Sat. Sep 22nd, 2018

बहुत बार देखे इन आँखों ने सपने और बहुत बार देखा टूटते हुए : अमरजीत काैंके

1 सपने नहीं मरते

बहुत बार देखे इन आँखों ने सपने

और बहुत बार देखा टूटते हुए

उन्हें चटखते देखा

फिर देखा टूटते

किरचों में बँटते हुए

और किरचों को आँखों में चुभते देखा

बहुत बार किरचों को देखा

लहू में तैरते हुए

अंगों में चलते हुए

जिस्म की गहराईयों तक

उतरते फिर जिस्म में साँस लेते

देखी काँच के टुकड़ों की फसल

सपने किरचों में बँटते हुए

जिस्म में उगते

देखे कितनी ही बार

पर नयन हैं बावरे

कि सपने देखने की आदत नहीं

तजते सपने नहीं मरते ।

2 अपने घर में

अपने घर में बैठ कर

पहली बार मैंने धूप देखी

जो सुबह-सवेरे उतर कर

सीढ़ियाँ आँगन में उतर आई

धूप को अपने ऊपर ओढ़ते जाना मैंने

कि जीने के लिए यह चमकती

और गुनगुनी धूप

कितनी ज़रूरी थी

अपने घर में उगे फूलों की

दबे पाँव वलती खुशबू को

सूँघते मैंने पहली बार महसूस किया

कि मुर्दा हो रहे जीवन के लिए

फूलों की यह महक कितनी लाज़मी थी

अपने घर में मैंने पहली बार

फूलों पर गुनगुनाती तितली देखी

और सोचा कि रंगों का मनोविज्ञान

समझने के लिये प्रकृति की

इस रंगीन कारीगरी को समझना

कितना आवश्यक था

अपने घर में बैठकर

मुझे पहली बार अहसास हुआ

कि दुनियाँ में सब बेघरों के लिए

सचमुच कितने ज़रूरी हैं घर ।

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