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बस और कुछ ना चाहिए : गंगेश मिश्र

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कपिलबस्तु, १५ जुलाई |

बस और कुछ ना चाहिए ..
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समझा नहीं था,
जब तलक़,
तुमने सितम ढाये बहुत,
ग़ुमराह कर,
हमराह बनकर।
जागा हूँ अब,
सोया बहुत,
अब नींद भी आती नहीं।
तुमने दिया है ज़ख़्म जो,
सोने नहीं देता हमें।
तुमने हमेशा छल किया,
हमनें मुआफ़ी दे दिया,
करते रहे ज़ुल्मों-सितम,
हमनें तो उफ़् तक ना किया।
माँगा था हमनें प्यार से,
पर मौत की सौगात दी,
वो इम्तहाँ थी सब्र की।
ये मुल्क़ बस तेरा नहीं,
इस पर तो हक़, मेरा भी है।
जो है हमारा मिल सके,
बस और कुछ ना चाहिए।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° गंगेश मिश्र

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