस्थिति भी बदलती है । लेकिन कोई जब अपने समर्थकों को अन्धा, बहरा और बुद्धिहीन समझकर अपनी कुनीतियों की जुआली से उसे हाँकना चाहता है तो यहीं से ऐसे दलों का पतन भी शुरू हो जाता है । क्योंकि समर्थक भेड़–बकरियाँ नहीं होते कि उन्हें जिधर हाँक दिया उधर ही चल पड़े ।

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