Wed. Nov 21st, 2018

बस इतना समझ लिजिए कि मजदूर हैं हम : मधुरेश प्रियदर्शी

1 मई मजदूर दिवस पर मधुरेश प्रियदर्शी की कलम से…पटना {बिहार}– किसी को क्या बतायें कि कितने मजबूर हैं हम, बस इतना समझ लिजिए कि मजदूर हैं हम…….
आज एक मई यानि मजदूर दिवस है. आज का दिन दुनिया भर के मजदूरों के हक की लड़ाई के लिए मशहूर है. आज ही के दिन सन् 1886 में अमेरिका के मजदूर संगठनों ने काम का समय आठ घंटे से ज्यादा नहीं रखने के लिए हड़ताल की थी. इस हड़ताल के दौरान अमेरिकी शहर शिकागो के हेय मार्केट में बम धमाका हुआ था. बम किसने फेंका था ये तो पता नहीं चल सका. लेकिन प्रतिक्रिया स्वरूप पुलिस ने गोलियां चला दी थी जिसमें सात मजदूरों की मौके पर जान चली गयी थी. इस घटना के कुछ दिन बाद अमेरिका सरकार ने मजदूरों की मांगे मान ली और काम का समय आठ घंटे निर्धारित कर दिया. यह नियम अपने देश में भी लागू है. अमेरिका में अपने हक के लिए संघर्ष करने वाले मजदूरों की मौत के बाद से ही दुनिया भर में 1मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रचलन है.
परंतु देश की आजादी से लेकर अबतक क्या मजदूरों को उनका वाजिब हक मिल पाया है. यह एक यक्ष प्रश्न है. सरकारें आयी और गयी लेकिन मजदूरों की समस्या जस की तस बनी हुई है. महलों के निर्माण में अपना खून-पसीना एक करने वाले मजदूर आज फटेहाल हैं. एक अदद छत की बात कौन करे दो जून की रोटी उन्हें बमुश्किल नसीब हो पाती है. घर में अगर किसी को गंभीर बिमारी हो जाए तो फिर राम नाम सत्य है…के अलावें दूसरा कोई चारा भी नहीं है.
हॉलाकि मैं ये नहीं कह रहा कि हमारी सरकारों ने मजदूरों के लिए कुछ नहीं किया. सरकार ने तो मजदूरों के हित में नीतियां और योजनाएं बनायी और उसे अमली जामा भी पहनाया. लेकिन दलाल संस्कृति हमारी सरकार की योजनाओं पर भारी पड़ी. दिल्ली से मजदूरों के उत्थान के लिए चली योजनाएं धरातल पर उतरने से पहले दम तोड़ देती हैं या अगर पहुंच भी गयी तो विकास की कसौटी खर्रा नहीं उतरती. जिसके कारण सरकारी रिकार्ड में तो मजदूरों का विकास और उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार की बात दर्ज कर ली जाती है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल परे है. बिहार ही नहीं देश के अनेक राज्यों में हमारा मजदूर समाज आज भी उपेक्षित है, शोषित है, पीड़ित है. मजदूर दिवस की परिभाषा से अंजान हमारे यहां के मजदूर खासकर बाल मजदूर अपनी क्षुधा को शांत करने लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं. उनके लिए मजदूर दिवस का कोई मायने-मतलब नहीं है. वे अपनी गरीबी और बेवशी को ईश्वरीय प्रकोप मानकर किसी तरह अपने परिवार की गाड़ी को खींच रहे हैं.
हमारी सरकार और इस देश के रहनुमाओं को सर्वप्रथम मजदूरों के समुचित विकास पर ध्यान देने की जरूरत है. हमारे मजदूर जबतक स्वस्थ नहीं होंगे, उनके परिवार को जबतक अपना सर छुपाने के लिए एक छत मयस्सर नहीं होगा, उनके बच्चों को जबतक जीवनोपयोगी एवं रोजगार परक शिक्षा नहीं मिलेगी तबतक मजदूर दिवस की वास्तविक सार्थकता सिद्ध नहीं होगी. अंत में आज के मौके पर मशहूर शायर मुनव्वर राणा की पंक्तियां आप सबको समर्पित करता हुं…….
” सो जाता है फुटपाथ पे अखबार बिछा कर, मजदूर कभी नीदं की गोली नहीं खाता “.

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